महाभारत के समय में कटोरे में भरे वीर्य से पैदा हुए थे द्रोणाचार्य, इस 'अप्सरा' को देख जागी थी वासना लेकिन...
महाभारत काल के महान गुरु द्रोणाचार्य के जन्म की कथा बेहद अनोखी और रहस्यमयी मानी जाती है. पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, महर्षि भरद्वाज ने गंगा में स्नान करती अप्सरा घृताची को देखा, जिससे उनके मन में क्षणिक कामभाव उत्पन्न हुआ. संयम के कारण उन्होंने अप्सरा को स्पर्श नहीं किया, लेकिन स्खलित वीर्य को एक पवित्र पात्र (द्रोण/कलश) में सुरक्षित रख दिया. उसी दिव्य पात्र से एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, जो आगे चलकर द्रोणाचार्य कहलाए.
महाभारत केवल युद्ध और राजनीति का ग्रंथ नहीं, बल्कि जन्म, कर्म और तपस्या की असाधारण कथाओं का भी महासंग्रह है. इन्हीं में से एक है आचार्य द्रोणाचार्य का जन्म. जिसे पौराणिक ग्रंथों में ‘अयोनिज’ कहा गया है. कहा जाता है कि द्रोणाचार्य का जन्म वीर्य से भरे एक पात्र (द्रोण/कलश) यानी कटोरे से हुआ, जिसने उन्हें इतिहास की सबसे अनोखी संतानों में शामिल कर दिया.
यह कथा जितनी रहस्यमयी है, उतनी ही विचारोत्तेजक भी. महर्षि भरद्वाज की तपस्या, अप्सरा घृताची का प्रसंग और पात्र में सुरक्षित वीर्य से तेजस्वी बालक का जन्म, इन सबने द्रोणाचार्य को पौराणिक परंपरा में एक विशिष्ट स्थान दिलाया. आइए जानते हैं पूरी कहानी, उसके विभिन्न मत और द्रोणाचार्य का जीवन-वृत्त.
महर्षि भरद्वाज- तप, ज्ञान और प्रभाव का अद्भुत संगम
प्राचीन भारत में महर्षि भरद्वाज का नाम अत्यंत आदर से लिया जाता था. वे बृहस्पति के पुत्र और कुबेर के नाना माने जाते हैं. रामायण और महाभारत- दोनों कालखंडों में उनकी उपस्थिति और प्रभाव मिलता है. चरक संहिता के अनुसार, भरद्वाज ने इंद्र से आयुर्वेद और व्याकरण का ज्ञान प्राप्त किया. महाभारत में उन्हें सप्तर्षियों में एक माना गया है. त्रिकालदर्शी, महान चिंतक और तपस्वी के रूप में.
अप्सरा घृताची का प्रसंग- तपस्या की परीक्षा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार महर्षि भरद्वाज गंगा तट पर स्नान कर रहे थे. उसी समय अप्सरा घृताची वहां स्नान कर रही थीं. घृताची के सौंदर्य को देखकर ऋषि के मन में क्षणिक कामोत्तेजना जागी, परंतु उन्होंने आत्मसंयम रखा और उन्हें स्पर्श तक नहीं किया. इसी क्षण उनके शरीर से वीर्य स्खलित हुआ.
द्रोणाचार्य का जन्म कैसे हुआ
कथा कहती है कि महर्षि भरद्वाज ने उस स्खलित वीर्य को एक मिट्टी के पात्र- जिसे द्रोण या यज्ञकलश कहा जाता है . उसमें सुरक्षित रख दिया. समय बीतने पर उसी पात्र में एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ. पात्र से जन्म होने के कारण उसका नाम ‘द्रोण’ पड़ा, और आगे चलकर वही बालक ‘द्रोणाचार्य’ के नाम से विख्यात हुआ. इस कारण उन्हें भारत की प्राचीन परंपरा में ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ की अवधारणा से भी जोड़ा जाता है.
जन्म की दूसरी मान्यता
कुछ ग्रंथों में एक अन्य मत भी मिलता है- कि महर्षि भरद्वाज और अप्सरा घृताची के शारीरिक मिलन से द्रोण का जन्म हुआ. हालांकि, अधिकांश पौराणिक स्रोत पात्र से जन्म वाली कथा को प्रमुख मानते हैं. ‘द्रोण’ शब्द का अर्थ बर्तन, बाल्टी या तरकश भी बताया गया है.
कौन थीं अप्सरा घृताची?
घृताची कश्यप ऋषि और प्राधा की पुत्री मानी जाती हैं. पौराणिक परंपरा के अनुसार, उनसे अनेक संतानों का जन्म हुआ-रुद्राश्व से 10 पुत्र, कुशनाभ से 100 पुत्रियां, च्यवन-पुत्र प्रमिति से कुरु नामक पुत्र और वेदव्यास से शुकदेव. भरद्वाज से द्रोणाचार्य का जन्म इसी परंपरा का हिस्सा माना जाता है.
द्रोणाचार्य- श्रेष्ठ धनुर्धर और महान गुरु
द्रोणाचार्य अपने पिता के आश्रम में रहकर चारों वेदों और अस्त्र-शस्त्रों में पारंगत हुए. उन्हें संसार के श्रेष्ठ धनुर्धरों में गिना जाता है. परंपरा के अनुसार, उनका जन्म उत्तराखंड के देहरादून क्षेत्र में बताया जाता है- जिसे कभी ‘देहराद्रोण’ कहा जाता था. द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपि से हुआ और उनसे अश्वत्थामा का जन्म हुआ, जिन्हें चिरंजीवी माना जाता है. वे कौरवों और पांडवों- दोनों के गुरु थे, और अर्जुन उनके प्रिय शिष्य थे.
महाभारत युद्ध में भूमिका और अंत
यद्यपि द्रोणाचार्य का मन पांडवों के साथ था, लेकिन हस्तिनापुर के प्रति कर्तव्यबद्धता के कारण वे कौरवों की ओर से युद्ध में उतरे. युद्ध के 15वें दिन द्रोण और अश्वत्थामा ने पांडव सेना पर प्रचंड प्रहार किया. अंततः एक रणनीति के तहत छल से द्रोणाचार्य का वध हुआ. जो महाभारत का सबसे करुण अध्याय माना जाता है. आज के संदर्भ में यह कथा इसलिए भी चर्चा में रहती है क्योंकि आधुनिक विज्ञान मानव शुक्र को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की क्षमता स्वीकार करता है. इसी समानता के कारण द्रोणाचार्य की कथा को प्राचीन काल की असाधारण जैविक अवधारणा के रूप में देखा जाता है.





