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हर बात पर अड़ जाता है आपका बच्चा? इन स्मार्ट तरीकों से बच्चे की जिद करने की आदत करें दूर

बच्चों की ज़िद अक्सर माता-पिता के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है. खासकर छोटे बच्चे उम्र में बच्चे अपनी बात मनवाने के लिए रोना, चिल्लाना या अड़ जाना शुरू कर देते हैं. ऐसे में डांटने के बजाय कुछ स्मार्ट तरीकों से उनकी ज़िद की आदत दूर की जा सकती है.

child stubbornness
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( Image Source:  AI SORA )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत

Updated on: 7 Feb 2026 12:21 PM IST

कई घरों में एक ही चीज बार-बार देखने को मिलती है, बच्चा किसी छोटी-सी बात पर अड़ जाता है, रोता है, चिल्लाता है और पूरा माहौल खराब हो जाता है.पेरेंट्स समझ नहीं पाते कि आखिर इतनी-सी बात पर इतनी ज़िद क्यों? दरअसल छोटे बच्चे अपनी इच्छा जताना सीखते हैं, लेकिन उसे एक्सप्रेस करने का सही तरीका नहीं जानते. ऐसे में उनकी ज़िद, उनकी इमोशन का कच्चा रूप बनकर सामने आती है.

अगर हर बार डांट, धमकी या मनाने की कोशिश काम नहीं कर रही, तो ज़रूरत है कुछ स्मार्ट तरीकों की. सही समय पर ध्यान भटकाना, धैर्य से उसकी बात सुनना, छोटे-छोटे नियम तय करना और हर बात पर “ना” कहने से बचना ये तरीके बच्चे की जिद को धीरे-धीरे समझदारी में बदल सकते हैं.

ज़िद को तुरंत डायवर्ट करें

जब बच्चा ज़िद करे, तो बहस में न पड़ें. जब आपका बच्चा जिद कर रहा हो, तो उसका ध्यान तुरंत डायवर्ट करें. उसका रोना और जिद खुद कम हो जाएगा. मान लीजिए आपका बच्चा खिलौने के लिए जिद कर रहा हो, तो उसे कहें कि चलो दौड़ते हैं. आप पाएंगे कि वह कुछ मिनट बाद हंसने लगेगा. बच्चों का ध्यान जल्दी भटकता है. बस डायवर्जन में एक्साइटमेंट होना चाहिए, जैसे मज़ेदार आवाज़, नई कहानी, या कोई छोटा सरप्राइज़.

समझाएं कम बात सुने

अक्सर पेरेंट्स बच्चे की बात सुनते कम हैं, बस उन्हें समझाने लगते हैं. अक्सर माता-पिता बच्चे के एक लाइन कहने के बाद गुस्से में बोलने लगते हैं कि ज़िद मत करो. पर इन बातों का बच्चों पर कोई असर नहीं होता है. इसके बजाय अपने बच्चे की बात सुनें. वह क्यों वही खिलौना चाहता है? उसे क्या अच्छा लगता है? जब बच्चा महसूस करता है कि उसकी बात सुनी जा रही है, तो उसकी जिद की इंटेंसिटी कम हो जाती है. समझाइए, पर पहले सुनिए. यही बच्चे की साइकोलॉजी की चाबी है.

हर बात पर “ना” कहना बंद करें

कई बार हम आदत से मजबूर होकर हर डिमांड पर “ना” कह देते हैं. इससे बच्चा और अड़ जाता है. ऐसे में आपको रूल बनाना चाहिए कि जहां मुमकिन हो, अपने बच्चे को छोटे-छोटे ऑप्शन दें. जैसे, “चॉकलेट अभी नहीं, पर खाने के बाद मिल सकती है.” इससे बच्चा सीखता है कि उसकी बात पूरी तरह खारिज नहीं हुई, बस सही समय का इंतज़ार है.

रूटीन और नियम पहले से तय रखें

ज़्यादातर ज़िद तब होती है जब बच्चे को सीमाएं समझ नहीं आतीं. हमने घर में छोटे नियम बनाए, टीवी का समय, खेलने का समय, खाने का समय. अब जब वह टीवी के लिए ज़िद करता है, तो मैं बस घड़ी दिखाएं. नियम पहले से तय हों, तो बहस कम होती है. बच्चे को अंदाजा लग जाता है कि कब क्या मिलेगा.

खुद की आदत बदलें

अक्सर पेरेंट्स बच्चों को ऊंची आवाज में डांट देते हैं. तब उनकी ज़िद और बढ़ जाती है, क्योंकि बच्चे पेरेंट्स के बिहेवियर की नकल करते हैं. ऐसे में जब आप शांत रहकर, धीमी आवाज़ में बात करनी शुरू करेंगे, तो वह भी धीरे-धीरे शांत होने लगा. माता-पिता का धैर्य, बच्चे के नेचर में उतरता है.


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