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Explainer: मठ, महंत और आश्रमों पर बवाल, किन-किन पर चला कानून का डंडा, धर्म और सत्ता का क्या है खेल?

Avimukteshwaranand Controversy:स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ही नहीं भारत में धार्मिक संस्थाओं से जुड़े विवाद बार-बार क्यों सामने आते हैं? जानिए आस्था, सत्ता, व्यक्तिपूजा और जवाबदेही के टकराव की पूरी विश्लेषणात्मक कहानी.

Avimukteshwarananda controversy controversies over religious institutions
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Avimukteshwaranand Controversy : भारत में धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की धुरी है. आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठ व्यवस्था से लेकर आधुनिक आश्रमों और गुरुओं तक, धार्मिक संस्थाओं ने समाज को दिशा देने का काम किया. लेकिन समय-समय पर कुछ बड़े नाम जैसे गुरमीत राम रहीम सिंह, आसाराम बापू, नारायण साईं और रामपाल से जुड़े मामलों ने यह सवाल खड़ा किया कि आखिर धार्मिक संस्थाओं पर विवाद क्यों बार-बार सामने आते हैं? पिछले कुछ समय से यह मसला अविमुक्तेश्वरानंद माघ मेला और उन पर लगे यौन शोषण के आरोपों की वजह सुर्खियों में हैं. पहले की तरह एक बार सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं. शीर्ष अदालत के आदेश पर पुलिस पॉक्सो एक्ट में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.

इस बीच आशुतोष ब्रह्मचारी और श्री विद्यापीठ में रहकर पुस्तक लिखने वाली लेखिका भूमिका द्विवेदी ने कई सनसनी खेल खुलासे किए हैं. उसके बाद लोग उन सभी शंकराचार्यों, महंतो और महामंडलेश्वरों के बारे में जानना चाहते हैं, जो विवादों में आए. इनमें से कईयों को सजा मिली. आइए, जानते हैं ऐसे ही धर्म गुरुओं के बारे में.

अब तक विवादों में आने वाले प्रमुख धर्मगुरु कौन-कौन?

ताजा विवाद तो अविमुक्तेश्वरानंद की वजह से सुर्खियों में है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ज्योतिर्मठ (उत्तराखंड) के शंकराचार्य हैं, जो अद्वैत वेदांत परंपरा के प्रमुख धर्मगुरुओं में गिने जाते हैं. वे अपने बेबाक बयानों, धार्मिक मुद्दों पर सक्रियता और विभिन्न विवादों को लेकर अक्सर चर्चा में रहते हैं. हाल के समय में वे कुछ आरोपों, आश्रम से जुड़े मामलों और अन्य संतों के साथ सार्वजनिक विवादों के कारण सुर्खियों में आए हैं. उनके बयानों और गतिविधियों ने धर्म, राजनीति और आस्था के संबंधों को लेकर नई बहस छेड़ दी है, जिससे उनकी भूमिका और प्रभाव पर लगातार सवाल उठ रहे हैं.

पुलिस जांच शुरू होने और यौन शोषण मामले में मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद से उनकी मुश्किलें काफी बढ़ गई है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अलावा, जयेंद्र सरस्वती, जगद्गुरु रामभद्राचार्य, गुरमीत राम रहीम सिंह, आसाराम बापू, नारायण साईं, रामपाल, स्वामी नित्यानंद, जयेंद्र सरस्वती, राधे मां, इच्छाधारी भीमनाथ और निर्मल बाबा भी विवादों रहे हैं.

1. जयेंद्र सरस्वती

जयेंद्र सरस्वती से जुड़ा विवाद 2004 में सामने आया था. उन पर कांची मठ से जुड़े एक व्यक्ति शंकररमन की हत्या का आरोप लगा था. मृतक के परिजनों और पुलिस जांच के आधार पर केस दर्ज किया था. इस मामले में तमिलनाडु पुलिस ने साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया था. इस मामले में पुडुचेरी सेशन कोर्ट का फैसला 2013 में आया. कोर्ट ने सबूतों के अभाव में जयेंद्र सरस्वती को बरी कर दिया था.

2. जगद्गुरु रामभद्राचार्य

जगद्गुरु रामभद्राचार्य अपने बयानों को लेकर कई बार विवादों में आए. कुछ सामाजिक और धार्मिक बयान काफी को लेकर काफी विवाद हुआ था, लेकिन उनके खिलाफ कोई बड़ा आपराधिक मामला कभी साबित नहीं हुआ. उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों में सजा का रिकॉर्ड नहीं.

