22 साल पुराने अहम केस में फैसला सुना सुर्खियों में आये जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास कौन, क्यों कहा - 'इजैक्यूलेशन' कंप्लीट रेप नहीं?
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने 22 साल पुराने मामले में सजा कम की. ‘पेनिट्रेशन बनाम इजैक्यूलेशन’ टिप्पणी पर विवाद. जानें पूरा प्रोफाइल.
न्यायपालिका के किसी भी फैसले पर जब देशभर में बहस छिड़ जाती है, तो मामला सिर्फ एक आरोपी या एक पीड़िता तक सीमित नहीं रहता, वह कानून की व्याख्या, न्याय की परिभाषा और संवेदनशील सामाजिक मुद्दों के केंद्र में आ जाता है. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की हालिया टिप्पणी ने भी कुछ ऐसा ही विमर्श खड़ा कर दिया है. एक पुराने आपराधिक मामले में सजा में संशोधन करते हुए अदालत ने कहा कि बलात्कार सिद्ध करने के लिए ‘पेनिट्रेशन’ आवश्यक तत्व है, ‘इजैक्यूलेशन’ नहीं. अदालत की इस कानूनी व्याख्या के बाद सोशल मीडिया से लेकर कानूनी गलियारों तक तीखी चर्चा शुरू हो गई.
कौन हैं जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास?
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास वर्तमान में Chhattisgarh High Court में न्यायाधीश हैं. उनका जन्म 5 अक्टूबर 1970 को रायपुर में हुआ था. उन्होंने पंडित रविशंकर यूनिवर्सिटी से बी.एससी. और एलएल.बी. की पढ़ाई की. 16 मार्च 1996 को वकालत शुरू की और जिला न्यायालयों से लेकर उच्च न्यायालय तक व्यापक अनुभव हासिल किया.
ASG से हाई कोर्ट जज तक का सफर
7 सितंबर 2014 से 22 सितंबर 2017 तक असिस्टैंट सॉलिसिटर जनरल इंडिया रहे. 22 मार्च 2021 को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में एडिशनल जज नियुक्त हुए. 15 दिसंबर 2022 को स्थायी जज बने. उनके कार्यकाल में कई आपराधिक और सिविल मामलों में अहम फैसले दिए गए.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का करीब 22 साल पुराना है। ट्रायल कोर्ट ने 2005 में आरोपी को आईपीसी की धारा 376(1) और 342 के तहत 7 साल की सजा सुनाई थी. हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान पीड़िता की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट का पुनर्मूल्यांकन किया गया. मेडिकल रिपोर्ट में हाइमन सुरक्षित बताया गया, हालांकि कपड़ों और निजी अंगों पर स्पर्म मिलने की बात सामने आई.
इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि ‘पेनिट्रेशन’ साबित नहीं हुआ, इसलिए अपराध को 376/511 (अटेम्पट टू रेप) की श्रेणी में रखते हुए सजा घटाकर साढ़े तीन साल कर दी गई.
‘इजैक्यूलेशन’ पर टिप्पणी क्यों चर्चा में?
जस्टिस व्यास की एकल पीठ ने कहा कि रेप के अपराध के लिए ‘पेनिट्रेशन’ जरूरी है, ‘इजैक्यूलेशन’ नहीं. यदि केवल इजैक्यूलेशन है और प्रवेश साबित नहीं होता, तो यह रेप के प्रयास की श्रेणी में आएगा.उनकी इस टिप्पणी के बाद कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के बीच बहस छिड़ गई है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि बिना सहमति किसी भी प्रकार का यौन कृत्य गंभीर अपराध है.
कानूनी बहस: पेनिट्रेशन बनाम सहमति
भारतीय दंड संहिता के तहत बलात्कार की परिभाषा में ‘पेनिट्रेशन’ को मुख्य तत्व माना गया है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि सहमति का अभाव ही अपराध की बुनियाद है. इसी कानूनी व्याख्या को लेकर यह फैसला चर्चा और विवाद का विषय बन गया है.
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास का यह फैसला कानूनी व्याख्या और न्यायिक दृष्टिकोण के कारण चर्चा में है. जहां एक ओर अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर अपराध की श्रेणी बदली, वहीं दूसरी ओर इस निर्णय ने बलात्कार की परिभाषा और न्यायिक मानकों पर नई बहस को जन्म दे दिया है.
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास अपने स्पष्ट कानूनी तर्क, साक्ष्यों की सूक्ष्म जांच और संवैधानिक सिद्धांतों की सख्त व्याख्या के लिए जाने जाते हैं. आपराधिक और सिविल दोनों तरह के मामलों में उन्होंने कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं, जिनकी न्यायिक हलकों में चर्चा रही है.





