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हताश या आदत, संजय राउत बार-बार क्यों बकते हैं गाली, हर बार बढ़ रहा है सांसद जी का स्टैंडर्ड

शिवसेना (UBT) में टूट की आशंकाओं के बीच संजय राउत फिर विवादों में हैं. जानिए कब-कब उन्होंने विरोधियों, बागियों और नेताओं पर की तीखी व अपमानजनक टिप्पणियां.

Sanjay Raut Controversy= शिवसेना UBT Uddhav Thackeray
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शिवसेना (UBT) के संसदीय दल में टूट की आहट क्या सुनाई दी, पार्टी के सबसे मुखर नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया. जिन सांसदों को कल तक साथी, सहयोगी और पार्टी का सिपाही बताया जा रहा था, आज उन्हीं के लिए सार्वजनिक मंचों से ऐसी भाषा बोली जा रही है, जिसे सुनकर मुंबई की चॉलों में रहने वाला आम आदमी भी दो बार सोच ले. सवाल यह है कि यह राजनीतिक हताशा है, सत्ता से दूर रहने की बेचैनी है या फिर वर्षों से चली आ रही, वह आदत जो हर संकट के समय गाली में बदल जाती है?

महाराष्ट्र की राजनीति में संजय राउत को कभी तेज-तर्रार प्रवक्ता कहा जाता था. अब विरोधी उन्हें "फुल टाइम गाली विशेषज्ञ" कहकर चुटकी लेने लगे हैं. दिलचस्प, यह है कि हर नए राजनीतिक संकट के साथ उनकी शब्दावली का स्तर भी अपग्रेड होता दिख रहा है.

पार्टी टूट रही है या संयम?

18 जून यानी शुक्रवार को शिवसेना (UBT) के संसदीय दल की बैठक हुई. उम्मीद थी कि पार्टी अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करेगी, लेकिन हुआ ठीक उल्टा. नौ में से छह सांसद बैठक से दूर रहे और इसके बाद संजय राउत का गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अपने ही सांसदों के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जिसे सार्वजनिक जीवन में बोलना तो दूर, दोहराना भी मुश्किल है.

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि गाली देने के बाद उन्होंने मीडिया से कहा कि इसे काटना मत, बीप मत करना, जैसा बोला है वैसा ही चलाना. यानी बात सिर्फ गुस्से की नहीं थी, संदेश साफ था, "गाली सोच-समझकर दी गई थी और पूरे आत्मविश्वास के साथ दी गई थी."

17 जून 2026: जब अपने ही सांसद बन गए "गद्दार"

पार्टी में संभावित टूट की खबरें सामने आईं तो संजय राउत ने अपने ही सांसदों पर हमला बोल दिया. उन्होंने उन्हें "गद्दार" कहा, विश्वासघाती कहा और ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जिस पर उनके राजनीतिक विरोधी तो विरोध कर ही रहे हैं, पार्टी के अंदर भी असहजता दिखाई दे रही है. राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगा कि अगर अपने ही सांसदों के लिए ऐसी भाषा है तो विरोधियों के लिए शब्दकोश में क्या बचा होगा?

मोदी के लिए "अघोरी", गुजरात पर भी निशाना

जून 2026 में राउत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "अघोरी" बताया और कहा कि वह "औरंगजेब की धरती" से आते हैं. बयान आते ही बीजेपी हमलावर हो गई. पार्टी नेताओं ने कहा कि यह सिर्फ प्रधानमंत्री नहीं बल्कि पूरे गुजरात का अपमान है. लेकिन यह पहली बार नहीं था. राउत की राजनीति में विरोधियों पर व्यक्तिगत हमले कोई नई बात नहीं हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले यह अपवाद था, अब यह पैटर्न बन चुका है.

नवनीत राणा पर अभद्र टिप्पणी

लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान बीजेपी सांसद नवनीत राणा पर की गई टिप्पणी ने भी खूब विवाद खड़ा किया. विपक्षी दलों और महिला संगठनों ने आरोप लगाया कि राउत ने राजनीतिक आलोचना की सीमा पार कर दी है. राजनीतिक हमला करना और व्यक्तिगत स्तर पर उतर जानें में फर्क होता है. आलोचकों का कहना है कि राउत अक्सर यह फर्क भूल जाते हैं.

विजय शाह से शुरू हुआ मामला, पूरे समुदाय तक पहुंच गया

मई 2025 में मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह पर हमला बोलते-बोलते राउत "शाह" उपनाम तक पहुंच गए. बीजेपी ने आरोप लगाया कि उन्होंने एक व्यक्ति की आलोचना करते-करते पूरे समुदाय को निशाना बना दिया. यह वही दौर था, जब विरोधी पूछ रहे थे कि आखिर संजय राउत हर बहस को व्यक्तिगत और हर राजनीतिक लड़ाई को भाषाई युद्ध में क्यों बदल देते हैं?