3. गुरमीत राम रहीम सिंह

डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह यौन शोषण, एक पत्रकार की हत्या का साजिश रचने के मामले में CBI विशेष अदालत पंचकूला द्वारा दोषी करार दिए गए. डेरा की साध्वियों ने पत्र लिखकर आरोप लगाए थे. पुलिस और CBI कार्रवाई जांच के बाद अदालत ने उन्हें 2017 में रेप केस में दोषी करार दिया और 20 साल की सजा सुनाई. 2019 में पत्रकार हत्या केस में भी वह दोषी साबित हुए.

4. आसाराम बापू

आसाराम बापू, नाबालिग से यौन शोषण की वजह से विवादों में आए. पीड़िता और उसके परिवार ने FIR दर्ज कराई. राजस्थान पुलिस ने गिरफ्तारी की और बाद में जोधपुर सेशन कोर्ट ने उन्हें 2018 में दोषी करार दिया और आजीवन कारावास की सजा के तहत जेल में हैं.

5. नारायण साईं

आसाराम बापू के बेटे नारायण साईं महिलाओं से यौन शोषण के आरोपों में विवादों में आए. महिला फॉलोअर्स ने पुलिस से उनके बारे में शिकायत की थी. गुजरात पुलिस ने नारायण साईं को गिरफ्तार किया. सूरत सेशन कोर्ट ने उन्हें भी 2019 में दोषी माना और वो भी उम्रकैद की सजा काट रहे है.

6. रामपाल

रामपाल विवादों में उस समय आए जब उनके आश्रम में हिंसा और अवैध हिरासत में लोगों को रखने का मामला सामने आया. उन पर हिसार सेशन कोर्ट के आदेश का पालन न करने का भी आरोप लगाया था.​ हिंसा उस समय हुई जब शिकायत मिलने पर पुलिस और प्रशासन के अफसर कार्रवाई करने के लिए उनके सतलोक आश्रम पहुंचे थे. अदालत ने उन्हें भी 2018 में हत्या सहित कई मामलों में दोषी करार दिया. वो भी जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं.

7. स्वामी नित्यानंद

स्वामी नित्यानंद पर यौन शोषण, अपहरण, अवैध गतिविधियों के आरोप लगे थे. उनके फॉलोअर्स ने पुलिस से इसकी शिकायत की थी. उनके खिलाफ कई FIR दर्ज हुए. एक मामले में तो उन पर भारत छोड़कर विदेश भागने के भी आरोप लगे. ट्रायल कोर्ट्स (कर्नाटक, गुजरात) में कई मामलों में उनके खिलाफ जांच और ट्रायल लंबित हैं.

8. राधे मां

राधे मां, दहेज उत्पीड़न से जुड़े आरोप और अश्लीलता फैलाने का आरोप लगने के बाद सुर्खियों में आई. ये आरोप परिवार के सदस्यों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा लगाए गए थे. पर्याप्त सबूत न मिलने पर अदालत द्वारा उन्हें बरी कर दिया गया.

9. निर्मल बाबा

निर्मल बाबा भी उस समय चर्चा में जब उन पर चमत्कार के नाम पर पैसे लेने के आरोप लगे. उन पर धोखाधड़ी के भी आरोप लगे, पर बड़े आपराधिक दोष सिद्ध नहीं हुए.

सत्ता का केंद्र कैसे बनी धार्मिक संस्थाएं?

अब, अहम सवाल यह है कि आस्था का केंद्र माने जाने वाले मठ, मंदिर और आश्रम अब सिर्फ धार्मिक साधना के स्थल भर नहीं रह गए. समय के साथ इन संस्थाओं का दायरा इतना बढ़ा कि ये समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति पर प्रभाव डालने वाले ताकतवर केंद्र बन गए. करोड़ों अनुयायियों का समर्थन, भारी दान-दक्षिणा और जमीन-जायदाद ने इन्हें सिर्फ आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक शक्ति का भी केंद्र बना दिया.

