SIR पर पूर्व जजों की दो पहल: 42 की चिट्ठी और जांच के लिए बना पैनल, किसके सवाल क्या?
SIR पर 42 पूर्व जजों की चिट्ठी और पांच सदस्यीय पैनल चर्चा में हैं. जानिए दोनों पक्षों के सवाल, तर्क और चुनाव आयोग से जुड़े प्रमुख मुद्दे.
चुनाव आयोग की ओर से जारी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर देश में बहस चरम पर है. इस बीच पूर्व न्यायाधीशों की दो अलग-अलग पहल चर्चा में हैं. एक ओर 42 पूर्व जजों ने खुला पत्र जारी कर चुनाव आयोग का समर्थन किया है, तो दूसरी ओर पूर्व न्यायाधीशों का पांच सदस्यीय पैनल SIR की वैधानिकता, प्रक्रिया और मतदाताओं पर इसके प्रभाव की समीक्षा के लिए गठित किया गया है. दोनों पहलों के उद्देश्य और सवाल अलग-अलग हैं.
42 पूर्व जजों की चिट्ठी में क्या कहा गया?
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों (जैसे जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस पंकज मित्तल सहित) और विभिन्न उच्च न्यायालयों के 42 पूर्व न्यायाधीशों और सेवानिवृत्त अधिकारियों ने अक्टूबर 2026 में देश के नाम एक खुला पत्र जारी किया है. 42 जजों के समूह के प्रमुख नामों में जस्टिस हेमंत गुप्ता, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस बी.सी. पटेल, जस्टिस सुभ्रो कमल मुखर्जी, जस्टिस परमोड कोहली, जस्टिस एस.एन. ढींगरा, जस्टिस कृष्ण एस. दीक्षित और जस्टिस श्रीधर राव.
42 पूर्व न्यायाधीशों के खुले पत्र में चुनाव आयोग और संवैधानिक संस्थाओं पर लगाए जा रहे आरोपों को लेकर चिंता जताई गई है. पत्र में कहा गया कि बिना पर्याप्त सबूत के आरोप लगाने से लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है.
पूर्व न्यायाधीशों ने मतदाता सूची को सही और त्रुटिरहित बनाने की जरूरत पर जोर दिया. उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया में किसी भी तरह की शिकायत को उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत उठाया जाना चाहिए. पत्र में वोट चोरी जैसे आरोपों के लिए ठोस प्रमाण की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है.
जांच के लिए बने पैनल की अगुवाई कौन कर रहा है?
दूसरी ओर Lawyers Association for Constitution (LAFC) ने SIR की समीक्षा के लिए पांच सदस्यीय स्वतंत्र पैनल गठित किया है. इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी. लोकुर कर रहे हैं. पैनल में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस ए. के. पटनायक, जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बदर दुर्रेज अहमद और पूर्व न्यायाधीश रेखा शर्मा तथा अंजना प्रकाश शामिल हैं. इस पैनल का उद्देश्य SIR की कानूनी और संवैधानिक वैधता की समीक्षा करना तथा यह समझना है कि इस प्रक्रिया का पात्र मतदाताओं पर क्या प्रभाव पड़ रहा है.
पैनल किन सवालों की जांच करेगा?
पैनल के सामने सबसे अहम सवाल यह है कि क्या SIR की प्रक्रिया कानून और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप संचालित की जा रही है. इसके साथ ही यह भी देखा जाएगा कि पुनरीक्षण के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रह रहे हैं या नहीं और नाम हटाने की प्रक्रिया में किसी तरह की समस्या तो नहीं आ रही.
यहां पर साफ कर दूं कि पूर्व न्यायाधीशों का यह पैनल किसी अदालत या चुनाव आयोग की वैधानिक जांच समिति के समान नहीं है. इसकी समीक्षा अपने स्तर पर की जाने वाली स्वतंत्र पहल है.
दोनों पहलों में बुनियादी अंतर क्या?
42 पूर्व न्यायाधीशों की चिट्ठी का जोर चुनाव आयोग के समर्थन, संवैधानिक संस्थाओं में भरोसा बनाए रखने और आरोपों के लिए ठोस सबूत की जरूरत पर है. इसके उलट, पांच सदस्यीय पैनल का ध्यान SIR की प्रक्रिया, उसकी कानूनी वैधता और मतदाताओं पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव की समीक्षा पर है.
इसलिए दोनों पहलों को एक-दूसरे के खिलाफ दिए गए न्यायिक फैसले के रूप में देखना सही नहीं होगा. एक सार्वजनिक पत्र के माध्यम से अपनी राय रखता है, जबकि दूसरा SIR की प्रक्रिया की समीक्षा करने के लिए गठित किया गया है.
SIR पर आगे क्या होगा?
SIR को लेकर बहस अब मतदाता सूची की शुद्धता, पात्र नागरिकों के मतदान अधिकार और चुनाव आयोग की जवाबदेही जैसे मुद्दों तक पहुंच गई है. एक ओर चुनावी संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखने की बात कही जा रही है, तो दूसरी ओर पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की जांच की मांग उठ रही है.




