BJP का उभार कैसे बना क्षेत्रीय दलों के लिए संकट, 12 साल में कहां से कहां आ गईं छोटी पार्टियां
बीजेपी के उभार ने क्षेत्रीय दलों की राजनीति बदल दी. लोकसभा व विधानसभा में सत्ता संतुलन बिगड़ा और कई क्षेत्रीय पार्टियां कमजोर हो गईं.
2014 के बाद भारतीय राजनीति की कहानी एक ऐसे मोड़ पर पहुंची, जहां सत्ता का केंद्र धीरे-धीरे बदलने लगा. कभी जिस राजनीति में क्षेत्रीय दल सरकारों की चाबी माने जाते थे, वहीं अब तस्वीर अलग दिखने लगी. भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र में मजबूत पकड़ बनाकर न सिर्फ चुनावी समीकरण बदले, बल्कि राज्यों की राजनीति पर भी गहरा असर डाला.
उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत तक, क्षेत्रीय दलों की पकड़ कहीं कमजोर हुई तो कहीं वे अपने ही गढ़ में सीमित होकर रह गए. समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, टीएमसी, डीएमके, आम आदमी पार्टी और अन्य दलों की राजनीति अब नए संघर्ष के दौर में दिखती है. यह कहानी सिर्फ चुनावी जीत-हार की नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में बदलते शक्ति संतुलन की भी है, जहां हर चुनाव एक नई दिशा तय करता है और पुरानी राजनीतिक परिभाषाएं धीरे-धीरे बदल रही हैं.
बीजेपी ने 2014 के बाद भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी. लोकसभा चुनाव में 2014 में 282 सीट और 2019 में 303 सीट जीतकर पार्टी ने लगातार केंद्र में मजबूत पकड़ बनाई. 2024 में भी बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी रही, लेकिन 2019 की तुलना में कमजोर हुई, पर केंद्र में सरकार बनाने में सफल हुई. इसी मजबूत केंद्रीय नेतृत्व ने क्षेत्रीय दलों की भूमिका को सीमित कर दिया. जहां पहले गठबंधन सरकारें चलती थीं, अब केंद्र में एक पार्टी का स्पष्ट प्रभुत्व दिखता है.
UP: बसपा की कमजोर होती पकड़, SP का उतार-चढ़ाव
समाजवादी पार्टी ने 2012 में विधानसभा में 224 सीट जीतकर सरकार बनाई, लेकिन 2017 में यह घटकर 47 सीट रह गई. 2022 में पार्टी 111 सीट तक पहुंची, यानी कुछ सुधार हुआ लेकिन सत्ता नहीं मिली. लोकसभा में 2014 और 2019 में केवल 5-5 सीटें मिलीं, जबकि 2024 में INDIA गठबंधन के कारण लगभग 37 सीटों तक सुधार दिखा. सपा कमजोर होकर आंशिक रूप से अपनी क्षमता बढ़ाने में कारगर साबित हुई है.
बहुजन समाज पार्टी 2012 में 80 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष थी, लेकिन 2017 में 19 सीट और 2022 में केवल 1 सीट तक सिमट गई. लोकसभा में 2014 में 0 सीट, 2019 में 10 सीट (गठबंधन),त्र और 2024 में लगभग शून्य प्रभाव रहा. वर्तमान में बसपा लगभग राजनीतिक हाशिए पर पहुंच चुकी है.
Bihar: आरजेडी की ताकत कम हुई, पर मजबूत विपक्ष
राष्ट्रीय जनता दल ने 2015 में 80 सीट जीतकर बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनने का रिकॉर्ड बनाया. 2020 में भी 75 सीटों के साथ मजबूत उपस्थिति रही. 2025 में तीसरे नंबर की पार्टी है. 2020 की तुलना में पार्टी की स्थिति बहुत कमजोर हुई. लोकसभा में 2014 में 4 सीट, 2019 में 0 सीट और 2024 में फिर लगभग 4 सीट मिलीं. आरजेडी मजबूत है लेकिन सिर्फ बिहार तक सीमित है, राष्ट्रीय विस्तार नहीं हुआ.
जहां तक नीतीश कुमार की पार्टी की बात है तो जेडीयू 2019 लोकसभा और 2020 विधानसभा चुनाव की तुलना में काफी मजबूत हुई है. लेकिन जेडीयू की हैसियत में बड़ा बदलाव यह आया है कि वो अब बिहार में बड़े भाई के बदले छोटे भाई की भूमिका में है.
