SIR से मुसलमान को ही डर क्यों? ममता के लिए क्यों आरपार की लड़ाई, क्या है असली सवाल?
पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया ने मुसलमानों की चिंता बढ़ी है. ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी और कांग्रेस इसका खुलकर विरोध कर रही हैं. एसआईआर को अल्पसंख्यकों के लिए बताया जा रहा है. यह कितना सच है यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन सीएए और एनआरसी के दौरान भी मुसलमानों को डराया गया था. बाद में पता चला कि इसमें तो ज्यादा नाम हिंदू शरणार्थियों के हैं. फिलहाल, इसका असर यह है कि मुसलमानों में खौफ का माहौल है. जानें क्या है विवाद, डर और असली राजनीतिक सवाल?
पश्चिम बंगाल में चल रही Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया ने बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है. ममता बनर्जी इसका खुल्लम खुल्ला विरोध कर रही हैं. उन्होंने चुनाव आयोग को दो बार पत्र लिखकर इसे टालने की मांग की है. वहीं, बीजेपी इसका पुरजोर समर्थन में है. इसके जवाब में ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को आरपार की सियासी लड़ाई करार देते हुए बीजेपी पर अल्पसंख्यक वोटर बेस को कमजोर करने का आरोप लगाया है. साथ ही कहा कि किसी का नाम कटा तो केंद्र सरकार को गिरा देंगे. एनआरसी और सीएए के दौरान भी यही दावा किया गया था. हकीकत इसके उलट सामने आया था. इससे पहले बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया संपन्न हुई थी. वहां पर भी अल्पसंख्यकों के वोट के अधिकार से वंचित करने के आरोप बीजेपी पर लगे थे. इसको लेकर कांग्रेस और आरजेडी ने जोरदार कैंपेन चलाया था. बिहार में 69 लाख वोट कटे भी, लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय ने ये नहीं कहा कि एसआईआर उनके खिलाफ अभियान है. जबकि बिहार की कुल आबादी में मुसलमानों की आबादी करीब 18 प्रतिशत है. सीमांचल क्षेत्र के जिलों में तो मुसलमानों की आबादी 68 प्रतिशत तक है. आइए, इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जानते हैं कि पश्चिम बंगाल के मुसलमानों में डर क्यों हैं, ममता बर्नी इसका विरोध क्यों कर रही है. चुनाव आयोग का पक्ष क्या है? साथ ही एसआईआर का मकसद क्या है?
SIR क्या है?
SIR एक ऐसा विशेष वोटर लिस्ट पुनरीक्षण (voter-roll revision) अभियान है, जिसमें मतदाता सूची को अपडेट किया जाता है. यह प्रक्रिया नियमित रिवीजन से अलग और प्रभावी मानी जा रही है. इस बार बंगाल में SIR को लेकर सियासी जंग चरम पर है. टीएमसी विरोध कर रही है तो बीजेपी खुलकर इसके समर्थन में है.
वास्तव में कटेंगे 26 लाख मतदाताओं के नाम!
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान संभावित नाम हटाए जाने की बढ़ती आशंकाओं के बीच मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने पुष्टि की है कि इस प्रक्रिया के दौरान अब तक लगभग 26 लाख मतदाताओं की पहचान नहीं हो पाई है. ईसी (EC) के एक अधिकारी के मुताबिक अभी यह संख्या और बढ़ सकती है.
सीमावर्ती जिलों में मतदाताओं की संख्या में चौंकाने वाली बढ़ोतरी
ईसीआई (ECI) के आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल के जिन नौ सीमावर्ती जिलों में सबसे तेज वृद्धि देखी गई है, वे हैं: उत्तर दिनाजपुर (105.49% वृद्धि), मालदा (94.58%), मुर्शिदाबाद (87.65%), दक्षिण 24 परगना (83.30%), जलपाईगुड़ी (82.3%), कूच बिहार (76.52%), उत्तर 24 परगना (72.18%), नदिया (71.46%) और दक्षिण दिनाजपुर (70.94%). शीर्ष 10 में एकमात्र गैर-सीमावर्ती जिला बीरभूम (73.44%) है. ये सभी क्षेत्र टीएमसी का गढ़ माना जाता है.
बीजेपी नेता अमित मालवीय ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा, '2002 में जब भारत के चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अंतिम बार आयोजित किया गया था और 2025 के बीच पश्चिम बंगाल में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या में 66% की वृद्धि हुई है. उस समय मतदाता 4.58 करोड़ से बढ़कर अब 7.63 करोड़ तक हो गया है.
बीजेपी का गुप्त एजेंडा - TMC
पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी Trinamool Congress के प्रमुख ममता बनर्जी का कहना है कि SIR सिर्फ वोटर-रोल अपडेट नहीं, बीजेपी का गुप्त एजेंडा है. यह वोटर लिस्ट से उन मतदाताओं को हटाने की मुहिम है, जिनके पास पर्याप्त पहचान या दस्तावेज नहीं हैं.
