विजय की ‘महाविजय’ का मास्टरमाइंड कौन? कोचिंग में माहिर महारथी की कहानी, अब होगा धोनी से ज्यादा फेमस?
तमिलनाडु चुनाव 2026 में TVK की बढ़त के पीछे प्रशांत किशोर की रणनीति और उनकी सटीक भविष्यवाणी चर्चा में है, जानिए कैसे बनी विजय की ‘महाविजय’।
तमिलनाडु की राजनीति में 2026 का चुनाव एक बड़े उलटफेर के रूप में दर्ज होता दिख रहा है. अभिनेता से नेता बने थलापति विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम जिस तरह शुरुआती रुझानों में 105 से अधिक सीटों पर बढ़त बनाती दिखाई दे रही है. इसी के साथ विजय की इस सफलता ने तलिमनाडु की पारंपरिक राजनीति को हिलाकर रख दिया है. इस ‘महाविजय’ के पीछे जिस नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है, वह है चुनावी रणनीति के माहिर प्रशांत किशोर - जिन्हें आम तौर पर ‘पीके’ कहा जाता है. जानें उनकी जीत में पीके की क्या है भूमिका, वह कब-कब किसी नेता को व पार्टी को चुनावी जीत दिला चुके हैं.
क्या ‘पीके’ ही हैं इस जीत के मास्टरमाइंड?
राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में लंबा अनुभव रखने वाले प्रशांत किशोर ने भले ही औपचारिक रूप से कई साल पहले सक्रिय कंसल्टेंसी छोड़ दी हो, लेकिन विजय के साथ उनका जुड़ाव निर्णायक साबित होता दिख रहा है. वे आधिकारिक तौर पर “विशेष सलाहकार” की भूमिका में रहे, लेकिन उनके बयानों और रणनीतिक दिशा ने TVK के पूरे अभियान की धुरी तय की.
10 फरवरी 2025: पहली मुलाकात में क्या तय हुआ?
10 फरवरी 2025 को चेन्नई के नीलंकराई स्थित थलापति विजय के आवास पर प्रशांत किशोर की उनसे अहम मुलाकात हुई थी. यह सिर्फ एक औपचारिक मुलाकात नहीं थी, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति में नए प्रयोग की शुरुआत थी. इस मुलाकात के बाद ही संकेत मिलने लगे थे कि विजय की राजनीति पारंपरिक गठबंधन मॉडल से अलग रास्ता अपनाएगी.
26 फरवरी 2025: दोस्त, रणनीतिकार या सलाहकार?
26 फरवरी 2025 को एक कार्यक्रम में प्रशांत किशोर ने साफ किया कि उनका रिश्ता सिर्फ पेशेवर नहीं है. उन्होंने कहा कि वे विजय के “दोस्त”, “भाई” और “शुभचिंतक” के रूप में साथ हैं. यहां पर भी उनका यह बयान अहम था. उन्होंने कहा था कि विजय को रणनीति के लिए किसी सहारे की जरूरत नहीं, बल्कि वे खुद एक “नई उम्मीद” हैं.
क्या सलाह दी थी विजय को?
प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी सलाह थी- अकेले चुनाव लड़ना. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अगर TVK किसी गठबंधन में जाती है, तो उसकी पहचान कमजोर हो सकती है. उनका मानना था कि तमिलनाडु की जनता बदलाव चाहती है और यह बदलाव एक नई, स्वतंत्र ताकत के जरिए ही संभव है.
पीके की क्या थी ‘सोलो स्ट्रेटेजी’?
TVK ने 234 की 234 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. यह फैसला जोखिम भरा माना जा रहा था, खासकर तब जब DMK और AIADMK जैसे मजबूत दल मैदान में थे, लेकिन यही रणनीति TVK की सबसे बड़ी ताकत बन गई- एक स्पष्ट, बिना समझौते वाला विकल्प.
क्या थी ‘118 सीटों’ वाली भविष्यवाणी?
एक इंटरव्यू में प्रशांत किशोर से पूछा गया कि क्या TVK बहुमत का आंकड़ा (118 सीटें) पार कर सकती है? उन्होंने बिना झिझक कहा- “हां, बिल्कुल… इस वीडियो को संभालकर रखें.” यह बयान उस समय साहसिक माना गया, लेकिन आज जब तमिलनाडु विधानसभा चुनाव का नतीजा आ रहा है, तो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. इसी के साथ, पीके का उस समय को विजय की जीत का दावा दावा चर्चा के केंद्र में है.
4 मई 2026: क्यों वायरल हो रहा है पुराना वीडियो?
4 मई 2026 को जब चुनाव परिणाम आने लगे और TVK 100+ सीटों पर आगे दिखी, तो प्रशांत किशोर का वही पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. लोग इसे “सटीक भविष्यवाणी” बता रहे हैं - एक ऐसा दावा जो जमीन पर सच होता दिख रहा है.