2022: जब बागी विधायक "जिंदा लाश" बन गए

एकनाथ शिंदे की बगावत के दौरान संजय राउत की भाषा अपने चरम पर पहुंच गई थी. गुवाहाटी में ठहरे बागी विधायकों को उन्होंने "जिंदा लाश" बता दिया. कहा कि उनकी आत्मा मर चुकी है, सिर्फ शरीर बचा है. इसके बाद उन्होंने वह बयान दिया जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा.

"40 विधायक गए हैं, उनकी लाशें वापस आएंगी"

संजय राउत के इस बयान को शिंदे गुट ने इसे खुली धमकी बताया. बाद में राउत ने कहा कि यह राजनीतिक रूपक था. लेकिन तब तक बयान सुर्खियों में आ चुका था.

"गद्दार", "बैल", "रिक्शावाला" और अब...

शिंदे गुट के खिलाफ लड़ाई में राउत ने शब्दों के लगभग सारे तीर चला दिए. कभी बागियों को "गद्दार" कहा, कभी किसी विधायक को "बैल" बताया और कहा कि अब बैल बदलने का समय आ गया है. एक समय उन्होंने एकनाथ शिंदे को "रिक्शावाला" और "ऑटो वाला" कहकर भी तंज कसा था. विडंबना देखिए, जिस नेता का मजाक उड़ाया गया था, वही नेता बाद में शिवसेना (UBT) के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्मन बन गया. आज स्थिति यह है कि शिंदे सत्ता में हैं और राउत प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने ही सांसदों को कोस रहे हैं.

कंगना से भिड़े, फिर पूरा देश देखने लगा

2020 में अभिनेत्री कंगना रनौत से शुरू हुई जुबानी जंग ने संजय राउत को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया. बयान इतने तीखे थे कि मामला सिर्फ राजनीति नहीं, प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया. उस दौर में भी राउत की अभद्र भाषा पर सवाल उठे थे. लेकिन तब समर्थकों ने कहा था कि वह सिर्फ आक्रामक राजनीति कर रहे हैं. आज वही समर्थक भी चुप दिखाई दे रहे हैं.

कोविड में भी नहीं रुकी विवादित बयानबाजी

कोविड महामारी के दौरान जब पूरा देश स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा था, तब भी राउत का एक बयान विवाद में आ गया. उनके शब्दों को डॉक्टरों का अपमान बताया गया. बाद में उन्होंने सफाई दी कि निशाना WHO था, डॉक्टर नहीं. लेकिन आलोचकों का कहना था कि संजय राउत की राजनीति में पहले बयान आता है, सफाई बाद में.

खुलेआम गद्दार सांसदों को दी भद्दी गालियां

संजय राउत ने ये भी कहा कि जब खरीद-बिक्री सत्ता द्वारा नियंत्रित होती है, तो सबसे पहले खरीदे और बेचे जाने वाले आइटम विधायक और सांसद ही होते हैं. सत्ता मनुष्य को भ्रष्ट नहीं करती, परंतु यदि मूर्ख और मक्कार लोग सत्ता के पद पर आसीन हो जाएं, तो वे पूरे समाज को भ्रष्ट कर देते हैं.

सहयोगी से असहयोगी बने अपने सांसदों के लिए संजय राउत जो भाषा बोल रहे हैं, उसे खुली बदतमीजी माना जा रहा है. शिवसेना का भ्रष्टाचार ही उसके टूटने का मूल कारण है, बिल्कुल तृणमूल कांग्रेस की तरह. करोड़ों में टिकट बेचने और भ्रष्टाचारियों को संसद भेजने का यही अंजाम होता है.

अब महाराष्ट्र के ही नेता कहने लगे हैं कि गलत करने वाले लोग ही गुस्सा करते हैं. यदि आप 100 शेरों की सेना बनाते हैं और उनका सेनापति एक कुत्ता हो, तो किसी भी लड़ाई में शेर भी कुत्ते की तरह ही मरेंगे.

किरेन रिजिजू का तंज: जवाब दें तो संसद की गरिमा घट जाएगी

संजय राउत की भाषा पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सीधे टकराव से बचते हुए ऐसा जवाब दिया, जो अपने आप में बड़ा राजनीतिक संदेश था. रिजिजू ने कहा कि संसद का हर सदस्य अपने विवेक से फैसले लेता है और हर पार्टी की अपनी कार्यप्रणाली होती है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर वह संजय राउत के बयानों का जवाब देंगे तो अच्छा नहीं लगेगा. राजनीतिक जानकार इसे एक तरह का "साइलेंट डिसमिसल" मान रहे हैं, जिसमें बिना नाम लिए यह संकेत दिया गया कि सार्वजनिक जीवन में कुछ बयानों का जवाब देना भी उस बयान के स्तर तक उतरना होता है.

शायना एनसी का हमला: क्या राउत ने खो दिया है संतुलन?

महाराष्ट्र की राजनीति में राउत के बयान पर सबसे तीखा हमला शिवसेना (शिंदे गुट) की नेता शायना एनसी ने बोला. उन्होंने कहा कि राउत की भाषा और व्यवहार देखकर ऐसा लगता है कि उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है. शायना ने यहां तक कह दिया कि शायद अब उन्हें अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत है. उन्होंने आरोप लगाया कि राउत जिस तरह हिंसा, धमकी और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, वह न तो महाराष्ट्र की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है और न ही बालासाहेब ठाकरे की विरासत का. शिंदे गुट अब इस पूरे विवाद को "राजनीतिक हताशा का सार्वजनिक प्रदर्शन" बताने में जुट गया है.

