किस्से नेताओं के: आंदोलन की आग से निकला Assam का वो नेता, 2 महीने की पार्टी और 32 की उम्र में बन गए CM , कहानी इतिहास बनाने की
1979 के असम आंदोलन से लेकर 32 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बनने तक प्रफुल्ल कुमार महंता की पूरी कहानी पढ़ें. जानें कैसे छात्र आंदोलन ने सत्ता बदल दी.
असम के पूर्व सीएम प्रफुल्ल कुमार महंता
बात 1979 की है. उस समय असम कानून व्यवस्था, सीमाई सुरक्षा और कई अन्य विवादों की वजह से न केवल अराजक दौर से गुजर रहा था, बल्कि एक उबलता हुआ सामाजिक-राजनीतिक मंच था. चारों ओर असंतोष था, सड़कों पर प्रदर्शन होते रहते थे. हर घर में यही चर्चा होती थी कि, “असम की पहचान बची रहेगी या नहीं?” यह वह समय था जब असम अपनी संस्कृति, भाषा और संसाधनों पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंतित था. अवैध प्रवासियों का मुद्दा अब सिर्फ राजनीतिक नहीं रहा था, बल्कि जनभावनाओं का केंद्र बन चुका था. केंद्र सरकार के खिलाफ लोगों को असंतोष भी चरम पर था.
AASU आंदोलन कैसे बना असम की जनता की सबसे बड़ी आवाज?
राजीव भट्टाचार्य की पुस्तक 'द मिराज आफ डॉन' इसी पृष्ठभूमि में All Assam Students’ Union (AASU) ने एक बड़े आंदोलन की शुरुआत की. यह आंदोलन किसी एक पार्टी या नेता का नहीं था, बल्कि कुछ ही समय में पूरे राज्य के युवाओं और छात्रों की सामूहिक आवाज बन गया. धीरे-धीरे यह आंदोलन असम की राजनीति का सबसे प्रभावशाली आंदोलन बन गया.
महंता कैसे बने आंदोलन के सबसे बड़े नेता?
इन्हीं युवाओं के बीच एक नाम तेजी से उभर रहा था. वो नाम था प्रफुल्ल कुमार महंता. वे एक शांत, संगठित और विचारशील छात्र नेता थे. नेतृत्व क्षमता और निर्णय लेने की समझ के कारण उन्हें AASU का अध्यक्ष बनाया गया. उस समय यह किसी ने नहीं सोचा था कि यही छात्र नेता कुछ वर्षों बाद पूरे राज्य की सत्ता संभालेगा.
असम आंदोलन का असली मुद्दा क्या था, बड़ा क्यों बन गया?
1979 से 1985 तक का समय असम के लिए संघर्ष और अनिश्चितता का दौर था. राज्य में बंद, प्रदर्शन, हिंसा, बम ब्लास्ट, विरोध मार्च और कई बार हिंसा जैसी स्थितियां आम हो गई थीं. आंदोलन का मुख्य मुद्दा था - 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बाद प्रदेश में आए अवैध विदेशियों की पहचान करना और उन्हें असम से बाहर करना. यह मुद्दा असम की सामाजिक संरचना और आर्थिक संसाधनों से सीधे जुड़ा हुआ था.
प्रफुल्ल कुमार महंता इस आंदोलन के केवल एक प्रतीक नहीं थे, बल्कि उसकी रणनीतिक रीढ़ भी थे. वे आंदोलन को संगठित करते, केंद्र सरकार से वार्ताओं में भाग लेते और छात्रों को एकजुट रखते थे. आंदोलन ने धीरे-धीरे व्यापक जनसमर्थन हासिल कर लिया और यह केवल छात्र आंदोलन नहीं रहा, बल्कि असम की जनता का आंदोलन बन गया.
असम समझौता क्या था, राजनीति को कैसे बदल दिया?
छह वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार 1985 में एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे असम समझौता कहा गया. इस समझौते ने आंदोलन को राजनीतिक समाधान का रास्ता दिया और असम के भविष्य की दिशा तय की.
असली सवाल अब सामने था - आंदोलन के बाद आगे क्या?
यहीं से जन्म हुआ एक नई राजनीतिक शक्ति का. उस शक्ति् का नाम था - असम गण परिषद (AGP). इस गठन अक्टूबर 1985 में हुआ. यह पार्टी पारंपरिक राजनीति से अलग थी, क्योंकि यह किसी राजनीतिक परिवार या विचारधारा से नहीं, बल्कि सीधे जनआंदोलन से निकली थी. इसीलिए जनता में इसके प्रति गहरा विश्वास था. अक्टूबर 1985 में AGP का गठन हुआ और बहुत कम समय में यह पार्टी चुनावी मैदान में उतर गई. दिसंबर 1985 में हुए विधानसभा चुनावों ने असम की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया. असम विधानसभा की कुल 126 सीटों में से AGP ने 67 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि लंबे समय से सत्ता में रही कांग्रेस केवल 26 सीटों पर सिमट गई. यह जीत केवल राजनीतिक बदलाव नहीं थी, बल्कि जनता के मूड का स्पष्ट संकेत थी. लोगों ने पारंपरिक राजनीति को अस्वीकार कर आंदोलन से निकले नेताओं पर भरोसा जताया था.
प्रफुल्ल महंता 32 साल की उम्र में मुख्यमंत्री कैसे बने?