मुस्लिम समुदाय और सीमावर्ती इलाकों वाले लोग जिनके पास स्थाई पता, दस्तावेज या पंजीकरण नहीं हैं, उन्हें डर है कि उनकी पहचान व वोटिंग अधिकार खतरे में पड़ सकता है. TMC के अनुसार SIR के जरिए मतदाता हटाने (voter deletion) का डर है, जिससे मताधिकार से वंचित होने का खतरा है.
SIR को लेकर मुसलमान परेशान क्यों?
पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों विशेषकर वे जो बांग्लादेश सीमा के पास हैं, वहां मतदाता सूची में असामान्य वृद्धि देखने को मिली है, जिससे सवाल उठे हैं कि ये असली निवासी हैं या प्रवासी/अस्थायी लोग. प्रभावित होने वालों में अल्पसंख्यक व बेरोजगार या अस्थायी पते वाले लोग जिन्हें पहचान व पते के स्थायी दस्तावेज नहीं हैं, उनका नाम कटने की आशंका ज्यादा है. हालांकि, जिस सीएए और एनआरसी की बात कर ममता मुसलमान मतदाताओं को टीएमसी से जोड़े रखना चाहती हैं, उनमें बांग्लादेश से आए हिंदुओं की संख्या ज्यादा है.
ममता बनर्जी की आपत्ति क्या है?
सीएम ममता बनर्जी ने एसआईआर के नाम पर पैसे उगाहने और वोटर लिस्ट से नाम कटने पर केंद्र को चेतावनी दी है. उन्होंने चुनाव आयोग को 'भाजपा आयोग' करार दिया है. उन्होंने कहा था कि मतदाता सूची से नाम कटने पर केंद्र सरकार गिर जाएगी. ममता ने दावा किया कि SIR की वजह से बंगाल में अब तक 34 लोगों की मौत हो चुकी है. जबकि आधिकारिक आंकड़ों में बंगाल से तीन बीएलओ के मरने की ही पुष्टि हुई है. ममता ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा डुप्लीकेट वोटर बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर रही है. यह भाजपा का नया गेम प्लान है.
ममता ने SIR को “backdoor National Register of Citizens (NRC)” कहा है. उनके अनुसार यह प्रक्रिया असली उद्देश्य से हटकर, नागरिकता और वोटर-रोल को फिर से जांचने की चाल है. SIR अराजक, खतरनाक और बिना तैयारी के साथ लागू किया जा रहा है. दस्तावेजों की आवश्यकता, पहचान व पते की मांग, और बूथ-स्तर अधिकारियों (BLOs) पर बीजेपी के हिसाब से वोटर लिस्ट तैयार करने का जबरदस्त दबाव है. उन्होंने चुनाव आयोग से SIR बंद करने की मांग की है. इसी संदर्भ में आज टीएमसी को 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग से मिलेगा और अपना पक्ष रखेगा.
CM बनगांव और कोलकाता निकाल चुकी हैं पैदल मार्च
इस आधार एसआईआर का विरोध करने के लिए ममता बनर्जी ने हाल ही में उत्तर 24 परगना जिले के बनगांव में मतुआ समुदाय के गढ़ में तीन किलोमीटर लंबे पैदल मार्च का नेतृत्व किया था. मतुआ समुदाय का ठाकुरनगर का यह क्षेत्र बीजेपी का गढ़ माना जाता है. इससे पहले ममता ने इस माह की शुरुआत में चार नवंबर को राज्य में SIR की प्रक्रिया शुरू होने के दिन इसके खिलाफ तृणमूल द्वारा कोलकाता में आयोजित तीन किलोमीटर लंबे पैदल मार्च का नेतृत्व किया था.
एसआईआर: कानूनी और संवैधानिक पहलू
वोटर-लिस्ट का अपडेट/रिवीजन करना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार है. ताकि मतदाता सूची साफ, सटीक और वास्तविक हो. SIR इसी उद्देश्य से लगाई गई है. कानून कहता है कि किसी भी नागरिक का मताधिकार बिना उचित कारण और कानून की प्रक्रिया के हटाया नहीं जाना चाहिए. यदि SIR के दौरान ऐसा हो रहा है कि दस्तावेज-चुना उत्पीड़न, पहचान-जटिलताएं, या असमय हटाने जैसे तरीके हो रहे हों, तो वह संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है.
अदालत में चुनौती
विपक्षी दलों TMC, कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों का तर्क है कि SIR गैर लाभभोगी (non-beneficiary) और गैर दस्तावेज युक्त नागरिकों को हटाने का माध्यम बने. यह प्रक्रिया पारदर्शी, ईमानदार और निष्पक्ष होनी चाहिए. ऐसा न होने पर विपक्ष ने इसे न्यायालय में चुनौती दी है.
