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Project 75I: क्या है भारत का प्रोजेक्ट 75i, इंडियन नेवी को लेकर बड़ी प्लानिंग, जर्मनी में होगी कितनी बड़ी डील?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के जर्मनी दौरे में भारत-जर्मनी के बीच 80 हजार करोड़ की सबमरीन डील पर अहम चर्चा होने की संभावना है. यह सौदा प्रोजेक्ट-75आई के तहत भारत की समुद्री ताकत को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है.

Project 75I: क्या है भारत का प्रोजेक्ट 75i, इंडियन नेवी को लेकर बड़ी प्लानिंग, जर्मनी में होगी कितनी बड़ी डील?
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( Image Source:  X- @indiannavy )

What is Project 75i: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह आज यानी 21 अप्रैल को जर्मनी के दौरे पर जा रहे हैं, जहां भारत और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर चर्चा होगी. इस यात्रा के दौरान करीब 80 हजार करोड़ रुपये की संभावित सबमरीन डील पर भी बातचीत होने की उम्मीद है. यह डील भारतीय नौसेना के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट-75आई के तहत प्रस्तावित है, जिसमें जर्मनी तकनीकी सहयोग देगा.

जर्मनी दौरे के दौरान राजनाथ सिंह अपने जर्मन समकक्ष बोरिस पिस्टोरियस और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात करेंगे. इस दौरान उभरती सैन्य तकनीकों में सहयोग और रक्षा साझेदारी को गहरा करने पर जोर रहेगा. 2019 में रक्षा मंत्री बनने के बाद यह उनका पहला जर्मनी दौरा होगा. इससे पहले 2023 में जर्मन रक्षा मंत्री भारत आए थे, जहां दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों को विस्तार देने पर चर्चा हुई थी. इस यात्रा का प्रमुख फोकस प्रोजेक्ट-75आई की प्रगति पर रहेगा, जो भारतीय नौसेना की क्षमताओं को मजबूत करने के लिए एक अहम कार्यक्रम है.

क्या है प्रोजेक्ट 75i?

इस प्रोजेक्ट के तहत 6 अत्याधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का निर्माण किया जाना है, जिनमें उन्नत एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन (AIP) सिस्टम लगाया जाएगा. यह तकनीक पनडुब्बियों को लंबे समय तक पानी के भीतर रहने में सक्षम बनाती है, जिससे उनकी गुप्त संचालन क्षमता और प्रभावशीलता काफी बढ़ जाती है.

इन पनडुब्बियों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा, जिसके लिए मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और जर्मनी की थेसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स के बीच रणनीतिक साझेदारी की योजना है. यह पहल सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य देश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना और तकनीकी हस्तांतरण सुनिश्चित करना है.

क्या है इस डील का मकसद?

प्रोजेक्ट-75आई भारतीय नौसेना के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसका उद्देश्य समुद्री सुरक्षा और युद्ध क्षमता को मजबूत करना है. इस परियोजना के तहत बनने वाली पनडुब्बियां आधुनिक टॉरपीडो और ब्रह्मोस जैसी एंटी-शिप क्रूज मिसाइलों से लैस होंगी, जो दुश्मन के जहाजों और जमीनी ठिकानों पर सटीक हमला कर सकती हैं. यह पनडुब्बियां हिंद महासागर क्षेत्र में चीन जैसे खतरों से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.

इन पनडुब्बियों की सबसे बड़ी खासियत AIP तकनीक है, जिसकी मदद से वे बिना हवा के इस्तेमाल के कई हफ्तों तक पानी के अंदर रह सकती हैं. इसके विपरीत, सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हर 1-2 दिन में सतह पर आना पड़ता है. इस तकनीक से भारतीय नौसेना की गुप्त निगरानी और रणनीतिक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी.

जर्मन तकनीकी सहयोग से भारत को न केवल अत्याधुनिक पनडुब्बियां मिलेंगी, बल्कि भविष्य में स्वदेशी स्तर पर उन्नत पनडुब्बियां विकसित करने की क्षमता भी हासिल होगी. इससे देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था और अधिक मजबूत होगी.

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