ब्लड रिपोर्ट्स सही, शरीर परेशान! क्या आप भी ‘सबक्लीनिकल डेफिशियेंसी’ समेत इन दिक्कतों के हैं शिकार?
अकसर लोग ब्लड टेस्ट कराते हैं और वह एकदम नॉर्मल आते हैं, लेकिन इसके बावजूद भी वह कमजोरी महसूस करते रहते हैं. इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. आइये जानते हैं.
कई लोगों के मन में यह पहेली हमेशा रहती है कि हमारे सभी ब्लड टेस्ट तो नॉर्मल आ रहे हैं, लेकिन फिर भी हमें थकान, चक्कर, ब्रेन फॉग, एंग्जायटी, हेयर फॉल, पेट दर्द, क्रैंप्स, इरेग्युलर पीरियड्स और वज़न बढ़ने जैसी समस्या क्यों हो रही है.
लाखों लोग हर साल यही सुनते हैं कि उनकी रिपोर्ट नॉर्मल है लेकिन जबकि वे बीमार महसूस करते हैं. वह अक्सर शरीर में थकान रहना, पीरियड्स का टाइम पर न आना, पैरों में लगातार दर्द रहना, लिबिडो का कम हो जाना और अकसर सिर में भारीपन या सिर दर्द की शिकायत रहना जैसी दिक्कतें फेस कर रहे होते हैं.
क्या ब्लड टेस्ट दिखाते हैं सब कुछ?
इंसान का शरीर इतना कॉम्पलेक्स बना हुआ है कि हमेशा ब्लड टेस्ट का एकदम नॉर्मल आना भी आपका हेल्दी होने की गांरटी नहीं देता है. लैब की तय रेंज एक औसत आबादी पर आधारित होती हैं- न कि आपकी जीवनशैली, तनाव स्तर, नींद, डाइट या मेटाबॉलिक स्थिति पर. कई बार समस्या शुरुआती स्तर पर होती है, जो ट्रे़डिशनल ब्लड टेस्ट में साफ दिखाई नहीं देती.
यह वही छुपी हुई हेल्थ समस्या है- जहां बीमारी कागज़ पर नहीं, लेकिन शरीर के भीतर चुपचाप बढ़ रही होती है. इस आर्टिकल में हम इसी चीज़ के बारे में विस्तार से बताने वाले हैं, ताकि आप खुद की हेल्थ को बेहतर कर सकें और एक चुस्त, दुरुस्त और हेल्दी ज़िंदगी जी सकें.
इस पूरी समस्या को लेकर हमने डॉक्टर राग़िब (MBBS, Kolkata) और Dr Bhanu Mishra (Consultant- Nephrologist
Fortis Hospital, ShalimarBagh) से बात की, उन्होंने जो जानकारी दी वह काफी हैरान कर देने वाली थी. ऐसा कई कारण से हो सकता है कि आप बीमार महसूस कर रहे हैं, लेकिन आपकी ब्लड रिपोर्ट एकदम नॉर्मल आ रही है.
क्या होती है सबक्लीनिकल डेफिशियेंसी?
ऐसी कंडीशन में टेस्ट कराने वाले शख्स के दिमाग में सवाल आता है कि उसके ब्लड टेस्ट के सभी पैरामीटर्स नॉर्मल हैं. लेकिन, इसके बाद भी उसके शरीर में समस्याएं क्यों हो रही हैं? अब मरीज़ अलग-अलग डॉक्टर्स के पास फिरता रहता है या फिर वह झाड़ फूंक और बाबाओं के झांसे में फंस जाता है. लेकिन, ये दिक्कत पूरी तरह से साइंटिफिक होती है.
उदाहरण के तौर पर आपने विटामिन बी12 का टेस्ट कराया जिसकी नॉर्मल रेंज लगभग 200–900 pg/mL के बीच होती है. आपके टेस्ट में 5 वैल्यू आती है. टैक्निकली देखें तो यह एकदम नॉर्मल है. लेकिन ऐसी कंडीशन में पॉप्यूलेशन के एक बड़े हिस्से को विटामिन बी12 की कमी से जुड़े लक्षण महसूस हो सकते हैं. जैसे मासपेशियों में दर्द, सिर में दर्द, बालों का झड़ना, ज्वाइंट्स में समस्या और लगातार शरीर में थकान महसूस होते रहना.
किन चीजों में होता है विटामिन बी12?
विटामिन बी12 के स्रोत नॉन वेजेटेरियन आइटम्स होते हैं. वेज फूड में ये न के बराबर ही मिलता है. मीट, चिकन, लिवर, फिश और दूध इसके अहम स्रोत हैं.
कुछ ऐसा ही विटामिन डी के साथ भी देखने को मिल सकता है, जिसकी नॉर्मल रेंड 20-100 ng/ml है और अगर किसी का विटामि 30 भी आता है तो उसे विटामिन डी की कमी के लक्षण महसूस हो सकते हैं. विटामिन डी की ऑप्टीमल रेज 40-60 मानी जाती है. इसकी कमी से बालों का टूटना, लगातार थकान बने रहना, ब्रेन फोग, हार्मोनल लेवल का डिस्टर्बेंस और कमज़ोरी महसूस होना आदि लक्षण दिखाई देते हैं.