प्रियंका चतुर्वेदी ने बनाई दूरी, बागियों पर भी बरसीं

इस विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि शिवसेना (UBT) के भीतर से भी राउत की भाषा को खुला समर्थन नहीं मिला. पार्टी की वरिष्ठ नेता और सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने स्पष्ट कहा कि वह इस तरह की भाषा का समर्थन नहीं करतीं. हालांकि उन्होंने बागी सांसदों पर भी निशाना साधा और कहा कि अगर जनता ने उन्हें उद्धव ठाकरे के नाम पर वोट दिया है तो उन्हें इस्तीफा देकर दोबारा जनता के बीच जाना चाहिए.

प्रियंका ने एकनाथ शिंदे के कथित "ऑपरेशन टाइगर" पर भी पलटवार किया और उसे "ऑपरेशन बिट्रेयल" करार दिया. उनका आरोप था कि यह राजनीतिक विस्तार नहीं बल्कि भरोसे और जनादेश की चोरी है. यानी पार्टी के भीतर संदेश साफ दिखा- बागियों का विरोध जारी रहेगा, लेकिन गाली की राजनीति को वैचारिक समर्थन नहीं मिलेगा.

सत्ता की भूख बनाम जनादेश की लड़ाई

भिवंडी में बोलते हुए प्रियंका चतुर्वेदी ने भाजपा और शिंदे गुट पर भी हमला बोला. उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता हासिल करने के लिए संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है और डर का माहौल बनाया जा रहा है. उनके मुताबिक यह लड़ाई केवल सांसदों की नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और जनादेश की रक्षा की भी है. UBT नेतृत्व अब टूट को राजनीतिक साजिश और सत्ता के दबाव का परिणाम बताने की रणनीति पर काम कर रहा है.

प्रेस कॉन्फ्रेंस या सियासी विस्फोट?

गुरुवार को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस सामान्य राजनीतिक ब्रीफिंग से ज्यादा एक भावनात्मक विस्फोट जैसी दिखाई दी. पार्टी छोड़ने की चर्चाओं के बीच संजय राउत ने मंच से ही बागी सांसदों के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया. जब पत्रकारों ने आपत्ति जताई तो उन्होंने न केवल अपने शब्द वापस लेने से इनकार कर दिया बल्कि मीडिया से कहा कि बयान को बिना काटे और बिना बीप किए चलाया जाए.

यानी यह कोई जुबान फिसलने का मामला नहीं था. राउत पूरी तरह जानते थे कि वह क्या कह रहे हैं और क्यों कह रहे हैं. बाद में उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि यह महाराष्ट्र की आम बोलचाल की भाषा है, लेकिन उनके विरोधियों ने इसे हताशा और राजनीतिक बौखलाहट का प्रमाण बताया.

अरविंद सावंत की मुस्कान भी बनी चर्चा का विषय

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक और दृश्य चर्चा में रहा. राउत के बगल में बैठे वरिष्ठ नेता अरविंद सावंत कई मौकों पर मुस्कुराते नजर आए. बाद में उन्होंने राउत का बचाव भी किया. इससे विपक्ष को यह आरोप लगाने का मौका मिल गया कि पार्टी के कुछ नेताओं को न सिर्फ इस भाषा से समस्या नहीं है बल्कि वे इसे राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मानते हैं.

तीन सांसदों तक सिमटी ताकत, बढ़ती जा रही बेचैनी

राजनीतिक तौर पर सबसे बड़ा झटका यह है कि जिस शिवसेना (UBT) के पास कभी महाराष्ट्र की राजनीति में निर्णायक ताकत थी, आज उसके लोकसभा सांसदों की संख्या लगातार सिमटती दिखाई दे रही है. बगावत और टूट की खबरों के बीच पार्टी की संसदीय ताकत कमजोर पड़ती जा रही है. ऐसे में विरोधी पूछ रहे हैं कि क्या राउत का गुस्सा दरअसल उन्हीं राजनीतिक सच्चाइयों का प्रतिबिंब है जिन्हें अब छिपाना मुश्किल होता जा रहा है?

सवाल सिर्फ भाषा का नहीं, नेतृत्व का भी है

पूरा विवाद अब सिर्फ गाली या बयान तक सीमित नहीं रह गया है. असली सवाल यह है कि जब पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ रहा हो, सांसद दूर जा रहे हों और संगठन दबाव में हो, तब नेतृत्व की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए? संवाद, संगठन और रणनीति या फिर सार्वजनिक मंच से अपशब्द? यही कारण है कि महाराष्ट्र की राजनीति में अब चर्चा केवल संजय राउत की जुबान की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक दिशा की भी हो रही है जिसमें शिवसेना (UBT) आगे बढ़ रही है.

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