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Rose day: एक पल, एक गुलाब और वो अनजान शख्‍स... मेरी जिंदगी का हसीन इत्तेफाक

उस छोटे से गुलाब ने उस पल को बेहद खास बना दिया. शब्द कम पड़ गए, दिल की धड़कन तेज हुई और गालों पर गर्माहट महसूस हुई. यह कोई बड़ी घटना नहीं थी, कोई डायलॉग या वादा नहीं, बस एक छोटा सा गुलाब और एक एहसास कि ज़िंदगी अब भी सरप्राइज़ देना जानती है.

Rose Day Special: When someone unexpectedly gave me a rose for the first time
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( Image Source:  Sora AI )
हेमा पंत
By: हेमा पंत

Updated on: 7 Feb 2026 7:00 AM IST

ज़िंदगी अक्सर अपने सबसे ख़ूबसूरत पल बिना बताए दे जाती है. न कोई इश्तेहार, न कोई इशारा-बस यूं ही, चलते-चलते. उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था.

शाम का वक्त था. दफ़्तर की थकान बदन और दिमाग-दोनों पर हावी थी. मैं और मेरी दोस्त रोज़ की तरह ऑफिस से घर की ओर लौट रहे थे. सड़क पर वही रोज़मर्रा की भीड़, हॉर्न की आवाज़ें, भागती ज़िंदगी. हम दोनों अपनी ही बातों में खोए हुए थे कि अचानक एक लड़के ने हमें रोक लिया.

उसकी आवाज़ में झिझक थी, लेकिन नज़रों में ईमानदारी. उसने अपना काम बताया और किसी फंडिंग के लिए मदद मांगी. हम दोनों ने बिना ज़्यादा सोचे मदद कर दी. बात वहीं खत्म हो गई-या हमें ऐसा ही लगा.

उसी दौरान एक छोटी सी बच्ची हमारे पास आई. हाथ में गुलाब थे-लाल, ताज़ा, मासूम से. उसने बड़ी उम्मीद से गुलाब बढ़ाया, लेकिन हममें से किसी ने नहीं लिया. शायद जल्दी थी, शायद आदत. बच्ची आगे बढ़ गई और वह पल भी पीछे छूट गया.

अगला दिन बिल्कुल आम था. वही ऑफिस, वही थकान, वही रास्ता. मैं और मेरी दोस्त फिर साथ लौट रहे थे. तभी दूर से किसी ने आवाज़ दी-

“Hi! Hello!”

हमने पलटकर देखा. वही लड़का. इस बार उसने हमें दूर से पहचान लिया था. चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी, जैसे किसी पुराने जानने वाले से मिल गया हो. थोड़ी सी बातचीत हुई और उसने अचानक कहा,

“चलो, चाय पीते हैं. पास ही एक दुकान है.”

न जाने क्यों, हम मना नहीं कर पाए. शायद दिन की थकान थी, शायद उसका अपनापन. हम पास की चाय की दुकान पर बैठ गए. तीन चाय ऑर्डर हुईं-मेरे लिए, मेरी दोस्त के लिए और उसके लिए.

चाय की भाप के साथ बातें भी हल्की होने लगीं. उसी पल, जैसे किस्मत ने दोहराना चाहा- वही गुलाब बेचने वाली लड़की फिर सामने आ गई.

इस बार उस लड़के ने पहले मना कर दिया. बच्ची एक पल के लिए रुकी, फिर आगे बढ़ने लगी.

और तभी…

न जाने उसके दिमाग में क्या आया.

“रुको,” उसने बच्ची को आवाज़ दी.

उसने एक गुलाब ले लिया.

मैं बस यूं ही देख रही थी. सोचा, शायद किसी और के लिए होगा. लेकिन अगले ही पल, उसने वो गुलाब मेरी ओर बढ़ा दिया. मेरी दोस्त के सामने, बिल्कुल बिना किसी झिझक के.

वक़्त जैसे एक पल के लिए रुक गया.

मैं कुछ बोल नहीं पाई. हाथ अपने आप गुलाब लेने के लिए आगे बढ़ गए. दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. गालों पर अचानक गर्माहट महसूस हुई मैं ब्लश कर रही थी.

ज़िंदगी में पहली बार किसी ने यूं, अचानक, चलते-फिरते, बिना किसी मौके या दिन के, मुझे गुलाब दिया था.

मेरी दोस्त मुस्कुरा रही थी. वो मुस्कान जो सब समझ जाती है. और मैं? मैं उस पल में पूरी तरह खो गई थी. गुलाब छोटा था, लेकिन उस पल की ख़ूबसूरती बेहिसाब.

कोई डायलॉग नहीं था, कोई वादा नहीं. बस एक गुलाब और एक एहसास कि ज़िंदगी अब भी सरप्राइज़ देना जानती है.

हमने चाय खत्म की. रास्ते अलग हुए. शायद फिर मुलाक़ात हो, शायद न हो. लेकिन उस दिन का वो पल मेरी यादों में हमेशा महकता रहेगा.

क्योंकि कुछ पल कहानी नहीं बनते,

वो ख़ुद एक फ़िल्म बन जाते हैं.

वैलेंटाइन डे
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