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जम्मू-कश्मीर भारत का अहम हिस्सा... क्या कहता है अमेरिकी राजदूत का कश्मीर दौरा, क्या देर-सवेर ट्रंप को समझ आ गई भारत की अहमियत?

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर (Sergio Gor) के कश्मीर दौरे से India-US रिश्ते और वॉशिंगटन की कश्मीर नीति पर नए संकेत मिले हैं. क्या यह Trump प्रशासन का बदला रुख है?

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( Image Source:  ANI )

भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का जम्मू-कश्मीर दौरा ऐसे समय हुआ है, जब कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक नैरेटिव की लड़ाई चरम पर है. इस बीच मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से मुलाकात के दौरान सर्जियो गोर का जम्मू-कश्मीर को “भारत का एक अहम हिस्सा” बताना काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. उन्होंने क्षेत्र की सुरक्षा, विकास और खूबसूरती की तारीफ की और संकेत दिया कि अमेरिका अपनी जम्मू-कश्मीर ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा कर सकता है.

ऐसे में अमेरिकी राजदूत का यह दौरा केवल एक राजनयिक यात्रा नहीं, बल्कि अमेरिका के मौजूदा कश्मीर नीति में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है.

क्या अमेरिकी ट्रैवल एडवाइजरी में ढील से बदलेगी कश्मीर की तस्वीर?

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने माना कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा को लेकर केंद्र और प्रदेश सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि हालात की समीक्षा के बाद अमेरिकी नागरिकों के लिए जारी यात्रा चेतावनी में कमी पर विचार किया जा सकता है. यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि किसी क्षेत्र को लेकर अमेरिकी सुरक्षा आकलन में बदलाव का सीधा असर वहां आने वाले अमेरिकी पर्यटकों और निवेशकों के भरोसे पर पड़ सकता है. कश्मीर को विदेशी पर्यटन के लिहाज से एक सुरक्षित और आकर्षक गंतव्य के तौर पर पेश करने की भारत की कोशिशों को भी इससे बल मिल सकता है.

क्या उमर अब्दुल्ला ने अमेरिका से दूरी और केंद्र पर भरोसा जताया?

अमेरिकी राजदूत से मुलाकात के बावजूद उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के मुद्दों को लेकर अमेरिका से किसी समाधान की उम्मीद जताने से साफ इनकार किया. उन्होंने कहा कि किसी दूसरे देश के राजदूत से अपने ही देश के बारे में शिकायत करना उनकी आदत नहीं है.

उमर के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर के मुद्दों का समाधान वॉशिंगटन में नहीं, बल्कि भारत सरकार और नई दिल्ली के स्तर पर होना है. उनका रुख इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उन्होंने बातचीत के दरवाजे खुले रखते हुए समाधान की जिम्मेदारी भारतीय व्यवस्था पर ही रखी.

क्या पाकिस्तान के नैरेटिव को लगा अमेरिकी दौरे से झटका?

विदेश मामलों के जानकार डॉ. ब्रह्दीप अलूने के मुताबिक, इस दौरे को क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में देखना चाहिए. उनका कहना है कि अनुच्छेद 370 में बदलाव और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में असंतोष, बलूचिस्तान में विरोध और खैबर पख्तूनख्वा में सरकार के खिलाफ आवाजें पाकिस्तान की आंतरिक चुनौतियों को सामने ला रही हैं.

ऐसे समय में पाकिस्तान लगातार अमेरिका के साथ अपने सामरिक संबंधों को रेखांकित कर रहा है और कश्मीर में अस्थिरता का नैरेटिव पेश करने की कोशिश करता रहा है. अलूने के अनुसार, ऐसे माहौल में अमेरिकी राजदूत का जम्मू-कश्मीर पहुंचकर सुरक्षा और विकास की स्थिति का सकारात्मक बताना पाकिस्तान के उस नैरेटिव को कमजोर करता है, जिसमें वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर को अस्थिर क्षेत्र के तौर पर पेश करता रहा है.

क्या अमेरिका ने पाक को भारत की बढ़ती अहमियत का संदेश दिया?

डॉ. अलूने के आकलन में अमेरिकी राजदूत का जम्मू-कश्मीर दौरा यह संकेत देता है कि वॉशिंगटन अब कश्मीर को केवल भारत-पाकिस्तान विवाद के चश्मे से देखने के बजाय भारत के साथ अपने व्यापक रणनीतिक संबंधों के संदर्भ में देख रहा है. उनके मुताबिक, राजदूत का जम्मू-कश्मीर को भारत का अहम हिस्सा बताना और यहां की सुरक्षा व्यवस्था तथा विकास कार्यों को सकारात्मक रूप में देखना पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक झटका माना जा सकता है.

हालांकि, इसे पूरी तरह पाकिस्तान-विरोधी अमेरिकी नीति कहना सही नहीं होगा. ज्यादा महत्वपूर्ण संकेत यह है कि अमेरिका भारत को हिंद-प्रशांत और दक्षिण एशिया में अपने महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के तौर पर देखता है और उसी व्यापक रणनीतिक प्राथमिकता का असर कश्मीर नीति में भी दिखाई दे सकता है.

छह साल बाद फिर अमेरिकी राजदूत ने क्यों चुना कश्मीर?

जम्मू-कश्मीर में किसी अमेरिकी राजदूत का यह दौरा लंबे अंतराल के बाद हुआ है. इससे पहले अमेरिकी राजदूत केनेथ जस्टर ने 9 जनवरी 2020 को जम्मू-कश्मीर का दौरा किया था. वह भारत सरकार की ओर से विदेशी राजनयिकों के लिए आयोजित प्रतिनिधिमंडल के साथ श्रीनगर और जम्मू पहुंचे थे. यह यात्रा अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव के बाद की परिस्थितियों को विदेशी राजनयिकों के सामने रखने के प्रयास का हिस्सा थी. इससे पहले 2011 में अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर और 2002 में रॉबर्ट ब्लैकविल भी जम्मू-कश्मीर का दौरा कर चुके हैं.

तो क्या ट्रंप को समझ आ गई भारत की अहमियत?

सर्जियो गोर का दौरा निश्चित रूप से भारत के लिए सकारात्मक कूटनीतिक संकेत है, लेकिन इसे सीधे तौर पर “ट्रंप को भारत की अहमियत समझ आ गई” कहना अभी जल्दबाजी होगी. असली महत्व इस बात का है कि अमेरिका का भारत के साथ रणनीतिक, आर्थिक और रक्षा सहयोग लगातार व्यापक हो रहा है और जम्मू-कश्मीर को लेकर अमेरिकी राजदूत की भाषा भी इसी व्यापक रिश्ते के अनुरूप दिखाई दे रही है. कश्मीर को भारत का अहम हिस्सा बताना, सुरक्षा व्यवस्था की तारीफ करना और ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा की संभावना जताना भारत के लिए अहम हैं. सबसे बड़ा संदेश यही है कि अमेरिका कश्मीर पर पाकिस्तान के दावों को दोहराने के बजाय भारत के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को प्राथमिकता देता हुआ दिखाई दे रहा है.

स्टेट मिरर स्पेशल
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