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Swami Avimukteshwaranand: कौन होते हैं शंकराचार्य और कैसे मिलता है यह पद? समझिये इसका तिलिस्म

आम लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर शंकराचार्य होते कौन हैं, सनातन धर्म में इस पद का महत्व क्या है और इस सर्वोच्च धार्मिक पद तक कोई संत कैसे पहुंचता है. इसी कड़ी में यह जानना भी जरूरी है कि सबसे पहले शंकराचार्य कौन थे और यह परंपरा कैसे शुरू हुई?

Who are Shankaracharyas
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Swami Avimukteshwaranand

( Image Source:  X/ @VoiceOfBrahmins )
विशाल पुंडीर
Edited By: विशाल पुंडीर

Updated on: 21 Jan 2026 1:52 PM IST

प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं. मौनी अमावस्या के स्नान को लेकर माघ मेला प्रशासन से उनकी तनातनी अभी थमी नहीं है. इसी बीच अब शंकराचार्य पद को लेकर भी बहस तेज हो गई है और कुछ लोग स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने पर सवाल उठाने लगे हैं.

इन चर्चाओं के बीच आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर शंकराचार्य होते कौन हैं, सनातन धर्म में इस पद का महत्व क्या है और इस सर्वोच्च धार्मिक पद तक कोई संत कैसे पहुंचता है. इसी कड़ी में यह जानना भी जरूरी है कि सबसे पहले शंकराचार्य कौन थे और यह परंपरा कैसे शुरू हुई?

शंकराचार्य कौन होते हैं?

सनातन धर्म में शंकराचार्य का पद सर्वोच्च धार्मिक और आध्यात्मिक पद माना जाता है. यह पद उस संन्यासी को दिया जाता है, जो वेदों, उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र और सनातन परंपराओं का गहन ज्ञान रखता हो. मठ में मौजूद सबसे विद्वान, संयमी और धर्म के प्रति पूर्ण समर्पित संत को ही शंकराचार्य बनने का अधिकार मिलता है.

शंकराचार्य बनने के लिए योग्यताएं

शंकराचार्य बनने के लिए संन्यास की कठोर परंपराओं का पालन करना अनिवार्य होता है. इसमें पिंडदान, गृहस्थ जीवन का पूर्ण त्याग और सांसारिक संबंधों से विरक्ति शामिल है. इसके साथ ही संबंधित संत को वेदों, उपनिषदों और सनातन धर्म के सभी सिद्धांतों का गहरा ज्ञान होना चाहिए. केवल विद्वता ही नहीं, बल्कि आचार-विचार और जीवन शैली भी संन्यासी मर्यादाओं के अनुरूप होनी चाहिए.

गुरु-शिष्य परंपरा से होता है चयन

आदि शंकराचार्य के काल से ही शंकराचार्य पद के लिए गुरु-शिष्य परंपरा का पालन किया जाता रहा है. मठ के वर्तमान शंकराचार्य अपने सबसे योग्य और विद्वान शिष्य को उत्तराधिकारी के रूप में चुनते हैं. इसके बाद काशी विद्वत परिषद और संत सभा की सहमति मिलने पर उस शिष्य को औपचारिक रूप से शंकराचार्य की उपाधि प्रदान की जाती है.

सनातन धर्म में शंकराचार्य पद का महत्व

सनातन धर्म के प्रचार, संरक्षण और वैश्विक सम्मान के लिए मठों की स्थापना की गई थी. इन मठों का नेतृत्व शंकराचार्य करते हैं. शंकराचार्य न केवल धार्मिक मार्गदर्शन देते हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी राय रखते हैं.

ये है भारत में चार प्रमुख शंकराचार्य मठ

1. ज्योतिर्मठ (उत्तराखंड)

2. शारदा मठ (गुजरात)

3. गोवर्धन मठ (पुरी, ओडिशा)

4. शृंगेरी मठ (कर्नाटक)

मौजूदा विवाद क्यों है चर्चा में?

माघ मेले के दौरान प्रशासन से टकराव और मौनी अमावस्या स्नान को लेकर जारी विवाद के बीच अब शंकराचार्य पद को लेकर उठे सवालों ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है. यही वजह है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और शंकराचार्य परंपरा इस समय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है.

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