Bihar की सत्ता में सम्राट, लेकिन बच्चे सियासत से कोसों दूर, जानिए अभी कहां और क्या कर रहे हैं?
बिहार के नए सीएम सम्राट चौधरी सियासत में हाई-प्रोफाइल, लेकिन उनके बच्चे लाइमलाइट से दूर हैं. जानिए बेटा-बेटी क्या करते हैं और क्या राजनीति में आएंगे.
बिहार की सियासत में जब Samrat Choudhary ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो यह सिर्फ एक नेता के उभार की कहानी नहीं थी, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक परिवार की निरंतरता भी थी जिसकी जड़ें दशकों से सत्ता के गलियारों में रही हैं. पिता सम्राट चौधरी की बनाई मजबूत जमीन और मां पार्वती देवी की जनाधार वाली छवि ने इस परिवार को खास बनाया. लेकिन इस हाई-वोल्टेज पॉलिटिक्स के बीच एक दिलचस्प सन्नाटा भी है. सम्राट चौधरी का परिवार, खासकर उनके बच्चे, अब तक लाइमलाइट से दूर हैं. यही विरोधाभास इस कहानी को और दिलचस्प बनाता है. जहां सियासत शोर मचा रही है, वहींत्र अगली पीढ़ी खामोशी से अपनी राह चुन रही है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है - क्या यह सन्नाटा आने वाले समय में टूटेगा?
सम्राट चौधरी की सियासत हाई प्रोफाइल, लेकिन परिवार लो-प्रोफाइल. बेटे-बेटी राजनीति से दूर - क्या अगली पीढ़ी संभालेगी विरासत या चुनेगी अलग रास्ता? जानें सीएम सम्राट के बेटी और बेटे के बारे में सब कुछ.
1. बेटा–बेटी: अगली पीढ़ी का सवाल
बिहार के सीएम सम्राट चौधरी के दो बच्चे हैं. एक बेटा और एक बेटी. बेटा का नाम प्रणय चौधरी और बेटी का नाम चारु प्रिया है. उनके बच्चों में प्रणय और चारु के बारे में मौजूदा पेशे या रोजमर्रा की गतिविधियों के बारे में कोई खास जानकारी उपलब्ध रिकॉर्ड में सार्वजनिक रूप से नहीं बताई गई है. अपने पिता और दादा के विपरीत, जो जाने-माने राजनेता हैं, वे आम तौर पर लाइमलाइट से दूर रहते हैं.
सम्राट चौधरी के परिवार की अगली पीढ़ी फिलहाल पूरी तरह लो-प्रोफाइल है. उनके बेटे प्रणय चौधरी और बेटी चारू प्रिया सार्वजनिक जीवन से दूर हैं और राजनीति में उनकी कोई सक्रिय भूमिका अभी तक सामने नहीं आई है. यही वजह है कि उनके भविष्य को लेकर सस्पेंस बना हुआ है.
एक तरफ परिवार की तीन पीढ़ियों से चली आ रही राजनीतिक विरासत है, तो दूसरी तरफ बदलता हुआ दौर, जहां नई पीढ़ी अक्सर राजनीति से अलग रास्ता चुनती है. अभी तक दोनों बच्चों ने खुद को मीडिया और राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे फिलहाल अपनी पढ़ाई या प्रोफेशनल करियर पर ध्यान दे रहे हैं. सम्राट चौधरी की पत्नी पेशे वकील हैं. उनका विवाह साल 2007 में ममता कुमारी से हुआ था.
चौधरी के परिवार की राजनीति में गहरी जड़ें और नेटवर्क को देखते हुए यह संभावना भी बनी रहती है कि सही समय पर उन्हें सार्वजनिक जीवन में उतारा जा सकता है. बिहार की राजनीति में परिवार आधारित नेतृत्व कोई नई बात नहीं है, इसलिए यह सवाल लगातार बना रहेगा कि क्या सम्राट चौधरी की अगली पीढ़ी भी इस विरासत को आगे बढ़ाएगी या एक नई दिशा चुनेगी. फिलहाल, यह एक खुला प्रश्न है, जो आने वाले वर्षों में ही स्पष्ट होगा.
2. पिता रहे हैं 6 बार विधायक और 1 बार सांसद
शकुनी चौधरी बिहार की राजनीति के अनुभवी और बहुआयामी नेता रहे हैं. मुंगेर जिले के लखनपुर गांव में जन्मे शकुनी ने राजनीति में आने से पहले करीब 15 साल तक भारतीय सेना में सेवा दी, जो उनके अनुशासन और संगठनात्मक समझ को दर्शाता है. सक्रिय राजनीति में आने के बाद उन्होंने खुद को कुशवाहा (कोइरी) समुदाय के मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया. उनका चुनावी करियर बेहद प्रभावशाली रहा. वे छह बार तारापुर से विधायक और एक बार खगड़िया से सांसद चुने गए.
इसके अलावा, वे जॉर्ज फर्नांडिस के साथ समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में भी शामिल रहे, जो उनके राजनीतिक कद को और बड़ा बनाता है. अपने लंबे करियर में उन्होंने कांग्रेस, समता पार्टी, राजद, जदयू और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा जैसे कई दलों में काम किया, जो उनकी व्यावहारिक राजनीति को दर्शाता है. वे बिहार विधानसभा के उपाध्यक्ष और प्रदेश सरकार में मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी रहे. 2015 के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली, लेकिन उनकी बनाई राजनीतिक जमीन आज भी उनके बेटे के लिए मजबूत आधार बनी हुई है.
3. क्या मां की सोच का सम्राट पर है ज्यादा असर?
पार्वती देवी ने भी बिहार की क्षेत्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई थी. वे सिर्फ एक नेता की पत्नी नहीं रहीं, बल्कि खुद भी जनता के बीच मजबूत पकड़ रखने वाली जनप्रतिनिधि के रूप में उभरीं. 1998 के उपचुनाव में उन्होंने समता पार्टी के टिकट पर तारापुर विधानसभा सीट से जीत दर्ज की, जो इस बात का संकेत था कि परिवार की राजनीतिक पकड़ सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है. मुंगेर क्षेत्र में उनकी छवि एक जमीनी और सुलभ नेता की रही, खासकर महिला मतदाताओं के बीच उनका प्रभाव स्पष्ट था. 11 सितंबर 2022 को उनके निधन के साथ एक सक्रिय राजनीतिक अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन परिवार की राजनीतिक विरासत में उनका योगदान अहम बना हुआ है. सम्राट चौधरी के व्यक्तित्व और राजनीतिक सोच पर भी उनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.




