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40 साल का गढ़ धीरे-धीरे नेस्तनाबूद, बस्तर में मओवादी स्मारकों को क्यों तोड़ रहा प्रशासन? 173 पर चला बुलडोज़र

छत्तीसगढ़ का बस्तर 40 सालों से मओवादियों का गढ़ रहा है, लेकिन अब यहां इनकी पकड़ कमजोर हो गई है. प्रशासन ने पिछले तीन सालों में 520 मओवादियों को मार गिराया है और 100 ज्यादा स्मारकों को तोड़ा है.

40 साल का गढ़ धीरे-धीरे नेस्तनाबूद, बस्तर में मओवादी स्मारकों को क्यों तोड़ रहा प्रशासन? 173 पर चला बुलडोज़र
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( Image Source:  X-@BJP4CGState )

छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका 40 से ज्यादा साल तक माओवादियों का गढ़ रहा. माओवादियों ने यहां बड़े इलाकों पर कंट्रोल रखा और सैकड़ों स्मारक बनवाए, जो इलाके में उनके दबदबे का प्रतीक बन गए थे. लेकिन पिछले तीन साल में हालात बदले हैं. सुरक्षा बलों ने बड़े अभियान चलाते हुए 520 से ज्यादा माओवादियों को मार गिराया है, जबकि कई अन्य ने आत्मसमर्पण किया है.

सिक्योरिटी एजेंसीज़ ने अपने ऑपरेशन के दौरान 100 से ज्यादा माओवादी स्मारकों को भी ध्वस्त किया. ये स्मारक माओवादियों ने अपने नेताओं और सदस्यों की याद में बनवाए थे. इन्हें ध्वस्त करना इसलिए भी जरूरी हो गया था, क्योंकि प्रशासन हरगिज़ इस सोच को पनपने देना नहीं चाहता था.

सीआरपीएफ के डायरेक्टर जनरल ने क्या कहा?

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के महानिदेशक जी पी सिंह ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में एक वीडियो साझा करते हुए कहा,"ईंट दर ईंट हम इस विचार और उसके हर रूप को खत्म करेंगे." वीडियो में सुरक्षा बल एक जेसीबी मशीन से ऐसा ही एक स्मारक तोड़ते दिख रहे हैं.

कितने स्मारक तोड़े गए?

साल 2018 से 2023 के बीच छह सालों में सुरक्षा बलों ने करीब 60 स्मारक तोड़े थे, जिनमें से 24 स्मारक सिर्फ 2021 में ध्वस्त किए गए. लेकिन 2023 में अभियान तेज होने के बाद यह संख्या बढ़ गई. 2023 से फरवरी 2026 के बीच 113 स्मारक तोड़े गए. इनमें सबसे ऊंचा स्मारक 64 फीट का था, जो बीजापुर जिला मुख्यालय से करीब 90 किलोमीटर दूर तेलंगाना सीमा की ओर कोमतपल्ली गांव में बनाया गया था.

सबसे खतरनाक मओवादियों पर सिक्योरिटी एजेंसियों की फतह

अगस्त 2022 में माओवादियों ने कोमतपल्ली में 'शहीदी सप्ताह' मनाने के लिए सैकड़ों ग्रामीणों को इकट्ठा किया था. इस प्रोग्राम में टॉप माओवादी नेता शामिल हुए थे, जिनके साथ पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की बटालियन-1 के सदस्य मौजूद थे. इस बटालियन को संगठन की सबसे खतरनाक यूनिट माना जाता है. उस समय यह गांव सुरक्षा बलों की पहुंच से बाहर था, लेकिन पिछले साल स्थिति बदल गई है. बीजापुर के पुलिस अधीक्षक जितेंद्र कुमार यादव का कहना है कि हमने जनवरी 2025 में उस ढांचे को ध्वस्त कर दिया था.

स्मारकों को हटाने के पीछे क्या है मकसद?

बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी ने कहा,"माओवादी स्मारकों और प्रतीकों को हटाना एक सोच-समझकर लिया गया फैसला है. इसका मकसद माओवाद की वैचारिक पकड़ को खत्म करना, इलाके में सामान्य स्थिति बहाल करना, सुशासन को मजबूत करना और समाज को मुख्यधारा से जोड़ना है. माओवादियों के जरिए बनाए गए स्मारकों को हटाना उनके सिंबोलिक और दिमागी असर को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम है.”

उन्होंने आगे कहा, "पहले इन स्मारकों का इस्तेमाल माओवादी स्थानीय समुदायों में डर और दबदबा बनाए रखने के लिए करते थे. अब इन्हें हटाए जाने से साफ संदेश जाता है कि राज्य की वैध सत्ता और कानून का राज लगातार मजबूत हो रहा है और इलाके में माओवादियों का प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है."

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