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आप शंकराचार्य कैसे? नोटिस पर अविमुक्तेश्वरानंद का करारा जवाब, मेला प्रशासन को भेजे 8 पन्नों के जवाब में क्या-क्या?

प्रयागराज माघ मेला प्राधिकरण द्वारा भेजे गए नोटिस के जवाब में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अंजनी कुमार मिश्रा ने आठ पन्नों का विस्तृत जवाब भेजा है. वकील का कहना है कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने जीवनकाल में ही अविमुक्तेश्वरानंद को उत्तराधिकारी घोषित किया था और 12 सितंबर 2022 को उनका विधिवत पट्टाभिषेक हुआ था, जिसका उल्लेख सुप्रीम कोर्ट के आदेशों में भी है.

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( Image Source:  ANI )
नवनीत कुमार
Edited By: नवनीत कुमार

Updated on: 21 Jan 2026 8:32 AM IST

प्रयागराज माघ मेले में चल रहा विवाद अब सिर्फ जमीन आवंटन या नोटिस तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे शंकराचार्य परंपरा, धार्मिक अधिकार और संवैधानिक दायरे तक पहुंच गया है. शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को मेला प्रशासन की ओर से भेजे गए नोटिस ने सनातन परंपरा से जुड़े बड़े सवाल खड़े कर दिए. प्रशासन ने उनसे पूछा कि वे खुद को शंकराचार्य किस आधार पर बता रहे हैं, जबकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

इस नोटिस के जवाब में अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अंजनी कुमार मिश्रा ने आठ पन्नों का विस्तृत और तीखा जवाब भेज दिया है. इस जवाब ने पूरे विवाद को नया मोड़ दे दिया है और प्रशासन की भूमिका पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं.

ठंड में साधना और खुला विरोध

माघ मेले में जमीन आवंटन को लेकर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का विरोध लगातार जारी है. वे अब भी अपने कैंप के बाहर सड़क पर टेंट लगाकर बैठे हैं और कड़ाके की ठंड में साधना कर रहे हैं. उनका कहना है कि भूखे-प्यासे रहकर तपस्या करना शंकराचार्य परंपरा का हिस्सा है, कोई प्रदर्शन नहीं. इंटरव्यू में उन्होंने तीखा सवाल उठाया, “जो लोग धर्मनिरपेक्षता की शपथ लेते हैं, वही धर्म के मार्ग में बाधा क्यों बन रहे हैं?” उनका दावा है कि जैसे यज्ञ बिना नारियल की आहुति के अधूरा माना जाता है, वैसे ही शंकराचार्य के स्नान के बिना माघ मेला भी पूर्ण नहीं माना जा सकता.

आठ पन्नों के जवाब में क्या-क्या?

अधिवक्ता अंजनी कुमार मिश्रा द्वारा भेजे गए जवाब में साफ कहा गया है कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने अपने जीवनकाल में ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. उनके ब्रह्मलीन होने के अगले ही दिन, 12 सितंबर 2022 को वैदिक विधि-विधान से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का विधिवत पट्टाभिषेक किया गया. जवाब में यह भी बताया गया है कि इस तथ्य का जिक्र सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के आदेश में भी है. यानी यह दावा सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि न्यायिक दस्तावेजों में भी दर्ज है.

कोई रोक नहीं, कोई स्टे नहीं: वकील का बड़ा दावा

जवाब में स्पष्ट कहा गया है कि शंकराचार्य पद को लेकर किसी भी न्यायालय ने कोई स्थगन आदेश जारी नहीं किया है. इसके अलावा श्रृंगेरी, द्वारका और पुरी पीठ के शंकराचार्यों के समर्थन का भी दावा किया गया है. अधिवक्ता ने यह भी बताया कि ब्रह्मलीन स्वरूपानंद सरस्वती की पंजीकृत वसीयत को गुजरात हाईकोर्ट पहले ही वैध ठहरा चुका है और उसे चुनौती देने वाली याचिका खारिज हो चुकी है. ऐसे में मेला प्रशासन का नोटिस कानूनी रूप से आधारहीन बताया गया है.

आधी रात में नोटिस, गलत नीयत का आरोप

वकील ने मेला प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि 19 जनवरी की आधी रात के बाद नोटिस चिपकाया गया, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सो रहे थे. जवाब में इसे दुर्भावनापूर्ण, मनमाना और बदनाम करने की कोशिश बताया गया है. यह भी आरोप लगाया गया है कि इस नोटिस का उद्देश्य न सिर्फ शंकराचार्य की छवि को नुकसान पहुंचाना था, बल्कि करोड़ों सनातन अनुयायियों की धार्मिक भावनाओं को भी ठेस पहुंचाना है.

कोर्ट की अवमानना का दावा, 24 घंटे का अल्टीमेटम

आठ पन्नों के जवाब में मेला प्रशासन के नोटिस को सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले में हस्तक्षेप बताया गया है. अधिवक्ता ने इसे न्यायालय की अवमानना के समान करार दिया है. वकील ने चेतावनी दी है कि अगर 24 घंटे के भीतर यह नोटिस वापस नहीं लिया गया, तो कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट समेत अन्य कानूनी कार्रवाई की जाएगी. जवाब ईमेल के साथ-साथ मेला प्राधिकरण के कार्यालय तक भी भेजा गया है.

नोटिस चिपकाने पर भी विवाद

जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की टीम जवाब लेकर मेला प्राधिकरण के दफ्तर पहुंची, तो वहां कोई जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं मिला. इसके बाद अनुयायियों ने जवाब कार्यालय के गेट पर ही चिपका दिया. यह दृश्य भी चर्चा का विषय बन गया है. स्वामी के समर्थकों का कहना है कि यह रवैया प्रशासन की गंभीरता और संवेदनशीलता दोनों पर सवाल खड़ा करता है.

टकराव कहां तक जाएगा?

यह विवाद अब सिर्फ एक नोटिस या जमीन आवंटन का नहीं रह गया है. यह शंकराचार्य परंपरा, न्यायालय के आदेश और प्रशासनिक अधिकारों के टकराव की कहानी बन चुका है. अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि मेला प्रशासन क्या कदम उठाता है. नोटिस वापस लेता है या कानूनी लड़ाई और तेज होती है. तय इतना है कि यह मामला आने वाले दिनों में धार्मिक और संवैधानिक बहस को और गहराएगा.

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