SIR पर विवाद क्यों?
विपक्षी पार्टियों का कहना है कि SIR को इस समय शुरू करना जहां विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, इसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना देता है. विपक्ष दावा कर रहा है कि SIR को चुनावी हथियार बनाया जा रहा है. सत्तारूढ़ पार्टी TMC, जिसकी जड़ें अल्पसंख्यकों और सीमावर्ती इलाकों में मजबूत हैं को डर है कि SIR से उनके वोट बैंक को नुकसान हो सकता है. इसी डर व रणनीति ने SIR के खिलाफ उन्होंने इसके खिलाफ आंदोलन तेज कर दिया.
इसके उलट भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि SIR आवश्यक है. ताकि अवैध मतदाता, फर्जी पहचान या घुसपैठियों को रोका जा सके. बीजेपी ने इसे लोकतंत्र की दिशा में उठाया गया कदम बताया है.
चुनाव आयोग का तर्क क्या है?
BJP और ECI का कहना है कि SIR लोकतांत्रिक प्रक्रिया है. वोटर-लिस्ट को अपडेट करना हर लोकतंत्र में होता है. ताकि फर्जी मतदाता, डुप्लिकेट एंट्री या अवैध वोटिंग रोकी जा सके. उनका दलील है कि इस तरह का पुनरीक्षण जरूरी है. खासकर सीमावर्ती और उच्च मतदाता-वृद्धि वाले जिलों में.
अहम सवाल: जो अभी तक क्लियर नहीं
- क्या SIR के दौरान दस्तावेज-चुना, पहचान-मांग, पते का प्रमाण आदि ऐसे नियम लागू किए जाएं कि उन लोगों की बोली हो जाए जिनके पास स्थायी पते नहीं हैं?
- क्या SIR को लागू करते समय संवेदनशील, वंचित या अल्पसंख्यक जाति-पंथ/धर्म समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए अतिरिक्त सावधानी बरती जाएगी?
- अगर वैध मतदाता का नाम गलती से हट जाता है तो उसे वापस लाने के लिए क्या प्रक्रिया होगी?
- क्या SIR पूरी तरह पारदर्शी, स्वतंत्र और त्रुटि-रहित होगी. ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वोटर-रोल साफ हुआ है, न कि निष्पक्ष नागरिकों को निकाल दिया गया है?
- SIR जो कि एक प्रशासनिक वोटर-लिस्ट रिवीजन प्रक्रिया है. वह इस बार पश्चिम बंगाल में राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक विवाद का कारण बन चुकी है.
- मुसलिम और सीमावर्ती इलाकों के लोग, जिनकी पहचान या पते की स्थिरता नहीं है. विशेष रूप से डर व असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.
- चुनाव व मतदाता सूची बनाने-रिवाइज करने का अधिकार ECI को है. ऐसा करना चुनाव आयोग की कर्तव्य है.
- ईसी (EC) के मुताबिक डिजिटल वेरिफिकेशन होने पर हर मतदाता का डेटा सुरक्षा, गोपनीयता व सत्य-प्रक्रिया सुनिश्चित होगी.
- चुनाव आयोग ने कहा- SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दल जानबूझकर डर का माहौल बना रही हैं.
बीजेपी का गढ़
बीजेपी भले ही पश्चिम बंगाल में खुद की सरकार बनाने में विफल रही है, लेकिन उसने पहले वामपंथी गढ़ और टीएमसी के एकाधिकार वाली क्षेत्र में अपनी पकड़ काफी मजबूत कर ली है. 1967 में अतिवादी वामपंथी नेताओं ने हथियारबंद आंदोलन का आगाज किया और कई राज्यों के मजदूरों, भूमिहीनों, दलितों, आदिवासियों और शोषितों को खुद से जोड़ा. नक्सलबाड़ी, सिंगूर, कूच बिहार, उत्तर 24 परगना, कोलकाता के कुछ इलाके सहित कई जिलों में जीत दर्ज कर टीएमसी को सकते में डाल दिया. इस बार फिर बीजेपी चुनाव जीत कर प्रदेश में सरकार बनाने की रणनीति पर काम कर रही है.
पश्चिम बंगाल में विधानसभा सीटों की संख्या 294 है. इनमें से 84 रिजर्व सीटें हैं. इनमें से 68 अनुसूचित जाति के लिए और 16 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. इस बार टीएमसी को 45 रिजर्व सीटों पर जीत मिली है और बीजेपी को 39 सुरक्षित सीटों पर. विधानसभा चुनाव 2021 में टीएमसी ने 213 और बीजेपी ने 99 सीटों पर जीत दर्ज की थी. 2016 में बीजेपी सिर्फ तीन सीटों पर जीत दर्ज कर पाई थी.





