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क्या अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य नहीं? संगम तट पर 'संतन में जंग'! गंगा स्नान से रोकने के बाद योगी सरकार ने क्यों मांगा सबूत?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को माघ मेले में संगम स्नान से रोकने के बाद प्रयागराज मेला प्रशासन ने शंकराचार्य होने के दावे पर 24 घंटे में स्पष्टीकरण मांगा. कांग्रेस और सपा नेताओं ने योगी सरकार की आलोचना की. अब ऐसे में सवाल तेज हो गया है कि क्या स्वामी Avimukteshwaranand Shankaracharya नहीं है.

क्या अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य नहीं? संगम तट पर संतन में जंग! गंगा स्नान से रोकने के बाद योगी सरकार ने क्यों मांगा सबूत?
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सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी

Updated on: 20 Jan 2026 9:55 PM IST

प्रयागराज माघ मेला 2026 के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर उठा विवाद अब सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह धर्म, सत्ता, सुप्रीम कोर्ट और सनातन परंपरा के टकराव का बड़ा मुद्दा बन चुका है. मौनी अमावस्या के पावन स्नान से रोके जाने, कथित पुलिसिया मारपीट और फिर आधी रात में नोटिस चस्पा किए जाने की घटना ने देशभर में तीखी बहस छेड़ दी है.

एक तरफ प्रयागराज मेला प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने पर सवाल उठा रहा है, तो दूसरी ओर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी इसे धार्मिक हस्तक्षेप और सत्ता का अहंकार बता रही हैं. सवाल अब सिर्फ इतना नहीं है कि 'शंकराचार्य कौन है?' बल्कि यह भी है कि क्या कोई सरकार या प्रशासन शंकराचार्य की वैधता तय कर सकता है?

मौनी अमावस्या से शुरू हुआ बवाल: संगम स्नान से रोके गए शंकराचार्य

पूरा विवाद रविवार, मौनी अमावस्या के दिन शुरू हुआ, जब ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य कहे जाने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को उनके अनुयायियों के साथ संगम स्नान के लिए जाते समय कथित तौर पर पुलिस ने रोक दिया. आरोप है कि इस दौरान उनके शिष्यों के साथ मारपीट हुई, उनका छत्र टूट गया और पूरे घटनाक्रम ने धार्मिक भावनाओं को आहत किया.

इस घटना के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिविर के बाहर पालकी पर बैठकर संकल्प पर बैठ गए. उन्होंने स्पष्ट किया कि 'मैं न अनशन पर हूं और न धरने पर. यह मेरा संकल्प है. जब तक सम्मानजनक स्नान नहीं होगा, तब तक मैं यहीं रहूंगा. यह संकल्प गंगा-यमुना के सामने है, किसी सरकार के सामने नहीं.'

आधी रात का नोटिस: माफी की जगह सवाल

विवाद तब और बढ़ गया जब प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने आधी रात के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी कर दिया. नोटिस में उनसे 24 घंटे के भीतर यह स्पष्ट करने को कहा गया कि वे खुद को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य कैसे बता रहे हैं. नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में लंबित सिविल अपील संख्या 3010/2020 और 3011/2020 का हवाला दिया गया और कहा गया कि अक्टूबर 2022 में अदालत ने ज्योतिषपीठ के किसी भी नए पट्टाभिषेक पर रोक लगाई थी. प्रशासन का कहना है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले का निस्तारण नहीं कर देता, तब तक कोई भी धर्माचार्य ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के रूप में सुशोभित नहीं हो सकता.

कांग्रेस का हमला: 'अब हिंदू संतों से भी कागज मांग रहे'

इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस ने योगी सरकार पर तीखा हमला बोला. कांग्रेस मीडिया विभाग प्रमुख पवन खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल उठाया. 'क्या किसी जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस कमिश्नर, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को यह अधिकार है कि वह शंकराचार्य की हैसियत पर सवाल उठाए?' उन्होंने कहा कि “जो लोग मुसलमानों से कहते थे. कागज दिखाओ - अब वही लोग हिंदू धर्म के सर्वोच्च संत से भी कागज मांग रहे हैं.'

खेड़ा ने इसे धार्मिक परंपराओं में अभूतपूर्व दखल बताया और आरोप लगाया कि जैसे ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गाय वध, अयोध्या राम मंदिर के कथित जल्दबाजी में उद्घाटन और कुंभ मेला प्रबंधन पर सवाल उठाए, उन्हें निशाने पर ले लिया गया.

सपा सांसद सनातन पांडेय का बयान: 'तो फिर डीएनए टेस्ट कराइए'

समाजवादी पार्टी भी खुलकर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में उतर आई है. बलिया से सपा सांसद सनातन पांडेय ने कहा कि 'कोई कैसे साबित करेगा कि किसी के पिता वही हैं? इसके लिए तो डीएनए टेस्ट कराना पड़ेगा.' उन्होंने आगे कहा कि 'लोकतंत्र में ऐसी बातें शर्मनाक हैं, लेकिन सत्ताधारियों से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती.'

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दो पक्ष, असली भ्रम यहीं?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पीएन मिश्रा ने प्रशासन के नोटिस को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करार दिया है. उनका कहना है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक 12 सितंबर 2022 को हो चुका था. सुप्रीम कोर्ट ने 17 अक्टूबर 2022 के बाद किसी नए पट्टाभिषेक पर रोक लगाई. अदालत के आदेशों में कई स्थानों पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को 'शंकराचार्य' कहा गया है. उनका आरोप है कि प्रशासन ने गलत तारीखों और अधूरे तथ्यों के आधार पर नोटिस जारी किया.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जवाब: 'शंकराचार्य शंकराचार्य को तय करते हैं'

प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दो टूक कहा कि 'भारत के राष्ट्रपति भी यह तय नहीं कर सकते कि शंकराचार्य कौन है. शंकराचार्य को शंकराचार्य ही तय करते हैं.' उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि खुद सरकार द्वारा छापी गई महाकुंभ की स्मारिका में उनकी तस्वीर ‘जगतगुरु शंकराचार्य’ के रूप में प्रकाशित की गई थी, फिर अब यह सवाल क्यों?

राजनीतिक रंग: अशोक गहलोत से लेकर देशभर में प्रतिक्रिया

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी इस घटना की निंदा करते हुए कहा कि 'धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों के राज में अगर सर्वोच्च संतों का यह हाल है, तो यह घोर पाप है.' उन्होंने शास्त्रों का हवाला देते हुए कहा कि संतों का अपमान किसी भी शासक के लिए विनाशकारी होता है. इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शंकराचार्य की पहचान अदालत और प्रशासन तय करेगा या सनातन परंपरा? जब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक यह टकराव धर्म बनाम सत्ता की बहस को और तेज करता रहेगा.

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