Begin typing your search...

Kisse Netaon Ke: कहानी जलते असम को बदलने वाले तरुण गोगोई की, Talk और Trust से ऐसे लाए टर्निंग प्वॉइंट

तरुण गोगोई ने “Talk, Trust & Development” के जरिए असम में उग्रवाद को कमजोर किया. उनकी रणनीति ने राज्य को हिंसा से निकालकर स्थिरता और विकास की राह पर डाला.

Tarun Gogoi Insurgency Talk Trust Development  Assam Assembly Elections 2026
X

असम के पूर्व सीएम तरुण गोगोई 

असम की राजनीति का एक दौर ऐसा भी था, जब राज्य की पहचान विकास से ज्यादा उग्रवाद के कारण बंद, अशांति और अस्थिरता से जुड़ी थी. 1990 के दशक में हालात इतने खराब थे कि आम लोगों के जीवन में भय अभिन्न हिस्सा माना जाता था. ऐसे समय में जब तरुण गोगोई 2001 में सत्ता में आए, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सरकार चलाना नहीं, बल्कि पूरे राज्य को 'संकट से स्थिरता' की ओर ले जाना था.

उन्होंने इसी चुनौती का जवाब अपने खास फॉर्मूले - “Talk, Trust & Development” यानी बातचीत, भरोसा और विकास के जरिए दिया, जो आगे चलकर असम की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट बना. इसके बाद उन्हें असम के “stability architect” के रूप में याद किया जाने लगा. यही वजह है कि तरुण गोगोई ने अपने दम पर 15 साल तक सीएम रहे और चरम उग्रवाद के दौर में भी कांग्रेस वहां सत्ता पर काबिज रही. 2026 चुनाव प्रचार में गौरव गोगोई को क्यों माना जाता है हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ अहम चेहरा, इसे जानने के लिए समझें तरुण गोगोई के सियासी सूझबूझ की कहानी.

असम में उग्रवाद इतना बड़ा संकट क्यों बन गया था?

1990 के दशक तक असम में यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ इंडिया (ULFA) जैसे उग्रवादी संगठनों का प्रभाव काफी बढ़ चुका था. लगातार बम धमाके, अपहरण, बंद और हिंसा ने राज्य को लगभग ठहराव की स्थिति में पहुंचा दिया था. निवेश रुक गया था, प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई थी. आम जनता का भरोसा सरकार से उठ चुका था. असम के लोग एक तरह से देश की सियासी मुख्यधारा से खुद को कटा हुआ मानने लगे थे. ऐसे माहौल में सिर्फ सैन्य कार्रवाई से समस्या का समाधान संभव नहीं लग रहा था. उस समय, असम में अलग-अलग समय पर कई उग्रवादी संगठन सक्रिय रहे, जिनमें सबसे प्रमुख हैं और प्रभावशाली उग्रवादी संगठन ULFA, NDFB, KLO, DHD और MULTA सीमित प्रभाव वाला संगठन है. 1990–2000 के दशक में इन संगठनों के कारण असम में हिंसा, अपहरण और बंद आम बात थी.

‘Talk’ यानी बातचीत की नीति ने क्या बदला?

असम की सियासी नजाकत को देखते हुए तरुण गोगोई ने शुरुआत से ही साफ कर दिया कि उग्रवाद को सिर्फ बंदूक से नहीं हराया जा सकता. उन्होंने उग्रवादी संगठनों के लिए बातचीत के दरवाजे खोले और शांति वार्ता को प्राथमिकता दी. आत्मसमर्पण और पुनर्वास योजनाओं को बढ़ावा दिया, जिससे कई छोटे संगठनों ने हथियार छोड़ने का फैसला किया. इस नीति ने हिंसा के चक्र को धीरे-धीरे कमजोर किया और समाधान की दिशा में रास्ता खोला.

