BSSC Chairman Alok Raj के इस्तीफे की वजह मुख्यमंत्री नीतीश, गृहमंत्री सम्राट की 'चौधराहट' तो नहीं है?
BSSC चेयरमैन आलोक राज का पदभार ग्रहण करने के महज दो दिन में इस्तीफा देना बिहार की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी में बड़े सवाल खड़े कर रहा है. पहली बार आयोग को तदर्थ अध्यक्ष मिला और पहली बार किसी चेयरमैन ने इतनी जल्दी पद छोड़ा. निजी कारण बताए गए, लेकिन अंदरखाने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और गृहमंत्री सम्राट चौधरी के बीच कथित खींचतान, सत्ता संतुलन और दबाव की चर्चाएं तेज हैं.
“बिहार के इतिहास में अब से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि राज्य कर्मचारी चयन आयोग का कभी कोई काम-चलाऊ यानी तदर्थ अध्यक्ष नियुक्त किया गया हो. पूर्व आईपीएस और बिहार राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक आलोक राज ऐसे पहले चेयरमैन रहे हैं जिनके नियुक्ति-पत्र में साफ-साफ लिखा गया था कि आप आगामी आदेशों तक इस पद (बिहार राज्य कर्मचारी आयोग चेयरमैन) पर कार्य करेंगे.
अब से पहले तक इस पद पर एक तय समय तक के लिए किसी काबिल ब्यूरोक्रेट की नियुक्ति की जाती रही है. आलोक राज के मामले में दूसरा और अब से पहले कभी न दोहराया गया कदम रहा है, इस पद पर किसी ब्यूरोक्रेट के द्वारा प्रभार ग्रहण करते ही पद से तत्काल इस्तीफा दे दिया जाना. ऐसा भी कालांतर में कभी नहीं हुआ है कि बिहार राज्य कर्मचारी आयोग के किसी चेयरमैन ने पदभार ग्रहण करने के चंद दिन के भीतर इस्तीफा दे दिया हो.
इन बातों की नजरंदाजी भी सही नहीं
जिस तरह की उठा-पटक आलोक राज के इस्तीफे के मामले में बाहर निकल कर आ रही है. उससे एक नहीं कई बेतुकी और हास्यास्पद बातों को बल मिल रहा है. इन्हीं में से एक दो जो प्रमुख वजहें ब्यूरोक्रेसी और बिहार के राजनीतिक गलियारों से छनकर बाहर आ रही हैं उनमें पहली वजह है राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और गृहमंत्री सम्राट चौधरी के बीच चली आ रही अंदरूनी खींचतान. बिहार की राजनीतिक के यह दोनों ही धुरंधर भले ही अपने बीच पक रही ऊट-पटांग खिचड़ी की बात कभी खुलकर न मानें. लेकिन जबसे इस बार बिहार की सत्ता में सम्राट चौधरी के हाथ होम मिनिस्टर का पद लगा है. तभी से वह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को फूटी आंख नहीं सुहा रहे हैं. हालांकि इन बातों से खुलकर बोलने से दोनो ही नेता गुरेज करते हैं.”
तमाम तुर्रमखां ब्यूरोक्रेट खामोश हुए
1989 बैच के भारतीय पुलिस सेवा से बिहार कैडर के पूर्व आईपीएस और राज्य के डीजीपी पद से 31 दिसंबर 2025 को ही रिटायर होने वाले आलोक राज को, रातों रात जिस तरह से राज्य कर्मचारी आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था, राज्य की हुकूमत के इस कदम ने बड़े-बड़े तुर्रमखां और ऊंची पहुंच वाले हाईप्रोफाइल ब्यूरोक्रेट्स की जुबान बंद कर दी थी. सब समझ गए थे कि अब उनकी दाल राज्य कर्मचारी आयोग चेयरमैन पद की कोशिश में तो कतई नहीं गलेगी. लिहाजा उन्होंने आलोक राज को रातों-रात अस्थाई रूप से ही सही बिहार राज्य कर्मचारी आयोग का अध्यक्ष बनाए जाते ही खामोश रहने में ही अपनी खैर समझी.
सितारे ही उल्टे चल रहे हों तो...
इसे उल्टे सितारों का ही खेल और वक्त की मार ही कहेंगे कि जिन आलोक राज को चंद दिन में ही बिहार राज्य कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ गया, जब इन्हें बिहार का पुलिस महानिदेशक बनाया गया था तब भी महज 103 दिन में ही उन्हें राज्य के डीजीपी पद से हटना पड़ा था. उन्हें डीजीपी पद से हटाकर उनके जूनियर आईपीएस 1991 बैच के विनय कुमार को नीतीश कुमार की हुकूमत ने राज्य का पुलिस महानिदेशक बनाकर सबको चौंका दिया था.
शुभचिंतक-दुश्मन सब हैरत में
31 दिसंबर 2025 को जब आलोक राज आईपीएस जीवन की अंतिम पारी से विधिवत पटना के मिथिलेश स्टेडियम में विदाई ले रहे थे, तब भी उन्होंने नहीं सोचा होगा कि अब आइंदा उन्हें ब्यूरोक्रेसी में “आईपीएस” की नौकरी से भी ज्यादा मजबूत पद कभी हासिल हो सकता है. अगले ही दिन यानी 1 जनवरी 2026 को सूबे की सल्तनत ने उन्हें बिहार राज्य कर्मचारी चयन आयोग का “काम-चलाऊ” अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा की तो, न केवल खुद आलोक राज, अपितु उनके शुभचिंतक और विरोधी दोनों ही खेमे हैरत में रह गए.
