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‘देश के गद्दारों को गोली मारो सा.... को’ कांड में बाल-बाल बचे ठाकुर और वर्मा, सुप्रीम कोर्ट का FIR दर्ज कराने से इनकार!

भाजपा के अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को साल 2020 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान की घटना से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली.

anurag thakur parvesh Verma
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anurag thakur-parvesh Verma

( Image Source:  X/ @Indian_Analyzer )

भला हो देश के कानून और सुप्रीम कोर्ट का जिसने ‘देश के गद्दों को गोली मारो सा....को’ मामले में याचिका खारिज करते हुए, मुकदमा ही दर्ज करवाने से साफ इनकार कर दिया. देश के सर्वोच्च न्यायालय के इस एतिहासिक-यादगार और आने वाली पीढ़ियों के लिए मील के पत्थर साबित होने जा रहे फैसले से भारतीय जनता पार्टी के दो-दो कद्दावर नेता कानूनी-पचड़ों में फसने से साफ-साफ बच गए हैं. बाल-बाल बेदाग ‘कोरे’ बचे नेताओं में एक पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और दूसरे दिल्ली सरकार के मौजूदा पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर प्रवेश साहिब सिंह वर्मा हैं.

हिमाचल के मूल निवासी अनुराग ठाकुर भाजपा की हुकूमत में (मोदी 2.0) में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण और युवा मामले एवं खेल मंत्री रह चुके हैं. फिलहाल देश की संसद में वे हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर लोकसभा सीट से युवा व अनुभवी सांसद हैं. दूसरे, प्रवेश साहिब सिंह वर्मा दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय साहिब सिंह वर्मा के पुत्र और नई दिल्ली विधानसभा से आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल का राजनीति राजपाट चौपट करके दिल्ली सरकार में लोक निर्माण विभाग के मौजूदा मंत्री हैं.

किस केस में मिली राहत?

जिस कानूनी पचड़े से इन दोनो कद्दावर भाजपाई नेताओं को देश के सर्वोच्च न्यायाल से ‘सुप्रीम-राहत’ नसीब हुई है वह साल 2020 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान की घटना से जुड़ा है. पूर्व में दाखिल और अब सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो चुकी याचिका के मुताबिक साल 2020 में दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार की रैली में अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा सामूहिक रुप से “देश के गद्दारों को गोली मारो...सा....” को का नारा लगा रहे थे. नारे का पहला भाग दोनों आरोपी भाजपा नेता सामूहिक रुप से बोल रहे थे. उस अधूरे नारे को पूरा करने के लिए और जिस याचिकाकर्ता ने संज्ञेय अपराध मानते हुए आपत्तिजनक बताकर, आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा कर जांच कराने की गुजारिश की थी, का दूसरा हिस्सा भीड़ नारे के रूप में बोलकर वाक्य को पूरा कर रही थी.

क्या बोली अदालत?

बात चूंकि भाजपा के दो दो कद्दावर नेताओं जिनमें एक पूर्व केंद्रीय मंत्री और दूसरा दिल्ली में भाजपा की हुकूमत में मौजूदा मंत्री हैं, के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का था. इसलिए याचिकाकर्ता भी कोई हल्का-फुल्का या मामूली नहीं था. दोनो नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की याचिका लेकर कोर्ट पहुंचने वाली हैं सीपीआई (एम) नेता वृंदा करात. सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यी पीठ ने मामले की सुनवाई की. उसके बाद फैसले में लिखा कि याचिका खारिज की जाती है क्योंकि अदालत के सामने उपलब्ध कराए गए रिकॉर्ड के मुताबिक मामला कहीं से भी “संज्ञेय” अपराध की श्रेणी में फिट नहीं बैठता है.

किसने सुनाया फैसला?

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की डबल बैंच ने सुनाया है. हालांकि यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में अपील में पहुंचा था. दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही मामले में मुकदमा दर्ज कराने की बात से इनकार कर चुकी थी. 29 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट की डबल बैंच द्वारा सुनाए गए फैसले में कहा गया कि, “बयान हिंसा भड़काने या सांप्रदायिक असंतोष पैदा करने के लिए पर्याप्त नहीं थे.”

मतलब जिस मामले को संगीन अपराध की श्रेणी में मानकर याचिकाकर्ता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक इस उम्मीद से पहुंची थीं कि, उसमें आरोपियों के खिलाफ भीड़ को उकसाने, फसाद कराने की कोशिश का मुकदमा दर्ज होगा ही. वह याचिका हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक कहीं नहीं टिक सकी. और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर व दिल्ली के मौजूदा लोक निर्माण विभाग मंत्री प्रवेश साहिब सिंह वर्मा कानूनी शिकंजे में फंसने से बाल-बाल कानूनन बच गए.

याचिकाकर्ता को क्या थी उम्मीद?

हालांकि याचिकाकर्ता को पूरी उम्मीद रही थी कि वह इस मुद्दे को अगर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ‘संज्ञेय’ अपराध की श्रेणी में मुकदमा दर्ज कराने के उद्देश्य से ले जाएंगी. उच्च अदालतों ने अगर कहीं किस्मत से याचिकाकर्ता की बात सुन ली. उच्च अदालतों ने अगर कहीं मुकदमा दर्ज करने का आदेश जारी कर दिया तो तय था कि, संज्ञेय अपराध ‘गैर-जमानती’ होता है. ऐसे मुकदमों में आरोपी या मुकदमे में दर्ज लोगों का अमूमन अधिकांश मामलों में गिरफ्तार होकर जेल में ठूंसा जाना तय ही माना जाता है. जोकि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के चलते अब आइंदा भी कदापि संभव नहीं है. क्योंकि अब जो हालिया फैसला सुनाया है वह सुप्रीम कोर्ट की डबल बैंच ने दिया है.

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