क्यों Fantasy लगती है हकीकत? कैसे डालती है दिमाग पर असर
आज के समय में बच्चे ही नहीं, बड़े भी फिल्मों, वेब सीरीज़, गेम्स, कार्टून और सोशल मीडिया की फैंटेसी दुनिया में खोए रहते हैं. सुपरहीरो, जादुई शक्तियां, परफेक्ट लाइफ और अवास्तविक कहानियां लोगों को अट्रैक्ट करती हैं.
रवि को सुपरहीरो वाली वेब सीरीज़ बहुत पसंद थी. हर रात वह वही देखता और धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि असली दुनिया उतनी रोमांचक नहीं है. स्कूल, दोस्त, घर-सब उसे नॉर्मल लगने लगा. एक दिन उसने महसूस किया कि वह लोगों से भी उसी तरह की उम्मीद करने लगा है, जैसे किरदार स्क्रीन पर करते हैं. उसे समझ नहीं आया कि कब फैंटेसी की दुनिया उसकी सोच पर हावी हो गई और हकीकत फीकी लगने लगी.
यही फैंटसी की दुनिया के चलते उसके बिहेवियर में भी बदलाव दिखने लगा. थोड़ी फैंटेसी दिमाग को आराम देती है, लेकिन जब यही आदत हद से ज्यादा बढ़ जाए, तो परेशानी होती है. ऐसे में चलिए जानते हैं आखिर क्या होती है फैंटसी और कैसे यह हमारे दिमाग पर असर डालती है.
फैंटेसी क्या होती है?
फैंटेसी वह कल्पनात्मक दुनिया है, जो असल जिंदगी से अलग होती है. इसमें जादू, नामुमकिन चीजें, परफेक्ट किरदार और अनरियल सिचुएशन होती हैं. यह दिमाग को रोमांच और खुशी देती है, इसलिए लोग इसमें जल्दी जुड़ जाते हैं.
दिमाग फैंटेसी की ओर क्यों खिंचता है?
साइकोलॉजी के अनुसार, हमारा दिमाग उन चीजों की ओर ज्यादा अट्रैक्ट होता है जो हमें खुशी, रोमांच और सुकून दें. जब असली जिंदगी में तनाव, दबाव या बोरियत होती है, तो फैंटेसी एक ‘एस्केप’ का काम करती है. यानी इंसान कुछ समय के लिए अपनी परेशानियों को भूल जाता है.
रियलिटी और फैंटेसी में फर्क कम होना
जब कोई शख्स लंबे समय तक फैंटेसी कंटेंट देखता है, तो उसके दिमाग में रियलिटी और कल्पना के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है. खासकर बच्चों और किशोरों में यह असर जल्दी दिखाई देता है. वे असली दुनिया से वैसी ही उम्मीद करने लगते हैं, जैसी उन्होंने स्क्रीन पर देखी होती है.
बिहेवियर में बदलाव
- लोग असली जिंदगी से असंतुष्ट रहने लगते हैं
- धैर्य कम हो जाता है
- जल्दी निराशा होने लगती है
- दूसरों से तुलना बढ़ जाती है
साइकोलॉजिस्ट बताते हैं कि ज्यादा फैंटेसी देखने से व्यक्ति ‘इमेजिनेशन’ में जीने लगता है और असली समस्याओं से भागने लगता है.
किन पर डालती है ज्यादा असर
बच्चों का दिमाग अभी विकसित हो रहा होता है. वे जो देखते हैं, उसे जल्दी सच मान लेते हैं. अगर वे लगातार फैंटेसी कंटेंट देखते हैं, तो वे असल जिंदगी को उतना रोचक नहीं मानते. इससे पढ़ाई, खेलकूद और सोशल बिहेवियर पर असर पड़ता है.
इमोशनल असर
फैंटेसी दुनिया में सब कुछ परफेक्ट दिखाया जाता है. इससे व्यक्ति को अपनी जिंदगी अधूरी लगने लगती है. यह भावना धीरे-धीरे तनाव, अकेलापन और उदासी का कारण बन सकती है.
साइकोलॉजी क्या कहती है?
मनोविज्ञान के अनुसार, सीमित मात्रा में फैंटेसी दिमाग के लिए अच्छी हो सकती है. यह रचनात्मक सोच बढ़ाती है, लेकिन जरूरत से ज्यादा फैंटेसी मानसिक संतुलन बिगाड़ सकती है. इसलिए संतुलन बहुत जरूरी है.





