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मैं चलती कार से कूदना चाहता था, पूर्व क्रिकेटर Laxman Sivaramakrishnan क्यों हो गए थे इतने दुखी?

पूर्व क्रिकेटर शिवरामकृष्णन ने अपने जीवन के दर्दनाक अनुभव साझा किए, जिसमें मानसिक संघर्ष और नस्लवाद शामिल है. उन्होंने कमेंट्री करियर में भी रंगभेद और अपमान का सामना करने का खुलासा किया.

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( Image Source:  Instagram: sivaramakrishnanlaxman )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय6 Mins Read

Published on: 26 March 2026 10:25 AM

पूर्व भारतीय स्पिन गेंदबाज लक्ष्मण शिवरामकृष्णन (Laxman Sivaramakrishnan) ने अपनी जिंदगी के कुछ बहुत मुश्किल और दर्द भरे अनुभवों के बारे में खुलकर बात की है. उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि दुबई में यात्रा करते समय कभी-कभी सड़कों पर गति सीमा नहीं होती थी. जब उनकी गाड़ी बहुत तेज़ चलने लगती, तो उनके मन में एक अजीब और खतरनाक विचार आता कि वे गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर बाहर कूद जाए.

लेकिन किसी न किसी वजह से, कोई अंदरूनी आवाज़ या भावना उन्हें ऐसी मूर्खतापूर्ण हरकत करने से रोक देती थी. उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे उनकी नींद पूरी तरह से उड़ गई थी. सोना बहुत मुश्किल हो गया था. जब वे आंखें बंद करते, तो उनके दिमाग में बहुत डरावनी और अजीब-अजीब इमेज आने लगतीं. ऐसी तस्वीरें जो वे अपनी कल्पना में भी नहीं सोच सकते थे. सब कुछ बहुत भयानक और डराने वाला लगता था.

क्या शराब ही थी सारी समस्या?

शिवरामकृष्णन का कहना है कि जैसे ही वे डरकर आंखें खोल देते, सब कुछ सामान्य हो जाता था. लेकिन वे इतने थके हुए और कमजोर महसूस करते थे कि फिर से सोने की कोशिश करते. आंखें बंद करते, थोड़ी देर बाद फिर खोल देते. इस तरह बार-बार करते-करते उनकी पूरी नींद खराब हो जाती थी. शिवरामकृष्णन ने यह भी कहा कि शराब पीने से यह समस्या और भी ज्यादा बढ़ जाती थी. हर बार शराब पीने के बाद स्थिति और बिगड़ जाती थी. वे खुद को और भी ज्यादा उलझन में डाल लेते थे और बाहर की दुनिया वाले लोग कहते, 'देखा, हमने पहले ही कहा था. शराब ही सारी समस्या की वजह है.'

फिजिकल अपीयरेंस के लिए ट्रोल

कमेंटेटर के रूप में अपने 23 साल लंबे करियर के दौरान भी उन्हें फिजिकल अपीयरेंस की वजह से काफी परेशानी का सामना करना पड़ा. उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी भी टॉस नहीं कराया और न ही किसी प्रेजेंटेशन में शामिल किया गया. एक बार उन्होंने एक प्रोड्यूसर से पूछा कि ऐसा क्यों होता है. प्रोड्यूसर ने साफ-साफ जवाब दिया, 'हमारे बॉस ने हमें सख्त निर्देश दिया है कि आपको ऐसे कामों पर न रखा जाए.' वजह बताई गई कि वे 'दिखने में अच्छे नहीं लगते'.

जब क्रिकेटर की जगह कर्मचारी समझा

शिवरामकृष्णन ने आगे कहा, 'इस फील्ड में सबसे ज्यादा करिश्माई और बेहतरीन कमेंटेटर विजय अमृतराज माने जाते हैं क्या उनका रंग भी गोरा नहीं है? उनका रंग भी तो सांवला ही है.' उन्होंने इन सब अनुभवों को अपने क्रिकेट करियर के शुरुआती दिनों से जोड़ा. जब वे सिर्फ 14 साल के थे, तब चेपॉक स्टेडियम में नेट बॉलर के रूप में काम करते थे. एक बार एक सीनियर खिलाड़ी ने उन्हें मैदान का कर्मचारी समझ लिया. शिवरामकृष्णन ने उस समय बस उनकी तरफ देखा और शांति से कहा, 'इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है.'

नस्लवाद के दुखद खुलासे

उन्होंने भारतीय टीम के ड्रेसिंग रूम के अंदर भी नस्लवाद के कुछ बहुत डरावने और दुखद अनुभवों के बारे में खुलकर बताया. शिवरामकृष्णन ने अप्रैल 1983 में एंटीगुआ में अपना टेस्ट डेब्यू किया था. उस समय उनकी उम्र सिर्फ 17 साल और 118 दिन थी. उस समय वे भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेलने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बने थे. उस दौरे के दौरान उन्होंने बताया कि वे भारतीय ड्रेसिंग रूम की बजाय वेस्ट इंडीज के ड्रेसिंग रूम में ज्यादा समय बिताते थे. उन्होंने कहा कि समय के साथ ऐसी नस्लवादी टिप्पणियां और व्यवहार उनके आत्मविश्वास को बहुत कमजोर करते गए.

रंग के लिए दिखाया गया नीचा

शिवरामकृष्णन ने कहा, 'मेरे रंग के अंधेरेपन की वजह से लोग मुझे नीचा दिखाते थे. हर बार ऐसा होने पर मुझे बहुत दुख होता था. मैं हमेशा इन बातों को भूलना चाहता था, लेकिन ये बातें मेरे मन के अंदर कहीं गहरे में बैठी रहती थीं. कभी न कभी ये बाहर आ ही जाती थीं. इन सब अनुभवों ने मुझे इतना प्रभावित किया कि बहुत कम उम्र में ही मेरा आत्मविश्वास काफी कम हो गया. आत्मविश्वास बनाना बहुत मुश्किल काम है. लेकिन इसके ठीक उलट, वेस्ट इंडीज दौरे के दौरान उन्हें बहुत अपनापन और सम्मान महसूस हुआ. wahanके खिलाड़ी मैल्कम मार्शल और डेसमंड हेन्स जैसे दिग्गज उन्हें अक्सर सैर पर ले जाते थे.

गॉर्डन ग्रीनडिज का जिक्र

शिवरामकृष्णन ने खुशी से याद करते हुए कहा, 'वहां के सभी खिलाड़ियों का रंग सांवला था. वे बहुत खुशमिजाज और मिलनसार लोग थे.' उन्होंने गॉर्डन ग्रीनडिज के साथ हुई एक यादगार बातचीत का भी जिक्र किया. ग्रीनडिज ने उन्हें बताया था कि उन्होंने भी इंग्लैंड में इसी तरह की नस्लवादी समस्याओं का सामना किया था. ग्रीनडिज ने कहा था, 'मैंने भी ये सब झेला है, इसलिए मैं बस अपना काम करता हूं अपना क्रिकेट खेलता हूं और आगे बढ़ जाता हूं.'

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