प्रशांत किशोर का एक और वीडियो है, जिसमें वो कहते हैं कि धोनी के नाम पर कितनी चर्चा हो रही है. वो अकेले ऐसे बिहारी हैं जो तमिलनाडु में मुझसे ज़्यादा लोकप्रिय हैं. तमिलनाडु में धोनी, प्रशांत किशोर से भी ज्यादा लोकप्रिय हैं, लेकिन कोई गलतफहमी न पालें, अगले साल जब मैं अपना योगदान दूंगा और आपको (TVK) जीत दिलाने में मदद करूंगा, तब लोकप्रियता के मामले में मैं धोनी को पीछे छोड़ दूंगा. क्या आप सहमत हैं या नहीं? अगर अगले साल मैं TVK को जीतने में मदद करता हूं तो तमिलनाडु में सबसे ज्यादा लोकप्रिय कौन होगा? धोनी हर बार चेन्नई सुपर किंग्स को जीत दिलाते हैं. मुझे अपनी खुद की एक लड़ाई जीतनी है. मुझे तमिलनाडु में सबसे लोकप्रिय बिहारी बनना है.
रणनीतिक भूमिका कितनी गहरी थी?
हालांकि, प्रशांत किशोर ने बीच में बिहार चुनावों की वजह से कुछ समय के लिए दूरी बनाई, लेकिन उनकी टीम और उनके द्वारा बनाई गई संरचना TVK में बनी रही. डेटा-आधारित चुनाव प्रबंधन, जमीनी नेटवर्क और “एंटी-एस्टैब्लिशमेंट नैरेटिव”, ये तीनों तत्व उनकी रणनीति के केंद्र में रहे.
वंशवाद बनाम मेरिट: क्या था बड़ा नैरेटिव?
प्रशांत किशोर ने अपने भाषणों में वंशवादी राजनीति पर तीखा हमला किया. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर राजनीति भी क्रिकेट की तरह केवल “परिवारों” तक सीमित होती, तो सचिन तेंदुलकर, एम.एस. धोनी या विराट कोहली जैसे सितारे उभर नहीं पाते. यह संदेश युवाओं और पहली बार वोट करने वाले मतदाताओं के बीच गहराई से गया.
क्या ‘PK’ सिर्फ रणनीतिकार थे?
दिलचस्प बात यह है कि प्रशांत किशोर खुद इस भूमिका को सीमित मानते हैं. उन्होंने कहा था- “मैं विजय की मदद करने नहीं आया हूं, वे खुद सक्षम हैं.” लेकिन जमीनी हकीकत यह दिखाती है कि उनकी सलाह, दिशा और नैरेटिव बिल्डिंग ने इस जीत की नींव रखी.
क्या आगे भी साथ रहेगा ये समीकरण?
यह सवाल अभी खुला है. किशोर ने पहले ही संकेत दिए थे कि वे स्थायी तौर पर कंसल्टेंसी में वापस नहीं आना चाहते. लेकिन TVK की इस सफलता के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह साझेदारी आगे भी जारी रहती है या नहीं.
पीके ने किन नेताओं और पार्टियों को दिलाई जीत?
- प्रशांत किशोर भारत के सबसे चर्चित चुनावी रणनीतिकारों में रहे हैं, जिन्होंने अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियों के साथ काम करके कई बड़े चुनावों में अहम भूमिका निभाई. उनका सफर 2011–14 के दौर में नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के साथ शुरू हुआ, जहां उन्होंने 2014 लोकसभा चुनाव में “चाय पे चर्चा” और 3D रैलियों जैसे कैंपेन के जरिए ऐतिहासिक जीत में योगदान दिया.
- इसके बाद 2015 में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन (JD(U)) के लिए रणनीति बनाकर बिहार में सत्ता में वापसी कराई.
- 2017 में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ काम किया, जहां पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को जीत दिलाने में सफलता मिली, हालांकि उत्तर प्रदेश में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा.
- आगे 2019 में जगन मोहन रेड्डी और YSR कांग्रेस पार्टी के साथ उन्होंने आंध्र प्रदेश में भारी बहुमत की जीत दिलाई.
- 2020 में अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के साथ दिल्ली चुनाव में बड़ी जीत हासिल की.
- 2021 में उनका प्रभाव चरम पर रहा, जब ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में जीत दिलाने के साथ-साथ एम. के. स्टालिन और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम को तमिलनाडु में सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई.
- हालांकि, असम में कांग्रेस के साथ उनका प्रयास सफल नहीं रहा. बाद में उन्होंने सक्रिय राजनीति में उतरते हुए “जन सुराज” अभियान शुरू किया, लेकिन अपनी पार्टी के साथ अभी तक चुनावी सफलता हासिल नहीं कर पाए हैं.
दरअसल, तमिलनाडु की राजनीति में TVK की उभरती ताकत सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि एक नए राजनीतिक मॉडल का संकेत है. इस मॉडल में चेहरा विजय का है, लेकिन रणनीतिक सोच में प्रशांत किशोर की छाप साफ दिखती है. उनकी “अकेले लड़ो और जीतों” वाली सलाह, 118 सीटों की भविष्यवाणी और बदलते नैरेटिव ने इस ‘महाविजय’ को एक केस स्टडी बना दिया है, जहाँ राजनीति, रणनीति और टाइमिंग तीनों का अनोखा मेल देखने को मिला.