यही वजह है कि जब भी इन संस्थाओं से जुड़े विवाद सामने आते हैं, तो सवाल सिर्फ किसी एक व्यक्ति या आश्रम पर नहीं उठते, बल्कि पूरे सिस्टम पर उठने लगते हैं. आखिर कैसे आस्था से जुड़े ये केंद्र सत्ता के समीकरणों में फिट हो गए? और क्यों बार-बार धर्म, प्रभाव और जवाबदेही के बीच टकराव देखने को मिलता है. जानें धर्म और सत्ता को केंद्र बनने के प्रमुख कारण :

1. आस्था से सत्ता तक: कैसे बदली संस्थाओं की प्रकृति

शुरुआत में धार्मिक संस्थाओं का उद्देश्य ज्ञान, साधना और समाज सेवा था. लेकिन समय के साथ: बड़े आश्रम और मठ आर्थिक रूप से मजबूत हुए लाखों अनुयायियों का आधार बना राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव बढ़ा परिणाम: आध्यात्मिक केंद्र धीरे-धीरे “पावर सेंटर” बन गए

2. व्यक्तिपूजा का खतरा

कई संस्थाओं में गुरु को “अचूक” या “ईश्वर समान” मानने की प्रवृत्ति बढ़ी. इससे हुआ क्या? सवाल पूछने की संस्कृति खत्म, अनुयायी आलोचना से बचते हैं, गलत आचरण भी छिप सकता है-

3. जवाबदेही की कमी

धार्मिक संस्थाएं अक्सर सरकारी नियंत्रण से काफी हद तक बाहर. आंतरिक नियमों पर चलने वाली. इसलिए पारदर्शिता कम, वित्तीय और प्रशासनिक निगरानी सीमित-

4. कानून बनाम आस्था का टकराव

जब आरोप सामने आते हैं, तो अनुयायी इसे “साजिश” मान सकते हैं, जबकि कानून सबूत के आधार पर चलता है. उदाहरण: जयेंद्र सरस्वती केस में कोर्ट ने बरी किया. वहीं गुरमीत राम रहीम सिंह और आसाराम बापू जैसे मामलों में दोष सिद्ध हुआ. इससे समाज में भ्रम और ध्रुवीकरण दोनों बढ़ते हैं

5. संसाधन और शक्ति का आकर्षण

जहां: पैसा जमीन भीड़ (followers) होते हैं, वहां गलत तत्वों के प्रवेश की संभावना बढ़ जाती है. धार्मिक संस्थाएं इससे अछूती नहीं हैं.

मठ बनाने के पीछे आदि शंकराचार्य की क्या थी सोच?

भारतीय धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था में “धर्म” केवल आस्था का विषय नहीं रहा, बल्कि एक संगठित वैचारिक और सांस्कृतिक शक्ति भी रहा है इसी शक्ति को व्यवस्थित, संरक्षित और एकीकृत करने के लिए आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में एक महत्वपूर्ण संस्थागत ढांचा खड़ा किया, जो आगे चलकर हिंदू धर्म की संरचना का आधार बना. इनमें प्रमुख

भारत के चारों दिशाओं में चार मठ बनाए

दरअसल, आदि शंकराचार्य ने यह काम मठ व्यवस्था हिंदू धर्म को एकजुट करने के मकसद से किया था, जिसने सदियों तक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया. उन्होंने चार मठ बनाए. इनमें श्रृंगेरी शारदा पीठ (दक्षिण), द्वारका शारदा पीठ (पश्चिम), ज्योतिर्मठ (उत्तर) और गोवर्धन मठ पुरी (पूर्व). इन मठों का उद्देश्य था, वेदांत दर्शन (विशेषकर अद्वैत) का प्रचार. धार्मिक शिक्षा और परंपराओं का संरक्षण. पूरे भारत में सांस्कृतिक एकता स्थापित करना. यह व्यवस्था उस समय बेहद जरूरी थी, क्योंकि भारत कई छोटे-छोटे धार्मिक और दार्शनिक मतों में बंटा हुआ था.

धार्मिक संस्थाओं का विस्तार: मंदिर, आश्रम और अखाड़े

समय के साथ इन मठों के प्रभाव से मंदिरों, गुरुकुलों और आश्रमों का एक विशाल नेटवर्क विकसित हुआ. मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक केंद्र भी बने. गुरुकुल शिक्षा के केंद्र बने. अखाड़े और मठ आध्यात्मिक नेतृत्व के प्रतीक बने. इन संस्थाओं के प्रमुख शंकराचार्य, महंत, महामंडलेश्वर समाज में नैतिक मार्गदर्शक माने गए.

