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खुशी के पलों में भी आंसू, बच्चे के जन्म के बाद क्यों टूटने लगती हैं कई मांएं? जानें Postpartum Depression का सच

Postpartum Depression एक ऐसा सच है जो काफी महिलाएं आज के दौर में फेस करती हैं. बच्चा होने के बाद शरीर में हो रहे बदलाव और समाज की तरह-तरह की अपेक्षाएं इस डिप्रेशन को जन्म देती है,

खुशी के पलों में भी आंसू, बच्चे के जन्म के बाद क्यों टूटने लगती हैं कई मांएं? जानें Postpartum Depression का सच
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( Image Source:  AI GENERATED IMAGE- SORA )
समी सिद्दीकी
By: समी सिद्दीकी11 Mins Read

Updated on: 23 March 2026 8:21 AM IST

Postpartum Depression: बच्चे का जन्म किसी भी परिवार के लिए सबसे बड़ी खुशियों में से एक होता है. लेकिन इसी खुशी के बीच कई नई मांएं अचानक उदासी, बेचैनी, थकान और भावनात्मक टूटन महसूस करने लगती हैं. समाज अक्सर इस स्थिति को समझ नहीं पाता और इसे कमजोरी या “मूड स्विंग” कहकर नजरअंदाज कर देता है. जबकि हकीकत यह है कि यह एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य स्थिति हो सकती है, जिसे पोस्टपार्टम डिप्रेशन कहा जाता है.

अकसर लोग पोस्टपार्टम डिप्रेशन के बारे में समझ नहीं पाते हैं और खुद महिलाएं इस समस्या से जूझ रही होती हैं और वह इसे सही तरह से समझ नहीं पाती हैं. इस आर्टिकल में आज हम आपको इसके बारे में डिटेल जानकारी देने वाले हैं. तो आइये जानत हैं.

पोस्टपार्टम डिप्रेशन क्या है?

पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक प्रकार का डिप्रेशन है जो बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं में विकसित होता है. यह सामान्य “बेबी ब्लूज” से अलग और अधिक गंभीर होता है. बेबी ब्लूज आमतौर पर कुछ दिनों से लेकर दो हफ्तों में ठीक हो जाता है, लेकिन पोस्टपार्टम डिप्रेशन हफ्तों, महीनों या कभी-कभी सालों तक भी रह सकता है.

चिकित्सकीय रूप से, यह स्थिति हार्मोनल बदलाव, मानसिक दबाव, नींद की कमी और सामाजिक हालातों से पैदा होती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 10 से 20 प्रतिशत महिलाएं बच्चे के जन्म के बाद इस समस्या का सामना करती हैं.

क्या होते हैं पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण?

पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण हर महिला में अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन कुछ सामान्य संकेत इस प्रकार हैं:

लगातार उदासी या खालीपन महसूस होना

  • बिना किसी स्पष्ट कारण के रोना
  • बच्चे के साथ जुड़ाव महसूस न होना
  • अत्यधिक थकान या ऊर्जा की कमी
  • नींद की समस्या, चाहे बच्चा सो रहा हो
  • खुद को बेकार या दोषी महसूस करना
  • भूख में कमी या अधिक खाना
  • चिंता, घबराहट या पैनिक अटैक
  • खुद को या बच्चे को नुकसान पहुंचाने के विचार

इन लक्षणों की तीव्रता हल्की से लेकर गंभीर तक हो सकती है. अगर ये लक्षण दो हफ्तों से ज्यादा समय तक बने रहते हैं, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

हार्मोनल बदलाव की क्या है भूमिका?

गर्भावस्था के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन का स्तर बहुत अधिक होता है. बच्चे के जन्म के बाद ये हार्मोन अचानक गिर जाते हैं. यह गिरावट मस्तिष्क के रसायनों को प्रभावित करती है, जिससे मूड में बदलाव, उदासी और चिंता बढ़ सकती है. इसके अलावा, थायरॉयड हार्मोन में भी बदलाव हो सकता है, जो थकान और अवसाद के लक्षणों को और बढ़ा देता है.

नींद की कमी और शारीरिक थकान भी है क्या कारण?

नवजात शिशु की देखभाल में मां को बार-बार उठना पड़ता है. नींद पूरी न होने से शरीर और दिमाग दोनों पर असर पड़ता है. लगातार थकान से चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी और भावनात्मक असंतुलन बढ़ सकता है. रिसर्च बताते हैं कि नींद की कमी पोस्टपार्टम डिप्रेशन के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक है.

इनके अलावा और क्या कारण हो सकते हैं?

मां बनने के साथ ही एक महिला की जिम्मेदारियां अचानक बढ़ जाती हैं. उसे बच्चे की देखभाल, घर के काम और कई बार करियर के बीच संतुलन बनाना पड़ता है. इसके अलावा, “परफेक्ट मां” बनने का सामाजिक दबाव भी मानसिक तनाव बढ़ाता है. कई महिलाएं अपने शरीर में हुए बदलावों को लेकर भी असहज महसूस करती हैं. आत्मविश्वास में कमी और पहचान के संकट की भावना भी अवसाद को जन्म दे सकती है.

सामाजिक और पारिवारिक कारण भी है क्या वजह?

परिवार का सहयोग पोस्टपार्टम डिप्रेशन से निपटने में अहम भूमिका निभाता है. जिन महिलाओं को भावनात्मक या व्यावहारिक सहयोग नहीं मिलता, उनमें इस समस्या का खतरा ज्यादा होता है. वैवाहिक तनाव, आर्थिक समस्याएं, अकेलापन या परिवार से दूर रहना भी जोखिम बढ़ाते हैं. कुछ मामलों में, घरेलू हिंसा या संबंधों में अस्थिरता भी अवसाद का कारण बन सकती है.

