क्या योगी को पसंद नहीं अविमुक्तेश्वरानंद? माघ मेले में बवाल के बाद उठा सवाल, यूजर्स बोले - 'सबके भ्रम टूटेंगे धीरे-धीरे'
प्रयागराज माघ मेले में हुए बवाल के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच टकराव है? अनशन पर बैठे शंकराचार्य, अस्पताल में भर्ती उनके शिष्य और प्रशासन की सख्ती ने इस विवाद को सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सियासी बहस में बदल दिया है. लोग अब शंकराचार्य के योगी और पीएम पर पुराने बयानों को भी सर्च कर पढ़ रहे हैं.
यूपी के प्रयागराज का माघ मेला जहां परंपरा, आस्था और सत्ता सदियों से साथ-साथ चलते आए हैं, लेकिन इस बार संगम की रेती पर श्रद्धा से ज्यादा तनाव दिखाई दे रहा है. शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का अनशन, उनके समर्थकों पर कार्रवाई और शिष्यों का अस्पताल पहुंचना, इन सबने एक सवाल को हवा दे दी है. क्या योगी सरकार को अविमुक्तेश्वरानंद पसंद नहीं? या फिर यह सिर्फ कानून-व्यवस्था बनाम धार्मिक अनुशासन का मामला है?
क्या सीएम पसंद नहीं है शंकराचार्य?
प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या स्नान पर्व के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिष्यों और पुलिस के बीच धक्कामुक्की को लेकर बवाल जारी है. हंगामे में घायल शंकराचार्य समर्थकों का फिलहाल अस्पताल में इलाज जारी है तो वहीं दूसरी ओर खुद शंकराचार्य अपने शिविर के बाहर शिष्यों के साथ अन्न-जल त्याग कर धरने पर बैठे हैं.
पहले भी ऐसे कई मौके आते रहे हैं जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सीएम योगी आदित्यनाथ के खिलाफ बयानबाजी की हो. पिछले ही वर्ष प्रयागराज में महाकुंभ मेले के दौरान मची भगदड़ को लेकर भी शंकराचार्य ने योगी आदित्यनाथ का इस्तीफा मांगा था. उन्होंने यह भी कहा था कि अगर वो बीजेपी अध्यक्ष होते तो इस मामले को जरू देखते.
पीएम मोदी को भी कहते रहे हैं भला बुरा
यही नहीं, शंकराचार्य पीएम मोदी पर भी निशाना साधते रहे हैं. उत्तराखंड स्थित ज्योतिष पीठ (ज्योतिर्मठ) के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सितंबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर बड़ी बात कही थी. उन्होंने पीएम मोदी के जन्मदिन को लेकर कहा था कि अंग्रेजी तारीख से जो भी व्यक्ति अपना जन्मदिन मनाता है, हम उसको हिन्दू नहीं मानते, क्योंकि, हिन्दुओं के देवी देवताओं की अंग्रेजी तारीख से जन्मतिथि नहीं बनाई जाती है.
एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, 'अंग्रेजों की तारीख से जो भी अपना जन्मदिन मना रहा है, या तो उनकी मां अंग्रेज होगी या फिर पिता अंग्रेज होगा. इसलिए हम अंग्रेजी तारीख से मनाने वाले लोगों को न ही शुभकामनाएं देते हैं और न ही कोई चर्चा करते हैं.
गौ हत्या पर भी उन्होंने कहा था,' हमें भारत के पीम मोदी से एक ही सवाल पूछना है, "तुम हिन्दू हो..तुम्हारे पास ताकत है और तुम गद्दी पर बैठे हो. तुमने हिन्दुओं के वोट लिए हैं. तुम गाय के बछड़े को दुलारते हुए दिखाई भी दे रहे हो. बावजूद इसके क्या कारण है कि पीएम गौ हत्या को बंद नहीं करा रहे हैं. क्या दबाव है इसको सार्वजनिक करो. या फिर हिन्दू-हिन्दू वाला नाटक छोड़ो."
माघ मेले में आखिर हुआ क्या?
18 जनवरी 2026 को माघ मेले के दौरान गौहत्या, धार्मिक परंपराओं और प्रशासनिक फैसलों को लेकर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कड़ा रुख अपनाया है. उन्होंने आरोप लगाया कि संतों की बातों को नजरअंदाज किया जा रहा है. सरकार सिर्फ आयोजन और व्यवस्थाओं पर ध्यान दे रही है, धार्मिक मूल्यों पर नहीं. इसी के विरोध में शंकराचार्य अनशन पर बैठ गए, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गई.
अनशन बढ़ने के साथ प्रशासन ने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए हस्तक्षेप किया. शंकराचार्य के कुछ शिष्यों को हिरासत/चिकित्सकीय निगरानी में लिया गया. इस दौरान पुलिस के हाथापाई में शंकराचार्य के कई शिष्य घायल हो गए और उन्हें अस्पताल पहुंचाना पड़ा. यहीं से मामला सिर्फ धार्मिक नहीं रहा, बल्कि राज्य सरकार बनाम शंकराचार्य की बहस बन गया.
पुराने मतभेद भी आए सामने
यह पहला मौका नहीं है जब अविमुक्तेश्वरानंद और योगी सरकार आमने-सामने दिखे हों. पहले भी, गौ-नीति, धार्मिक निर्णयों में सरकार की भूमिका, संतों की अनदेखी जैसे मुद्दों पर शंकराचार्य सरकार की आलोचना कर चुके हैं. खास बात यह है कि योगी आदित्यनाथ स्वयं नाथ संप्रदाय के महंत हैं. यानी धर्म और सत्ता का संगम. ऐसे में किसी शंकराचार्य से टकराव का संकेत साधारण घटना नहीं माना जा रहा.
योगी सरकार का पक्ष क्या है?
सरकार और प्रशासन का तर्क है कि माघ मेले में कानून-व्यवस्था सर्वोपरि है. किसी को भी सार्वजनिक व्यवस्था बाधित करने की अनुमति नहीं. संत हों या सामान्य नागरिक, नियम सबके लिए समान है. सरकारी खेमे का कहना है कि इसे व्यक्तिगत टकराव की तरह पेश करना गलत है.
वहीं, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने पुलिस प्रशासन पर बदसलूकी, शिष्यों के साथ धक्का मुक्की और मारपीट के आरोप लगाए और बिना स्नान किए ही अपनी पालकी लेकर अखाड़े में लौट गए.
संतों के साथ दुर्व्यवहार हुआ बर्दाश्त नहीं
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में अखिलेश यादव ने लिखा, “माघ मेले के इलाके में साधुओं, भक्तों और तीर्थयात्रियों के साथ पिछले साल की तरह इस साल भी हुआ दुर्व्यवहार अक्षम्य है. शाही स्नान की सदियों पुरानी अटूट सनातनी परंपरा को पिछले साल इसी सरकार ने तोड़ा था.
कंचन काया जलकर राख हो जाती धीरे-धीरे
सोशल मीडिया यूजर राजीव वर्मा @RajeevVermaRV का कहना है कि संतो के साथ अमर्यादित व्यवहार करने वालों के भ्रम टूटेंगे धीरे—धीरे. ताजो तख्त सदा नहीं रहते. प्रकृति भी बदलती है धीरे धीरे. चाहे शख्स सत्ता के किसी भी पद पर क्यों न बैठा हो, घमंड, कनक और कंचन काया जैसी चीजें चीता की आग में जलकर राख हो जाती है धीरे धीरे.