फिर बने सत्ता, प्रतिष्ठा और संसाधनों के केंद्र

जैसे-जैसे इन संस्थाओं का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे इनके पास जमीन-जायदाद, दान और आर्थिक संसाधन, सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ने लगा. यहीं से समस्या की शुरुआत होती है जहां “आध्यात्मिक सत्ता” धीरे-धीरे “संस्थागत शक्ति” में बदलने लगी.

4. क्यों सामने आने लगे अनैतिक आचरण के मामले?

इतिहास में समय-समय पर कुछ धार्मिक प्रमुखों पर आरोप लगे, जिनमें भ्रष्टाचार, सत्ता संघर्ष, और यौन शोषण तक शामिल रहे. इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण समझे जाते हैं.

  • धार्मिक संस्थाएं अक्सर स्वायत्त होती हैं, उन पर बाहरी निगरानी सीमित होती है.
  • गुरु या महंत को “अचूक” मानने की परंपरा ने सवाल उठाने की संस्कृति को कमजोर किया.
  • जहां शक्ति और धन होता है, वहां गलत तत्वों के प्रवेश की संभावना बढ़ जाती है.
  • कई बार समाज “धर्म” के नाम पर आरोपों को दबा देता है, जिससे जवाबदेही कम हो जाती है.

5. क्या यह पूरे संस्थागत ढांचे की विफलता है?

यह पर इस बात को समझना जरूरी है कि हिंदू धार्मिक संस्थाओं का मूल उद्देश्य ज्ञान, साधना और समाज सेवा रहा है. अधिकांश मठ और मंदिर आज भी शिक्षा, धर्म और सेवा के केंद्र हैं, लेकिन कुछ मामलों में व्यक्तियों की गलतियों ने पूरे संस्थान की छवि को प्रभावित किया.

6. कैसे मिलेगी बुराइयों से निजात?

आज के समय में मीडिया और कानून के कारण जवाबदेही बढ़ी है. कई संस्थाएं पारदर्शिता और आचार संहिता लागू कर रही हैं. समाज में भी जागरूकता बढ़ रही है. धर्म की संस्थागत शक्ति तभी टिकाऊ रहेगी. जब उसमें नैतिकता और पारदर्शिता दोनों हों.

हिंदू धर्म से जुड़े कितने दर्शन?

जब बात धार्मिक संस्थाओं के मठाधीशों की है तो यह भी जान लेना जरूरी है कि हिंदू धर्म में “दर्शन” की परंपरा बहुत समृद्ध और विविध रही है. मुख्य रूप से इन्हें दो श्रेणियों में बांटा जाता है. आस्तिक दर्शन और नास्तिक दर्शन. हिंदू धर्म में कुल 9 दर्शन हैं. इनमें छह आस्तिक और तीन नास्तिक हैं. आस्तिक दर्शन में 1. न्याय, 2. वैशेषिक, 3. सांख्य 4. योग 5. पूर्व मीमांसा 6. वेदांत दर्शन. नास्तिक दर्शन में बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन आते हैं.

दरअसल, हिंदू धर्म की विशेषता यह है कि इसमें एक ही सत्य को अलग-अलग तरीकों से समझने की स्वतंत्रता है. यही कारण है कि यहां एक नहीं, बल्कि कई दार्शनिक धाराएं साथ-साथ विकसित हुईं.

एक लाइन में हर का दर्शन समझें पूरा सार

न्याय - सोचो, वैशेषिक - दुनिया चीजो से बनी है, सांख्य - शरीर और आत्मा, योग - मन को शांत करो, मीमांसा - कर्म करो, वेदांत - सब एक है, बौद्ध - सब बदलता है, जैन - कई सच हैं और चार्वाक - जो दिखे वही सच है.

आज की जिंदगी और राजनीति में ये दर्शन कैसे दिखते हैं?

न्याय दर्शन - फैक्ट चेक वाला इंसान, वैशेषिक दर्शन - विज्ञान वाला दिमाग, सांख्य दर्शन - जागरूकता, योग दर्शन - स्ट्रेश कंट्रोल, पूर्व मीमांसा - सिस्टम और नियम, वेदांत दर्शन - आध्यात्मिक चिंतन, बौद्ध दर्शन - लेट गो माइंडसेट, जैन दर्शन - टॉलरेंस और रिस्पेक्ट, चार्वाक दर्शन - सिर्फ खुद से प्यार करो (You Only Live Once).

स्टेट मिरर स्पेशल
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