तमिलनाडु की क्या है द्रविड़ राजनीति, 110 साल पुराना है इतिहास, एक ही विचार होते क्यों धुर विरोधी DMK-AIADMK?
तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति का 110 साल पुराना इतिहास जानिए. DMK और AIADMK एक ही विचारधारा से निकलीं, फिर भी कैसे बनीं सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी.
द्रविड़ पॉलिटिक्स की वजह से तमिलनाडु की राजनीति देश के बाकी राज्यों से काफी अलग मानी जाती है. ऐसा इसलिए कि यहां जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक न्याय की राजनीति ने एक ऐसी विचारधारा को जन्म दिया जिसे 'द्रविड़ राजनीति' कहा जाता है. लेकिन हाल ही संपन्न विधानसभा चुनाव में टीवीके प्रमुख थलापति विजय उभार ने वहां की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है. चौंकाने वाली बात यह है कि राज्य की दो सबसे बड़ी पार्टियां (DMK और AIADMK)एक ही द्रविड़ आंदोलन से निकलीं, दोनों की विचारधारा लगभग समान है, लेकिन राजनीतिक रूप से दोनों दशकों से कट्टर प्रतिद्वंद्वी बनी हुई है और पिछले पांच दशक से ज्यादा समय से तमिल राजनीति पर कब्जा है, लेकिन दोनों की पार्टी इस मजबूत पकड़ को विजय ने बहुत बड़ा झटका दे दिया है. यही वजह है कि लोग यह जानना चाहते हैं कि द्रविड़ राजनीति की कितनी पुरानी है,क्या है इसका इतिहास जिससे विजय भी दूरी नहीं बनाना चाहते हैं.
1916: जस्टिस पार्टी और गैर-ब्राह्मण आंदोलन की शुरुआत
द्रविड़ राजनीति की शुरुआत 1916 में जस्टिस पार्टी के गठन से मानी जाती है. उस समय मद्रास प्रेसीडेंसी में प्रशासन, शिक्षा और सरकारी नौकरियों में ब्राह्मण समुदाय का दबदबा था. गैर-ब्राह्मण समुदायों को लगता था कि उन्हें राजनीतिक और सामाजिक रूप से पीछे रखा जा रहा है.
इसी असंतोष से साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन बनी, जिसे बाद में जस्टिस पार्टी कहा गया. पार्टी का मुख्य उद्देश्य गैर-ब्राह्मणों को प्रतिनिधित्व दिलाना और सामाजिक बराबरी स्थापित करना था. यहीं से दक्षिण भारत में सामाजिक न्याय आधारित राजनीति की नींव पड़ी.
1925: पेरियार और सेल्फ-रिस्पेक्ट मूवमेंट
1925 में E. V. Ramasamy Periyar ने 'सेल्फ-रिस्पेक्ट मूवमेंट' शुरू किया. पेरियार ने जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवाद और धार्मिक अंधविश्वासों का तीखा विरोध किया. उनका मानना था कि दक्षिण भारत की द्रविड़ संस्कृति पर उत्तर भारत की आर्य संस्कृति थोपी जा रही है.
उन्होंने महिलाओं के अधिकार, आत्मसम्मान और सामाजिक समानता पर जोर दिया. पेरियार की राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव की राजनीति थी. यही आंदोलन आगे चलकर तमिल पहचान की सबसे बड़ी आवाज बना.
1944: द्रविड़ कड़गम का गठन
1944 में पेरियार ने जस्टिस पार्टी को बदलकर द्रविड़ कड़गम (DK) बना दिया. यह एक सामाजिक संगठन था, चुनावी पार्टी नहीं. पेरियार का मानना था कि सामाजिक क्रांति चुनावी राजनीति से ज्यादा जरूरी है.
लेकिन उनके कई समर्थक चाहते थे कि आंदोलन सीधे सत्ता में जाकर बदलाव करे. यहीं से संगठन के भीतर वैचारिक मतभेद शुरू हुए.
1949: DMK का गठन और चुनावी राजनीति की शुरुआत
1949 में C. N. Annadurai ने पेरियार से अलग होकर DMK की स्थापना की. अन्नादुरई का मानना था कि सत्ता में आए बिना सामाजिक बदलाव अधूरा रहेगा.
DMK ने तमिल भाषा, क्षेत्रीय स्वाभिमान, सामाजिक न्याय और हिंदी विरोध को अपना मुख्य एजेंडा बनाया. पार्टी ने फिल्मों, थिएटर और साहित्य के जरिए अपनी विचारधारा को आम जनता तक पहुंचाया. यही कारण था कि DMK तेजी से लोकप्रिय होती गई.
1965: हिंदी विरोध आंदोलन ने बदली राजनीति
1965 में केंद्र सरकार की हिंदी को बढ़ावा देने वाली नीतियों के खिलाफ तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर आंदोलन हुआ. DMK ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया.
राज्य में यह भावना मजबूत हुई कि हिंदी थोपने की कोशिश तमिल पहचान के खिलाफ है. इस आंदोलन ने कांग्रेस को कमजोर कर दिया और द्रविड़ राजनीति को जनता के बीच स्थायी आधार दे दिया.
1967: पहली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर
1967 का विधानसभा चुनाव तमिलनाडु की राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ. DMK ने कांग्रेस को हराकर सत्ता हासिल कर ली और C. N. Annadurai मुख्यमंत्री बने.
यह पहली बार था जब किसी क्षेत्रीय दल ने राज्य में कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया. इसके बाद तमिलनाडु की राजनीति लगभग पूरी तरह द्रविड़ दलों के नियंत्रण में आ गई.