बुक ULFA: The Mirage of Dawn - संजिब बरुआ और The Assam Movement: Class, Ideology and Identity – मोनिरुल हुसैन में जिक्र है कि 2004 से 2005 में जब ब्रह्मपुत्र में भारी बाढ़ आई, तो गोगोई सिर्फ हेलिकॉप्टर सर्वे तक सीमित नहीं रहे. बरुआ की पुस्तक के मुताबिक वे सीधे नाव से बाढ़ प्रभावित गांवों में पहुंच गए. राहत कैंपों में लोगों के साथ बैठकर खाना खाया. स्थानीय लोगों से पूछा “सरकार क्या सही कर रही है और क्या नहीं?” इस दौरान मीडिया में गोगोई की यह छवि बनी कि, “CM जो सिर्फ आदेश नहीं देता, बल्कि सभी की सुनता भी है.”

गोगोई के कामकाज का एक और उदाहरण ULFA हिंसा के समय (2000s) कई इलाकों में तनाव के बावजूद उन्होंने सिविल सोसाइटी, छात्र संगठनों और स्थानीय नेताओं से लगातार संवाद बनाए रखा. इससे असम में “डर की राजनीति” से “डायलॉग की राजनीति” का रास्ता खुला.

‘Trust’ कैसे बना उनकी राजनीति की सबसे बड़ी ताकत?

तरुण गोगोई के दौर में असम में सबसे बड़ी समस्या सिर्फ उग्रवाद नहीं, बल्कि सरकार और जनता के बीच भरोसे की कमी थी. गोगोई ने प्रशासन को जमीनी स्तर तक एक्टिव किया, सरकारी योजनाओं की पहुंच गांवों तक बढ़ाई और लोगों को यह एहसास दिलाया कि सरकार मौजूद है और उनकी सुनती है. उन्होंने खुद भी जनता से सीधे संवाद शुरू किया. तरुण गोगोई ने 2001–2016 तक के अपने कार्यकाल में विकास को उग्रवाद के जवाब के रूप में इस्तेमाल किया. ग्रामीण सड़कों और कनेक्टिविटी पर जोर देते हुए नेशनल हाईवे बनवाए, नदियों पर पुल के निर्माण कराए.

शिक्षा के क्षेत्र में कॉलेज और यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई. स्कूलों का निर्माण करा दूर दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की अलख जगाई. जिला अस्पतालों और हेल्थ सेंटर का विस्तार और मातृ-शिशु स्वास्थ्य योजनाओं पर जोर दिया. पावर प्रोजेक्ट्स और इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देने की कोशिश की. इससे लोगों के बीच उपजा भरोसा ही आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी बना और लोगों ने हिंसा के बजाय व्यवस्था पर विश्वास करना शुरू कर दिया.

‘Development’ ने कैसे बदला असम का पूरा नैरेटिव?

उस समय में असम के सीएम रहे गोगोई का मानना था कि जहां विकास नहीं होता, वहां असंतोष और उग्रवाद पनपता है. इसलिए उन्होंने सड़कों, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण कनेक्टिविटी पर जोर दिया. दूरदराज इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ने और केंद्र सरकार की योजनाओं को तेजी से लागू करने पर फोकस किया गया.

उग्रवाद पर इस मॉडल का क्या असर पड़ा?

गोगोई के त्रिस्तरीय रणनीति का असर धीरे-धीरे लोगों के बीच कुछ समय बाद दिखने लगा. हिंसा की घटनाओं में कमी आई, कई उग्रवादी समूहों ने आत्मसमर्पण किया और युवाओं का रुझान बंदूक से हटकर शिक्षा और रोजगार की ओर बढ़ा. असम, जो कभी “conflict zone” माना जाता था, धीरे-धीरे “stability phase” में प्रवेश कर गया.

बोडोलैंड क्षेत्र में शांति कैसे संभव हुई?

