न नहाने को मिलता, न ठीक से रहने को, 16-16 घंटे तक काम, रूस में जानवरों से भी बदतर है North Korea के मजदूरों की दर्द भरी कहानी
रूस में North Korea के मजदूरों की दर्दनाक हालत सामने आई है। 16-16 घंटे काम, बेहद खराब रहन-सहन और बुनियादी अधिकारों से वंचित जिंदगी -जानिए पूरी सच्चाई.
बर्फ से ढकी सड़कों वाले Russia के शहरों में, जहां बाहर से सब कुछ सामान्य दिखता है, वहीं एक अदृश्य दुनिया भी बसी है. वो दुनिया है दर्द, मजबूरी और खामोशी की. इस दुनिया में रहने वाले लोग न तो खुलकर हंस सकते हैं, न अपनी तकलीफ किसी से कह सकते हैं. इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक ये North Korea से आए वो मजदूर हैं, जिन्हें बेहतर भविष्य के सपने दिखाकर विदेश भेजा जाता है, लेकिन हकीकत में वे एक ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर होते हैं, जहां इंसान और कैदी के बीच का फर्क मिट जाता है.
Kim Jong Un के विदेशी मजदूर कार्यक्रम के तहत हजारों लोग रूस के निर्माण स्थलों, फैक्ट्रियों और बंद पड़े कंटेनरों में अपनी जिंदगी खपा रहे हैं, जहां 16-16 घंटे काम, नाम मात्र की तनख्वाह और बुनियादी अधिकारों का पूरी तरह अभाव उनकी रोजमर्रा की सच्चाई है. यह कहानी सिर्फ मेहनत की नहीं, बल्कि उस दर्दनाक सच्चाई की है, जहाँ इंसान की कीमत एक “कोटा” से भी कम रह जाती है.
रात के सन्नाटे में जंग लगे उस शिपिंग कंटेनर के भीतर बदबू, पसीने और थकान का घना अंधेरा. 20 लोग, एक छोटे से कमरे में, बारी-बारी से करवट बदलते हैं, क्योंकि सबके लिए एक साथ पैर फैलाने की जगह नहीं है. यही “घर” है गुम्युक किम का 29 साल का वह युवक, जिसे Kim Jong Un के विदेशी मजदूर कार्यक्रम के तहत Russia भेजा गया. उसे याद नहीं कि उसने आखिरी बार खुलकर कब नहाया था.
'सिर्फ चेहरा धो लेना ही काफी है'
सुबह 6 बजे अलार्म नहीं बजता, क्योंकि यहाँ नींद ही पूरी नहीं होती. 16 घंटे की लगातार मेहनत, हड्डियों को तोड़ देने वाली ठंड, और फिर उसी कंटेनर में लौटकर सो जाना. यही रोज़ का चक्र है. गुम्युक कहता है, “नहाने की कोई सुविधा नहीं है… हम बस नल के पानी से चेहरा धो लेते हैं. कभी-कभी तो वह भी नहीं मिलता.” एक साल में एक या दो बार नहाने की इजाज़त, यह सुनने में अविश्वसनीय लगता है, लेकिन यही हकीकत है उन हज़ारों उत्तर कोरियाई मज़दूरों की, जो North Korea से बाहर भेजे जाते हैं.
सपनों का सौदा, हकीकत का नरक
गुम्युक जब प्योंगयांग से निकला था, उसके मन में उम्मीद थी, “रूस जाऊंगा, पैसे कमाऊंगा, परिवार की जिंदगी बेहतर होगी.” लेकिन उसे नहीं बताया गया था कि उसका पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया जाएगा, उसे हर दिन 16 घंटे काम करना होगा, उसे महीने के सिर्फ़ 10 डॉलर मिलेंगे और उसकी कमाई का बड़ा हिस्सा सरकार ले लेगी. यह नौकरी नहीं, एक जाल था, जिसमें वह खुद चलकर फंस गया.
100,000 जिंदगियां, एक ही कहानी
विशेषज्ञों के अनुसार, लगभग 1 लाख उत्तर कोरियाई मज़दूर चीन, रूस और अफ्रीकी देशों में काम कर रहे हैं. ये लोग निर्माण स्थलों, फैक्ट्रियों और खेतों में काम करते हैं, लेकिन मजदूर कम, कैदी ज़्यादा लगते हैं. United Nations ने 2017 में आदेश दिया था कि ऐसे मज़दूरों को 2019 तक वापस भेजा जाए. लेकिन ज़मीनी सच्चाई अलग है. रूस में इनकी संख्या बढ़ती जा रही है.