1972: DMK से अलग होकर बनी AIADMK
अन्नादुरई की मृत्यु के बाद M. Karunanidhi DMK के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे. वहीं अभिनेता और लोकप्रिय नेता M. G. Ramachandran यानी एमजीआर की लोकप्रियता भी तेजी से बढ़ रही थी. 1972 में करुणानिधि और एमजीआर के बीच मतभेद बढ़ गए. एमजीआर ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, जिसके बाद उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया. इसके बाद उन्होंने AIADMK की स्थापना की. यहीं से द्रविड़ राजनीति दो हिस्सों में बंट गई. रामचंद्रन चाहते थे कि हिंदी सहित सभी राष्ट्रीय मसलों व द्रविड़ियन पॉलिसी पर पार्टी स्टैंड हार्ड लाइन वाली की जगह सॉफ्ट लाइन की होनी चाहिए.
विचारधारा एक, राजनीति अलग
DMK और AIADMK दोनों की राजनीति सामाजिक न्याय, आरक्षण, तमिल पहचान और क्षेत्रीय स्वाभिमान पर आधारित रही. दोनों ही पार्टियां केंद्र सरकार के अत्यधिक हस्तक्षेप का विरोध करती रहीं.
फिर भी दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर नेतृत्व शैली का रहा. DMK संगठन और कैडर आधारित पार्टी बनी, जबकि AIADMK पूरी तरह करिश्माई नेतृत्व पर टिकी रही. पहले एमजीआर और बाद में J. Jayalalithaa ने AIADMK को जनकल्याणकारी योजनाओं और मजबूत व्यक्तिगत छवि के दम पर आगे बढ़ाया.
करुणानिधि बनाम जयललिता की राजनीति
1980 और 1990 के दशक में तमिलनाडु की राजनीति पूरी तरह करुणानिधि बनाम जयललिता में बदल गई. दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक संघर्ष बेहद तीखा था. विधानसभा से लेकर सड़कों तक टकराव दिखाई देता था.
हालांकि, जनता लगातार इन्हीं दोनों दलों के बीच सत्ता बदलती रही. इससे साफ हो गया कि तमिलनाडु की राजनीति अब पूरी तरह द्रविड़ मॉडल पर टिक चुकी है.
आज भी कायम है द्रविड़ राजनीति का प्रभाव!
आज M. K. Stalin के नेतृत्व में DMK सत्ता में है, जबकि AIADMK मुख्य विपक्षी दल है. दोनों पार्टियां आज भी सामाजिक न्याय, आरक्षण और तमिल पहचान को अपनी राजनीति का केंद्र बनाए हुए हैं.
यानी विचारधारा एक होने के बावजूद DMK और AIADMK की लड़ाई अब सत्ता, नेतृत्व और राजनीतिक विरासत की लड़ाई बन चुकी है. यही वजह है कि एक ही आंदोलन से निकली ये दोनों पार्टियां तमिलनाडु की राजनीति में दशकों से सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी बनी हुई हैं.
द्रविड़ के मसले पर DMK और AIADMK में अंतर क्या?
DMK और AIADMK दोनों तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति से निकली पार्टियां हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक शैली और नेतृत्व में बड़ा अंतर है. DMK की स्थापना 1949 में C. N. Annadurai ने की थी, जबकि AIADMK 1972 में M. G. Ramachandran यानी एमजीआर ने DMK से अलग होकर बनाई थी.
DMK खुद को वैचारिक और संगठन आधारित पार्टी मानती है. यह सामाजिक न्याय, तमिल पहचान, धर्मनिरपेक्षता और राज्यों के अधिकार जैसे मुद्दों पर खुलकर राजनीति करती है. पार्टी में करुणानिधि परिवार का लंबे समय से प्रभाव रहा है और आज M. K. Stalin इसका नेतृत्व कर रहे हैं.
वहीं AIADMK की राजनीति करिश्माई नेतृत्व और जनकल्याणकारी योजनाओं पर आधारित रही. एमजीआर और बाद में J. Jayalalithaa ने मुफ्त योजनाओं और गरीब समर्थक राजनीति से पार्टी को मजबूत बनाया.
यानी दोनों पार्टियों की मूल द्रविड़ विचारधारा समान है, लेकिन DMK वैचारिक राजनीति पर जोर देती है, जबकि AIADMK वेलफेयर और जननेता आधारित राजनीति के लिए जानी जाती है.
द्रविड़ पॉलिटिक्स पर विजय का क्या रुख?
थलापति विजय की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) खुद को तमिलनाडु की पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से पूरी तरह अलग भी नहीं बताती और पूरी तरह उसी धारा का हिस्सा भी नहीं मानती. विजय सामाजिक न्याय, शिक्षा, समानता और तमिल पहचान जैसे मुद्दों का समर्थन करते हैं, जो द्रविड़ राजनीति के मूल तत्व रहे हैं.
हालांकि, उन्होंने कई बार संकेत दिया है कि उनकी राजनीति केवल “एंटी-हिंदी” या “वंशवादी द्रविड़ मॉडल” तक सीमित नहीं रहेगी. विजय भ्रष्टाचार, परिवारवाद और पारंपरिक दलों की सत्ता राजनीति पर सवाल उठाते रहे हैं. इसे DMK और AIADMK दोनों के खिलाफ वैकल्पिक राजनीति के रूप में देखा जा रहा है. विजय युवाओं, रोजगार, पारदर्शिता और सुशासन पर जोर देकर “नई पीढ़ी की द्रविड़ राजनीति” की बात करते हैं.