Bodoland Territorial Region में भी इस नीति का असर देखने को मिला. संवाद बढ़ा, क्षेत्रीय राजनीतिक ढांचे को मजबूत किया गया और विकास योजनाओं को प्राथमिकता दी गई. कई उग्रवादी गुट मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हुए, जिससे वहां हिंसा के स्तर में गिरावट आई. कोकराझार, चिरांग, बक्सा, उदलगुड़ी जिसे पहले Bodoland Territorial Area Districts (BTAD) बनाया. ताकि क्षेत्र में विकास को मूर्त रूप देना संभव हो सके. साल 2020 के बाद नए समझौते के तहत इसका नाम बदलकर BTR (Bodoland Territorial Region) किया गया है. यहां बोडो समुदाय की बड़ी आबादी है और इसे एक स्वायत्त परिषद (BTC) के जरिए संचालित किया जाता है.

क्या यह मॉडल पूरी तरह सफल रहा या सीमाएं भी रहीं?

तरुण गोगोई के इस मॉडल को व्यापक सफलता मिली, लेकिन इसकी सीमाएं भी उभरकर सामने आईं. उग्रवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, कुछ इलाकों में हिंसा बनी रही और विकास सभी क्षेत्रों में समान रूप से नहीं पहुंच सका. फिर भी, यह कहना गलत नहीं होगा कि गोगोई ने असम को “अराजकता से स्थिरता” की दिशा में मोड़ने में अहम भूमिका निभाई.

क्यों आज भी ‘Talk, Trust & Development’ की चर्चा होती है?

ऐसे में जब असम में चुनाव का दौर चरम पर है, गोगोई का मॉडल इसलिए खास माना जाता है क्योंकि इसमें संतुलन था. सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि संवाद, सिर्फ विकास नहीं, बल्कि भरोसा और सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि सामाजिक समावेशन. यही कारण है कि आज भी असम की स्थिरता और विकास की चर्चा में यह मॉडल एक रेफरेंस पॉइंट बनकर सामने आता है.

असम अकॉर्ड को आगे बढ़ाने में गोगोई की भूमिका क्या?

असम समझौता (Assam Accord) 15 अगस्त 1985 को केंद्र सरकार, असम सरकार और छात्र संगठन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के बीच हुआ समझौता था. इसकी जड़ें 1979 से शुरू हुए असम आंदोलन में थीं, जिसका मुख्य मुद्दा बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों की पहचान और निष्कासन था. छह साल तक चले आंदोलन के बाद यह समझौता शांति और समाधान के रोडमैप के रूप में सामने आया.

असम अकॉर्ड के तहत 24 मार्च 1971 को कट-ऑफ तारीख माना गया. इस तारीख के बाद राज्य में आए अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें हटाने का प्रावधान किया गया. साथ ही, असमिया लोगों की सांस्कृतिक, भाषाई और राजनीतिक पहचान की रक्षा का वादा किया गया. आर्थिक विकास, रोजगार और बुनियादी ढांचे के विस्तार का भी आश्वासन दिया गया, उनके समय में इस पर काम तो शुरू हुआ, पर पूरा होने सेस पहले कांग्रेस 2016 का विधानसभा चुनाव हार गई.

उसी प्रक्रिया को नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) मोदी सरकार के दौरान पूरा किया गया, जो विवाद का विषय बना. इस कांग्रेस के हमले के जवाब में बीजेपी ने कहा था कि यह प्रक्रिया तो कांग्रेस के दौर में ही शुरू हो गई थी. इस योजना के तहत 1971 के बाद आए अवैध प्रवासियों की पहचान करना था, जिसका अंतिम ड्राफ्ट 2019 में प्रकाशित हुआ. इसके अलावा सीमा प्रबंधन मजबूत करने, बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने और पहचान प्रक्रिया को तेज करने के प्रयास जारी है.

तरुण गोगोई का मॉडल सिर्फ नीतियों का नहीं था, बल्कि ग्राउंड कनेक्ट + संवाद + विकास का कॉम्बिनेशन था. उन्होंने असम में यह साबित किया कि, “उग्रवाद का जवाब सिर्फ बंदूक नहीं, भरोसा और विकास भी हो सकता है.

किस्‍से नेताओं केविधानसभा चुनाव 2026
अगला लेख