इस ऐतिहासिक जीत के बाद 24 दिसंबर 1985 को प्रफुल्ल कुमार महंता ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. मात्र 32 वर्ष की उम्र में वे भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्रियों में शामिल हो गए. यह सिर्फ एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि पूरे असम आंदोलन की जीत थी, यही वजह था कि सत्ता में आना शासन-प्रशासन की बागडोर संभालना आंदोलन से कहीं अधिक कठिन था.
क्या आंदोलन से बनी सरकार असम को पूरी तरह बदल पाई?
नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, असम समझौते को लागू करना. समझौते के अनुसार विदेशी नागरिकों की पहचान, उनके नाम वोटर लिस्ट से हटाना और उन्हें वापस भेजना था. इसके लिए Foreigners Tribunals बनाए गए और प्रक्रिया शुरू की गई, लेकिन यह काम बेहद धीमा और विवादों से भरा रहा. सीमा सुरक्षा भी एक बड़ी चुनौती थी. भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने और निगरानी बढ़ाने की कोशिशें शुरू हुईं, लेकिन संसाधनों की कमी और भौगोलिक कठिनाइयों ने काम को धीमा कर दिया. मतदाता सूची से अवैध नामों को हटाने की प्रक्रिया भी शुरू हुई, लेकिन राजनीतिक विरोध और कानूनी जटिलताओं के कारण इसे पूरी तरह लागू करना मुश्किल साबित हुआ.
इसी समय राज्य में एक और बड़ी चुनौती उभरी उग्रवाद. United Liberation Front of Asom (ULFA) जैसे संगठन सक्रिय हो गए और राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने लगी. यह सरकार के लिए एक गंभीर सुरक्षा संकट था. इसके साथ ही एनएससीएन, एनएनसी, एमएनएफ और पीएलए सहित कई संगठन उभरकर सामने आए. इन संगठनों का मकसद असम हथियार के दम पर स्वतंत्र राष्ट्र बनाना था, वो भी पााकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और चीन के सहयोग से.
क्यों 1990 में चुनाव हार गई आंदोलन से बनी सरकार?
दूसरी तरफ, AGP सरकार की एक बड़ी कमजोरी प्रशासनिक अनुभव की कमी भी थी. आंदोलन से आए नेताओं के पास जनता का समर्थन तो था, लेकिन शासन चलाने का अनुभव सीमित था. इससे कई नीतियों के क्रियान्वयन में देरी हुई. इसके अलावा, केंद्र सरकार पर अत्यधिक निर्भरता भी एक बड़ी समस्या थी. कई फैसलों के लिए केंद्र की मंजूरी जरूरी थी, जिससे राज्य स्तर पर निर्णय लेने की गति प्रभावित हुई. आर्थिक विकास के मोर्चे पर भी अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकीं. तेल रॉयल्टी, उद्योग विकास और बुनियादी ढांचे के विस्तार के वादे किए गए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव सीमित ही रहे. रोजगार और विकास की गति अपेक्षा से धीमी रही. जनता ने जिस उम्मीद के साथ आंदोलन को सत्ता में बदला था, वह उम्मीद धीरे-धीरे दबाव में बदलने लगी. सरकार को लगातार राजनीतिक, सामाजिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ा.
1990 में AGP की पहली सरकार का कार्यकाल समाप्त हुआ. इस अवधि में कुछ संस्थागत कदम जरूर उठाए गए, लेकिन असम समझौते का पूरा क्रियान्वयन नहीं हो सका. कई वादे अधूरे रह गए. इसका नतीजा यह निकला प्रफुल कुमार महंता चुनाव हार गए और आंदोलन से उपजी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई.
इसके बाद 1996 में प्रफुल्ल कुमार महंता एक बार फिर मुख्यमंत्री बने. लेकिन इस बार भी चुनौतियां कम नहीं थीं. उग्रवाद, राजनीतिक अस्थिरता और विकास की धीमी गति ने सरकार के कामकाज को प्रभावित किया. 2001 में फिर चुनाव हार गए. इस बार कांग्रेस की जीत हुई और पहली बार कांग्रेस के तरुण गोगोई सीएम बने. उसके बाद गोगोई लगातार तीन बार प्रदेश के सीएम रहे. अब उनके बेटे गौरव गोगोई सीएम हिमंता बिस्वा सरमा को इस बार चुनौती दे रहे हैं.
जनता सत्ता बदल सकती है, पर उसे चलाना मुश्किल क्यों?
यानी प्रफुल की पूरी कहानी सिर्फ एक आम युवा की कहानी नहीं है. यह उस लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कहानी है, जहां सड़क पर शुरू हुआ आंदोलन सत्ता तक पहुंचता है. लेकिन सत्ता में पहुंचने के बाद असली परीक्षा शुरू होती है. प्रफुल्ल कुमार महंता की यात्रा यह सिखाती है कि आंदोलन से परिवर्तन संभव है, लेकिन शासन के लिए केवल भावनाएं नहीं, बल्कि अनुभव, रणनीति और स्थिर प्रशासन की भी जरूरत होती है. असम की यह कहानी आज भी एक उदाहरण है कि जनता जब एकजुट होती है, तो इतिहास बदल सकती है. लेकिन उस इतिहास को सफलतापूर्वक चलाना उतना ही कठिन होता है जितना उसे बनाना.




