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Alcohol addiction: क्या है वो कमी जिसकी वजह से लोग पीते हैं शराब?

अक्सर शराब की आदत सिर्फ शौक या संगत की वजह से नहीं, बल्कि भीतर की किसी कमी या खालीपन से जुड़ी होती है. जब इंसान को मानसिक सुकून, चैन या इमोशनल बैलैंस नहीं मिल पाता, तो वह कुछ पल की राहत के लिए शराब जैसी चीज़ों का सहारा लेने लगता है.

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लोग क्यों पीते हैं शरा

( Image Source:  AI SORA )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत4 Mins Read

Updated on: 21 April 2026 9:00 PM IST

हम अक्सर किसी को शराब पीते देख तुरंत उसे 'शराबी' कह देते हैं, जैसे उसकी पूरी पहचान बस इसी एक चीज़ से तय हो जाती हो. लेकिन क्या कभी सोचा है कि कोई इंसान आखिर उस रास्ते तक पहुंचता ही क्यों है? इस पर फेमस विचारक आचार्य प्रशांत ने बताया है कि शराब की लत सिर्फ एक बुरी आदत नहीं, बल्कि भीतर की एक गहरी कमी और बेचैनी का साइन होती है.

दरअसल, हर इंसान के अंदर एक तलाश चलती रहती है, शांति की, सुकून की, या किसी ऐसी चीज़ की जो उसे भीतर से पूरा कर सके. जब यह तलाश सही डायरेक्शन नहीं पाती, तब इंसान गलत रास्तों की ओर मुड़ सकता है, और यही से नशे की शुरुआत होती है.

लोग क्यों पीते हैं शराब?

सोचिए, कोई शख्स दिनभर काम करता है, घर लौटता है, लेकिन फिर भी उसे चैन नहीं मिलता. बाहर से सब ठीक दिखता है, लेकिन अंदर एक खालीपन रहता है. यह खालीपन ही असली वजह है, जो इंसान को कुछ 'और' खोजने पर मजबूर करता है. जैसे एक आदमी रेगिस्तान में प्यासा हो, उसे पानी चाहिए, लेकिन अगर उसे साफ पानी न मिले, तो वह गंदा पानी भी पी सकता है. ठीक इसी तरह, जब मन को असली सुकून नहीं मिलता, तो इंसान शराब जैसी चीज़ों में राहत ढूंढने लगता है.

शराब क्या करती है?

शराब पीने के बाद कुछ देर के लिए दिमाग हल्का महसूस करता है. तनाव कम लगता है, और वो बातें भी बाहर आ जाती हैं जो आमतौर पर दिल में दबाकर रखी जाती हैं. कई लोग कहते हैं, 'पीकर सच बोल देता है.' दरअसल, वो सच पहले से ही भीतर था, बस दबा हुआ था. लेकिन यह राहत असली नहीं होती है. यह बस कुछ समय के लिए मन की कंडीशन को बदल देती है. जैसे किसी दर्द पर अस्थायी दवा लगाना, जो थोड़ी देर राहत दे, लेकिन समस्या जड़ से खत्म न करे.

क्यों कुछ लोग जल्दी फंस जाते हैं इस जाल में?

हर व्यक्ति शराब का आदी नहीं बनता. कुछ लोग जल्दी इसकी पकड़ में आ जाते हैं, क्योंकि वे अंदर से ज्यादा सेंसेटिव होते हैं. उन्हें जीवन की परेशानियां, झूठ, दबाव और तनाव ज्यादा गहराई से महसूस होते हैं. उदाहरण के लिए, दो लोग एक ही समस्या से गुजरते हैं, एक उसे नजरअंदाज कर आगे बढ़ जाता है, जबकि दूसरा उसे दिल पर ले लेता है. वही दूसरा व्यक्ति ज्यादा संभावना रखता है कि वह किसी नशे का सहारा ले.

क्या सिर्फ शराब ही नशा है?

अगर ध्यान से देखें, तो नशा सिर्फ शराब या ड्रग्स तक सीमित नहीं है. कोई पैसे के पीछे भाग रहा है, कोई नाम और ताकत के पीछे, कोई रिश्तों में जरूरत से ज्यादा उलझा हुआ है. ये सब भी एक तरह के नशे ही हैं. एक बिजनेस मैन दिन-रात पैसा कमाने में लगा है, उसे चैन नहीं है. यह भी एक लत है. कोई सोशल मीडिया पर लाइक्स के लिए जी रहा है. यह भी एक तरह की निर्भरता है. फर्क बस इतना है कि इन नशों को समाज नॉर्मल मान लेता है.

असली जरूरत को समझना है समाधान

अगर समस्या की जड़ समझ में आ जाए, तो समाधान भी साफ हो जाता है. अगर किसी को सच्चा सुकून, आत्मिक शांति और संतोष मिल जाए, तो उसे बाहरी सहारों की जरूरत नहीं रहती. जैसे अगर किसी प्यासे को साफ पानी मिल जाए, तो वह गंदे पानी की ओर कभी नहीं जाएगा. उसी तरह, अगर इंसान को भीतर से चैन मिल जाए, तो शराब या किसी भी नशे की पकड़ अपने आप ढीली पड़ने लगती है.

अध्यात्म: असली राहत का रास्ता

यहां 'अध्यात्म' का मतलब सिर्फ धार्मिक रस्मों से नहीं है, बल्कि खुद को समझने से है. अपने मन, अपनी इच्छाओं और अपनी बेचैनी को पहचानने से है. जब इंसान खुद को समझने लगता है, तो धीरे-धीरे उसकी निर्भरता बाहर की चीज़ों पर कम होने लगती है. शराब की लत को सिर्फ एक बुरी आदत मानकर नकार देना आसान है, लेकिन असली समझ तब आती है जब हम उसकी जड़ तक पहुंचते हैं. हर लत के पीछे एक कहानी होती है. एक अधूरी तलाश, एक अनसुनी बेचैनी. अगर हम उस कहानी को समझ लें, तो नशे से बाहर निकलने का रास्ता भी खुद-ब-खुद दिखने लगता है.

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