इस बात को लेकर उलझन
बीएसएससी अध्यक्ष पद के नियुक्ति पत्र में लिखा गया कि आलोक राज 65 वर्ष की उम्र पूरी होने तक इस पद पर बने रहेंगे. लेकिन इसके साथ ही कुछ लोग इस नियुक्ति-पत्र के बारे में यह भी कहते हैं कि इसमें साफ-साफ लिखा गया था कि आलोक राज आगामी आदेशों तक चेयरमैन पद पर बने रहेंगे. अगर यह बात सही है तो फिर सवाल यह है कि आखिर “अगले आदेशों तक” का क्या मतलब लगाया जाए? मतलब, आलोक राज को “तदर्थ” रुप से बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया था?
अनचाहे मन से चेयरमैन बने
7 साल केंद्रीय पुलिस बल यानी सीआरपीएफ में प्रतिनियुक्ति के दौरान आलोक राज झारखंड, पश्चिम बंगाल में भी अपनी सेवाएं देने का अनुभव रखते थे. उनकी पुलिसिया नौकरी पर अब तक कभी कोई दाग भी नहीं लगा था. वे स्वभाव से मृदुभाषी और एक बेहतरीन गायक भी हैं. अक्सर मंचों से अपनी कला का वह प्रदर्शन भी करते रहे हैं. खैर इन सबके बीच सरकार का जो हुकूम हुआ उसे उन्हें सिर-माथे लेकर बिहार राज्य कर्मचारी चयन आयोग के अध्यक्ष का पद संभाल लिया.
कांटों भरा ताज है
पूरा भारत जानता है कि बिहार राज्य कर्मचारी चयन आयोग के चेयरमैन का पद “कांटों का ताज” कहा जाता है. आलोक राज को मगर चूंकि अपनी काबिलियत पर शक नहीं था. सो उन्होंने चेयरमैनशिप स्वीकार कर ली. भले ही उनके इस कदम ने उनके विरोधियों के पेट में पानी क्यों न भर दिया हो. इससे आलोक राज के ब्यूरोक्रेट जीवन पर न पहले कोई असर पड़ा न अब पड़ना था. बिहार राज्य कर्मचारी चयन आयोग देश भर में इस बात के लिए बदनाम रहा है कि वहां भर्तियों में धांधली, पेपर-लीक होना आम-बात है. मगर इससे आलोक राज के ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ना था क्योंकि उन्होंने पूरी पुलिस सेवा “नो-नॉनसेंस” अधिकारी के रूप में की थी.
आलोक राज को खुद पर विश्वास था
सौ टके का सवाल... मुजफ्फरपुर (बिहार) के मूल निवासी ईमानदार मगर कड़क मिजाज आलोक राज बखूबी जानते होंगे कि उन्हें बिगड़े हुए या फिर पहले सी ही बदनाम बिहार राज्य कर्मचारी चयन आयोग को कैसे सुधारना है. तभी तो उन्होंने इसके अध्यक्ष का पद संभाला होगा. तूफान तो तब आ गया जब पद संभालने के दो दिन के भीतर ही निजी कारणों का हवाला देकर उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया. पटना विवि का जियोलॉजी (भू-विज्ञान) का एमएससी गोल्ड-मेडलिस्ट छात्र और पूर्व डीजीपी बिहार आलोक राज आखिर दो दिन में ही कैसे हार मान गए?
निजी वजह या फिर कुछ और
आलोक राज तो “निजी” वजह बताकर पद से इस्तीफा देकर चले गए. उनके जाने के बाद मगर अब राज्य ब्यूरोक्रेसी और राजनीतिक गलियारों में जितने मुहं उतनी बातें हो रही हैं. मसलन उन्होंने यूं ही तो दो दिन के ही भीतर इस्तीफा नहीं दे मारा होगा. कोई तो बड़ी वजह रही होगी जो आलोक राज के लिए नाकाबिले-बर्दाश्त साबित हुई होगी. क्योंकि उसूलों से समझौता तो आलोक राज ने जब 37-38 साल आईपीएस की नौकरी में नहीं किया. तब फिर अगर उनके रिटायरमेंट के बाद उन्हें कोई चेयरमैन पद ‘गिफ्ट’ करके उन्हें अपनी उंगलियों पर नचाना चाहे, तो भला बताओ यह कैसे संभव है?
एक इस्तीफा कई सवाल
जिन आलोक राज जैसे बेदाग पूर्व ब्यूरोक्रेट को बिहार राज्य कर्मचारी चयन आयोग का अध्यक्ष बनाने पर आमजन में उम्मीद जगी थी कि, चलो अब सरकारी नौकरियों में धांधलियों पर लगाम लग जाएगी. उन्हीं आलोक राज के कार्यभार ग्रहण करने के 2 दिन के भीतर ही इस्तीफा देने से सूबे की सल्तनत ही सवालों के दायरे में आकर खटकने लगी है. ऐसे में अब सवाल यह भी कौंधने लगे है कि आखिर क्यों और क्या आलोक राज को सरकारी तंत्र की कोई ऊट-पटांग हरकत नहीं पची? या फिर वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राज्य के गृहमंत्री सम्राट चौधरी के बीच अक्सर अंदर ही अंदर ठनी रहने वाली राजनीतिक-वैमनस्यता या रार के चक्कर में डालकर “रगड़” डाले गए हैं?
(पटना में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार-राजनीतिक विश्लेषक मुकेश बालयोगी से, नई दिल्ली में मौजूद स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर इनवेस्टीगेशन संजीव चौहान के साथ हुई खास बातचीत के आधार पर)