तीसरा उदाहरण थायराइड हो सकता है. जिसमें टीएसएच (थायराइड स्टीम्युलेटिंग हार्मोन) का लेवल 0.4-4.5 नॉर्मल माना जाता है. अगर किसी शख्स में इसका लेवल 2 या 2.5 आता है, तो उसे नॉर्मल समझा जाता है. लेकिन, काफी लोगों में इस दौरान इसकी कमी के लक्षण महसूस होने लगते हैं. जैसे हल्का गले में दर्द, वज़न का बढ़ना, शरीर में ताकत का कम महसूस होना, बालों का झड़ना, मूड स्विंग होना और पैरों में दर्द रहना आदि.
किन बातों का रखें खास ध्यान?
हर शख्स का जेनेटिक्स, स्ट्रेस लेवल और लाइफस्टाइल अलग-अलग होता है, ऐसे में एक लेवल किसी के लिए सही हो सकता है, वहीं सेम लेवल किसी दूसरे शख्स में होना दिक्कत की बात बन सकता है.
क्या हार्मोन लेवल भी है एक वजह?
हार्मोन लेवल का सही होना शरीर के लिए बहुत ज़रूरी है. इसे एक कार के उदाहरण से समझ सकते हैं. जैसे एक कार में फ्यूल उसे चलाने के लिए डाला जाता है और मोबिलऑयल इसलिए ताकि वह स्मूद चल सके, उसके पार्ट्स जाम न हो और उसका तापमान सही रहे. ठीक वैसे ही इंसान के शरीर में हार्मोन शरीर के अलग-अलग कामों को सही तरह परफॉर्म करने में मदद करते हैं.
मिसाल के तौर पर शरीर में स्ट्रेस लेवल के बढ़ने से कोर्टिसोल हार्मोन का लेवल बढ़ता है. इस कंडीशन में हमारा शरीर सर्वाइवल मोड में चला जाता है और भूख ज्यादा लगती है और शरीर फैट स्टोरेज वाला एंजाइम एक्टीवेट कर देता है. जिसकी वजह से पेट पर चर्बी बढ़ने लगती है. इस हार्मोन के बढ़ने से मासपेशियां कमजोर होने लगती हैं, वज़न बढ़ता है और बेतहाशा थकान महसूस होती है. अब हम एक नॉर्मस ब्लड टेस्ट से हाई कोर्टिसोल लेवल को नहीं माप सकते, इसलिए सभी टेस्ट नॉर्मल आने पर भी आप पता नहीं लगा पाते हैं कि आपको ये लक्षण क्यों महसूस हो रहे हैं.
क्या फिजिकल कारण हो सकते हैं?
कई सब्ज़ियों में अधिक मात्रा में हार्मोन इंजेक्ट किए जाते हैं, जो लोगों में अलग-अलग तरह की दिक्कत पैदा करते हैं. अगर इन सब्जियों को खाया जाए तो यह शरीर को बीमार बनाने लगती हैं. मिसाल के तौर पर कद्दू में प्रोलैक्टिन हार्मोन का इस्तेमाल होना. अगर इसे गर्भवती महिलाओं खाएं तो इससे गर्भपात हो सकता है. पुरुषों में यह गाइनोकैमेस्टिया का कारण बन सकता है. नॉर्मल ब्लड टेस्ट में इन समस्याओं का डिटेक्ट करना आसान नहीं होता है.
दिमाग से होने वाली समस्याएं
इस लिस्ट में सबसे पहला नाम है साइको सोमेटिक पेन. इस कंडीश में सिरदर्द, छाती में दर्द, पेट दर्द, शरीर में अजीब खिंचाव रहता है. लेकिन बल्ड टेस्ट एकदम नॉर्मल रहते हैं. क्योंकि समस्या tissue damage की नहीं, बल्कि brain–pain perception की होती है. ध्यान रहे अगर आपको ऐसी दिक्कत हो रही है तो यह जरूरी है आप डॉक्टर से जरूर कंसल्ट करें.
क्या होता है क्रोनिक स्ट्रेस सिंड्रोम?
इस लिस्ट में दूसरा नाम है क्रोनिक स्ट्रेस सिंड्रोम. इस कंडीशन में पेशेंट का तेजी से दिल धड़कता है, बीपी फ्लक्चुएट होता है, थकान रहती है और बाल झड़ने जैसी समस्या आती है. रूटीन ब्लड पैनल में इसमें कुछ खास नहीं दिखता है. इस कंडीशन में पेशेंट का नर्वस सिस्टम लगातार फाइट और फ्लाइट के मोड में रहता है.