पोस्टपार्टम डिप्रेशन के कारण
🧬
हार्मोनल बदलाव
डिलीवरी के बाद एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन अचानक कम हो जाते हैं, जिससे मूड स्विंग, उदासी और चिंता बढ़ सकती है।
😴
नींद की कमी
बार-बार उठने से नींद पूरी नहीं होती, जिससे थकान, चिड़चिड़ापन और मानसिक असंतुलन बढ़ता है।
⚖️
जिम्मेदारियों का दबाव
बच्चे, घर और करियर के बीच संतुलन बनाने का दबाव मानसिक तनाव को बढ़ा देता है।
💭
आत्मविश्वास की कमी
शरीर में बदलाव और “परफेक्ट मां” बनने का दबाव आत्मविश्वास को प्रभावित करता है।
👨‍👩‍👧
परिवार का सहयोग
भावनात्मक और व्यावहारिक सपोर्ट की कमी अवसाद के खतरे को बढ़ाती है।
💔
सामाजिक कारण
वैवाहिक तनाव, आर्थिक परेशानी, अकेलापन या घरेलू हिंसा भी जोखिम बढ़ाते हैं।

किसे ज्यादा खतरा होता है?

हर महिला में पोस्टपार्टम डिप्रेशन नहीं होता, लेकिन कुछ स्थितियां जोखिम बढ़ा सकती हैं:

  • पहले से डिप्रेशन की हिस्ट्री
  • गर्भावस्था के दौरान तनाव
  • असमय या जटिल प्रसव
  • बच्चे का अस्वस्थ होना
  • सपोर्ट सिस्टम की कमी
  • आर्थिक या पारिवारिक समस्याएं

बेबी ब्लूज और पोस्टपार्टम डिप्रेशन में अंतर है?

बेबी ब्लूज एक हल्की और अस्थायी स्थिति होती है, जिसमें मां को हल्की उदासी, भावुकता और चिड़चिड़ापन महसूस होता है. यह आमतौर पर डिलीवरी के 3 से 5 दिन बाद शुरू होता है और दो हफ्तों के भीतर खत्म हो जाता है. वहीं पोस्टपार्टम डिप्रेशन अधिक गंभीर और लंबे समय तक रहने वाली स्थिति है, जिसमें रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगते हैं और पेशेवर इलाज की जरूरत पड़ती है.

इलाज और उपचार के क्या तरीके हैं?

पोस्टपार्टम डिप्रेशन का इलाज संभव है और समय पर मदद मिलने पर स्थिति में काफी सुधार हो सकता है. उपचार के मुख्य तरीके हैं:

  • मनोचिकित्सा

काउंसलिंग या टॉक थेरेपी के जरिए महिला अपनी भावनाओं को समझ और व्यक्त कर सकती है. यह तनाव को कम करने और सोचने के तरीके को बेहतर बनाने में मदद करता है.

  • दवाइयां

कुछ मामलों में डॉक्टर एंटीडिप्रेसेंट दवाइयां दे सकते हैं. ये दवाइयां मस्तिष्क के रसायनों को संतुलित करने में मदद करती हैं. स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए सुरक्षित दवाइयों का चयन किया जाता है.

  • सपोर्ट सिस्टम

परिवार और दोस्तों का सहयोग बेहद जरूरी होता है. छोटी-छोटी मदद, जैसे बच्चे की देखभाल में हाथ बंटाना या भावनात्मक समर्थन देना, बहुत फर्क डाल सकता है.

  • जीवनशैली में बदलाव

पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, हल्का व्यायाम और खुद के लिए समय निकालना मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है.

क्या पुरुष भी प्रभावित होते हैं?

हाल के शोध बताते हैं कि बच्चे के जन्म के बाद कुछ पुरुषों में भी अवसाद के लक्षण देखे जा सकते हैं. इसे फादर पोस्टपार्टम डिप्रेशन कहा जाता है. हालांकि यह महिलाओं की तुलना में कम होता है, लेकिन इसे भी गंभीरता से लेना जरूरी है.

पोस्टपार्टम डिप्रेशन के बारे में जागरूकता की कमी एक बड़ी समस्या है. कई महिलाएं अपने लक्षणों को छिपाती हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि लोग उन्हें “अच्छी मां” नहीं समझेंगे. स्वास्थ्य सेवाओं में इस विषय को प्राथमिकता देना और नियमित जांच के दौरान मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है. मीडिया और समाज को भी इस मुद्दे पर संवेदनशीलता दिखानी चाहिए.

कब डॉक्टर से संपर्क करें?

अगर किसी महिला को लगातार उदासी, चिंता या निराशा महसूस हो रही हो और यह उसकी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रही हो, तो उसे डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. विशेष रूप से, अगर खुद को या बच्चे को नुकसान पहुंचाने के विचार आ रहे हों, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है.

इन बातों का रखें ध्यान!

बच्चे का जन्म एक नई शुरुआत होती है, लेकिन यह हर महिला के लिए आसान नहीं होता. पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक वास्तविक और गंभीर समस्या है, जिसे समझने और स्वीकार करने की जरूरत है. यह कमजोरी नहीं, बल्कि एक चिकित्सकीय स्थिति है, जिसका इलाज संभव है. सही समय पर पहचान, उचित उपचार और परिवार का सहयोग मिल जाए, तो मां इस कठिन दौर से बाहर निकल सकती है और अपने मातृत्व का आनंद पूरी तरह से ले सकती है.

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