कोटा – जिंदगी से बड़ा नियम
हर मजदूर के ऊपर एक अदृश्य बोझ है - कोटा. गुम्युक बताता है, “हर दोपहर मैं यही सोचता हूँ कि क्या मैं इस महीने का कोटा पूरा कर पाऊँगा… अगर नहीं किया, तो क्या होगा?” इस कोटे का मतलब है तय रकम हर हाल में कमानी होगी. चाहे बीमार हों, घायल हों या मर जाएं. काम रुकना नहीं चाहिए. कोटा सिर्फ आर्थिक नहीं है. यह डर का हथियार है.
चोट, बीमारी… सब 'रुकावट'
एक मजदूर के हाथ में गहरी चोट लग गई. खून बह रहा था. इलाज? सिर्फ नमक का पानी. “उसे कहा गया या तो इसे घाव पर डालो, या पी लो… और काम पर वापस जाओ.” यहां इंसान की कीमत मशीन से भी कम है.
जासूसी का जाल
इन मजदूरों की जिंदगी का सबसे डरावना हिस्सा सिरर्फ काम नहीं, बल्कि “निगरानी” है. उन्हें एक-दूसरे पर नज़र रखने को कहा जाता है. अगर कोई मोबाइल इस्तेमाल करता है, विदेशी फिल्में देखता है या भागने की कोशिश करता है. तो उसकी शिकायत कर दी जाती है. और फिर? उसे वापस उत्तर कोरिया भेज दिया जाता है, जहां सजा और भी भयावह हो सकती है.
परिवार - सबसे बड़ा बंधन
इन मजदूरों को चुनने का एक खास तरीका है. जिनके परिवार होते हैं. पत्नी, बच्चे, माता-पिता, उन्हें प्राथमिकता दी जाती है. पर क्यों? ताकि अगर वे भागने की कोशिश करें, तो उनके परिवार को सजी दी जा सके. यह सिर्फ मजदूरी नहीं. यह भावनात्मक कैद है.
युद्ध और सौदेबाजी
Vladimir Putin के Russia-Ukraine War ने इस पूरी कहानी को और गहरा बना दिया है. युद्ध के कारण - रूस में मजदूरों की कमी हो गई, सेना में भर्ती बढ़ी, लोग देश छोड़कर चले गए, ऐसे में उत्तर कोरिया ने मजदूर भेजे. बदले में? तकनीकी सहायता, सैन्य सहयोग और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में समर्थन. यह इंसानों का सौदा है, राजनीतिक फायदे के लिए.
'जानवरों से भी बदतर'
एक मजदूर ने कहा, “हम जानवरों से भी बदतर ज़िंदगी जी रहे हैं.” कड़ाके की ठंड में बिना सुरक्षा उपकरण के काम भूख, थकान और डर के बीच जीना और हर पल यह डर कि “अगर कोटा पूरा नहीं हुआ, तो क्या होगा?”
एक छोटी-सी खिड़की - दुनिया की झलक
कभी-कभी, जब उन्हें मौका मिलता है, वे इंटरनेट पर दक्षिण कोरिया के वीडियो देखते हैं. उनके लिए यह किसी दूसरी दुनिया जैसा है: आजादी, रोशनी, मुस्कुराते चेहरे. गुम्युक कहता है, “हमें तब समझ आता है कि दुनिया कितनी अलग है… और हम कितने पीछे हैं.” लेकिन यह झलक भी खतरनाक है. अगर पकड़े गए, तो सजा तय है. भागना आसान नहीं बहुत से मजदूर भागना चाहते हैं.
लेकिन, पासपोर्ट नहीं, भाषा नहीं, पैसे नहीं और सबसे बड़ा परिवार की चिंता. इसलिए वे रहते हैं… सहते हैं… और हर दिन जीते हैं. अंत नहीं, सिर्फ़ इंतज़ार. रात फिर लौट आती है. कंटेनर के अंदर वही बदबू, वही थकान, वही खामोशी. गुम्युक छत को देखता है और सोचता है, “क्या मैं कभी घर लौट पाऊँगा?”
उसके पास कोई जवाब नहीं है. लेकिन अगली सुबह, 16 घंटे का काम उसका इंतज़ार कर रहा है. यह सिर्फ़ एक गुम्युक किम की कहानी नहीं है. यह उन लाखों आवाज़ों की कहानी है, जो दबा दी गई हैं, जहाँ इंसान काम करता है, लेकिन जीता नहीं. और दुनिया… बस देखती रहती है.
क्या है मामला?
नॉर्थ कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने देश के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों के लिए पैसा जुटाने के मकसद से, इन मजदूरों के बुनियादी अधिकारों को भी छीन लिया है. इन्हें नॉर्थ कोरियाई सरकार एक खास योजना के तहत चुनती है और एक रूसी सरकार से एक अनुबंध के तहत उन्हें मजदूर के रूप में काम करने के लिए वहां भेजा जाता है. ऐसा करते वक्त उन्हें ये नहीं बताया जाता कि वहां जाकर उन्हें नर्क से भी बदतर जिंदगी जीना होगा और परिवार वालों से मुलाकात की बात तो भूल जाएं.