हाई स्ट्रेस की कंडीशन में अक्सर डाइजेशन खराब रहता है. पेट में गैस बनेगी, पेट दर्द रहेगा और ब्लोटिंग जैसी समस्या होगी, लेकिन ब्लड टेस्ट एकदम नॉर्मल रहेंगे.
इलाके या माहौल का एकदम से बदलना, क्या पड़ेगा शरीर पर प्रभाव?
इलाका, शहर या माहौल बदलने से भी शरीर पर प्रभाव पड़ता है. नए शहर में अलग मसाले, अलग तरह के खाने के स्टाइल, अलग कूकिंग ऑयल और साथ ही पानी के मिनेरल लेवल में बदलाव होने से पेट में पाए जाने वाले बैक्टीरिया में बदलाव आने लगता है. जिसकी वजह से कई लोगों के बाल झड़ते हैं, गैस रहती है और लूज़ मोशन मोशन जैसी समस्या भी आती है. इसे नॉर्मल ब्लड टेस्ट में आसानी से डिटेक्ट नहीं किया जा सकता है.
वहीं दूसरी तरफ जब आप कम प्रदूषण वाली जगह से ज्यादा प्रदूषण वाली जगह पर जाते हैं, तो एलर्जीज़, सिर दर्द, थकान और बुखार सा महसूस होना महसूस होता है. लेकिन इस दौरान ब्लड मार्कर में कोई तब्दीली नहीं आती है.
क्या आप इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी को कर रहे हैं नजरअंदाज?
ज्यादा चाय, कॉफी या दूसरी कैफेनेटेड ड्रिंक पीने से प्यास ज्यादा लगती है और खूब पेशाब आता है. लेकिन इसकी वजह से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो जाती है, जिसकी वजह से कमजोरी, थकान, सिरदर्द, लो या हाई बीपी और ध्यान लगाने में कमी जैसी दिक्कतें पेश आती हैं. इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी ज्यादा होने से हार्ट फेल होने का खतरा भी रहता है. इस डेफिशिएंसी को ब्लड टेस्ट से डिटेक्ट नहीं किया जा सकता है.
फूड एलर्जी क्या समस्या पैदा करती है?
ग्लूटेन और लैक्टोज़ से एलर्जी होना बहुत आम बात है. लैक्टोज़ दूध में होता है और ग्लूटेन गेंहू में अच्छी मात्रा में होता है. दोनों का ही इस्तेमाल भारतीय घरों में खूब किया जाता है. खास बात है कि इनसे होने वाली समस्या को लोग आसानी से डिटेक्ट नहीं कर पाते हैं. इनकी एलर्जी से भी शरीर में थकान रहती है, पेट भारी रहने लगता है और भूख कम होने लगती है. इन एलर्जी को रूटीन टेस्ट से नहीं पता लगाया जा सकता. इसके लिए फूड्स को रिप्लेस करना बेहद जरूरी है.
कई सेलेब्रिटीज सामने भी आए हैं जिन्होंने खुलकर अपनी एलर्जी के बारे में बात की है और बताया है कि ग्लूटेन की वजह से उन्हें किस तरह की दिक्कतें हो रही थीं. लेकिन, इसे छोड़ने के बाद वह कितना अच्छा महसूस करते हैं.
नेसिबो इफेक्ट क्या है?
यह वह कंडीशन है जब किसी डर, नेगेटिव उम्मीद या विश्वास की वजह से असली लक्षण पैदा हो जाते हैं. भले ही वह कंडीशन नुकसानदे न हो. जब इंसान ये सोचता है कि इस चीज से मुझे नुकसान होगा या फिर ऐसा करने से मुझे ये दिक्कत होगी, तो असल में उसे उस तरह के लक्षण महसूस होने लगते हैं.
ऐसा सोचने पर शरीर में कोर्टिसोल लेवल बढ़ने लगता है, जिसकी वजह से एड्रेनेलिन हार्मोन बढ़ता है और पेन सेंसिटिविटी बढ़ जाती है. ऐसी कंडीशन में आदमी सिर में दर्द, मतली, चक्कर और दिल तेज़ी से धड़कने जैसे लक्षण महसूस करता है.नोसिबो इफेक्ट के बारे में लगभग 35 स्टडीज़ में पाया गया है कि पार्टिसिपेंट्स ने वैसे ही नेगेटिव सिंपटम्स महसूस किए जैसा वह सोच रहे थे. इन सभी स्टडीज़ में 2500 से ज्यादा पार्टिसिपेंट्स लिए गए थे. आइये अब नेसीबो इफेक्ट को उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिए आप एक अलग शहर में शिफ्ट होते हैं और आपके मन में ख्याल आता है कि यहां का पानी को गंदा है और इससे मेरे बाल टूटने लगेंगे. इस ख्याल को आप अंदर ही अंदर एकदम सच मानने लगते हैं. तो ऐसे में यह काफी हद तक मुमकिन है कि आपके बाल टूटने लगें. अब आप कोई भी टेस्ट कराएं उसमें कुछ नहीं मिलने वाला है.