Bengal: टीएमसी का अचानक गिरा ग्राफ, पार्टी में दो फाड़
तृणमूल कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव 2016 में 211 सीट और 2021 में 213 सीट जीतकर लगातार सरकार बनाई. लोकसभा में 2014 में 34 सीट, 2019 में 22 सीट और 2024 में लगभग 29 सीट हासिल हुईं, लेकिन 2026 विधानसभा चुनाव में पार्टी 213 से सीधे 80 सीटों पर सिमट गई. वो भी बीजेपी के सामने. नतीजा यह निकला कि बंगाल में बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब हुई. मामला इतना ही नहीं है. अब पार्टी में दो गुटों में बट गई है.
80 में से 58 विधायक के साथ ऋतब्रत बनर्जी अपना अलग गुट बना लिया है. विधानसभा स्पीकर ने उन्हें विपक्ष का नेता भी घोषित कर दिया है. यानी टीएमसी पार्टी के इतिहास में सबसे बुरे दौर में है.
पंजाब: मजबूत AAP, कमजोर राष्ट्रीय विस्तार
आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में 2015 में 67 सीट और 2020 में 62 सीट जीतकर भारी जीत दर्ज की. पंजाब में 2022 में 92 सीटों के साथ सरकार बनाई. लेकिन लोकसभा में 2014 में 4 सीट, 2019 में 1 सीट और 2024 में केवल 3 सीट तक सीमित रही. पार्टी के कई शीर्ष नेता भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे हैं. अरविंद केजरीवाल पार्टी को और मजबूत बनाने के लिए चुपचाप कोकोशिश में जुटे हैं.
पंजाब: अपने ही घर अकाली दल 'पिद्दी' SAD
शिरोमणि अकाली दल 2012 में 68 सीटों के साथ सरकार में थी, लेकिन 2017 में 15 सीट और 2022 में केवल 3 सीट रह गई. लोकसभा में भी 2014 में 4 सीट, 2019 में 2 सीट और 2024 में 1 सीट तक गिरावट आई.
विधानसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बहुत खराब है. अकाली दल का जनाधार लगभग खत्म हो चुका है. बीजेपी से गठबंधन तोड़ना पार्टी के लिए अभी तक नुकसानदेह साबित हुई है.
Odisha: बीजेडी की कमजोर होती पकड़, गिरता जनाधार
बीजू जनता दल ने 2014 में 117 सीट, 2019 में 112 सीट जीतकर मजबूत स्थिति बनाए रखी, लेकिन 2024 में यह घटकर लगभग 51 सीट रह गई. लोकसभा में भी 20 सीट (2014) से गिरकर 8 सीट (2024) तक पहुंची.
वहीं, बीजेपी ने नवीन पटनायक को सत्ता से बाहर कर खुद की सरकार बनाने में कामयाब हुई. फिलहाल BJD की स्थिति बहुत कमजोर है.
तमिलनाडु: डीएमके की पकड़ हुई कमजोर
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने 2021 में 133 सीट जीतकर सरकार बनाई. लोकसभा में 2019 में 23 सीट और 2024 में लगभग 22 सीट हासिल कीं. विधानसभा चुनाव में नई नवेली पार्टी टीवीके ने उसे पटखनी देकर सरकार बनाने में सफल हुई. DMK को इस बार 234 में से सिर्फ 59 सीटों पर संतोष करना पड़ा.
महाराष्ट्र: शिवसेना और NCP का बिखराव जारी
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी दोनों ही 2014 और 2019 में मजबूत स्थिति में थे, लेकिन बाद में टूट गए. लोकसभा और विधानसभा दोनों में विभाजन के बाद उनकी सीटें और प्रभाव घट गया. बीजेपी ने इस टूट का फायदा उठाकर राज्य में मजबूत स्थिति बना ली. दोनों पार्टियां कमजोर और विभाजित हो चुकी हैं. खासकर शिवसेना को शिंदे ने तो एनसीपी शरद पवार को पहले अजित पवार और अब सुनेत्रा पवान ने रसातल में पहुंचा दिया है.
12 साल का राजनीतिक बदलाव
2014 के बाद भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव आया है. बीजेपी के उभार के साथ कई क्षेत्रीय दल कमजोर हुए हैं. बसपा, अकाली दल और आंशिक रूप से BJD कमजोर हुए. जबकि SP और RJD सीमित रूप से बचे हैं. दूसरी तरफ TMC और DMK जैसे दल अभी भी मजबूत हैं लेकिन दबाव में हैं.कहने का मतलब यह है कि क्षेत्रीय दल अब “सत्ता निर्माता” से बदलकर कई राज्यों में “सत्ता रक्षक” बनते जा रहे हैं.




