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और भी हैं Harish Rana ! इच्छामृत्यु के लिए कोई 30 तो कोई 5 साल से रहे जूझ- चार कहानी चौंकाने और रुलाने वाली

कहीं कोमा में डॉक्टर बेटा है तो कहीं ब्रेन-डेड बेटी, कहीं पूर्व टीचर को लड़नी पड़ रही जंग तो कहीं गंभीर बीमारी से जूझते बच्चे ... कर्नाटक से लेकर केरल तक, देश में इच्छामृत्यु की बहस तेज हो गई है. आइए आपको 4 सच्ची कहानियों के बारे में बताते हैं...

passive euthanasia emotional stories
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इच्छामृत्यु की बहस को बयां करती 4 सच्ची कहानियां

( Image Source:  Sora_ AI )

मौत भी नहीं आती कि आ जाए... अक्सर हमें लोगों के मुंह से ये बातें सुनने को मिलती हैं. ये वे लोग होते हैं, जो अपनी जिंदगी से निराश हो चुके होते हैं. कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो इच्छामृत्यु के लिए कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक देते हैं. हरीश राणा केस से इच्छामृत्यु यानी Euthanasia को लेकर बहस फिर से तेज हो गई है.

भारत में इच्छामृत्यु पर बहस कई सालों से चल रही है. अदालतों ने कुछ शर्तों के साथ Passive Euthanasia की अनुमति दी है, लेकिन जमीन पर हालात अब भी बेहद जटिल हैं. देश के अलग-अलग राज्यों से सामने आई कुछ सच्ची कहानियां बताती हैं कि गंभीर बीमारी, कोमा या असहनीय दर्द से जूझ रहे लोगों और उनके परिवारों के लिए यह मुद्दा कितना संवेदनशील और कठिन है.

हरीश राणा: 2013 से कोमा में

सबसे पहले जानते हैं हरीश राणा के बारे में... 31 साल के हरीश उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के रहने वाले हैं. वे 2013 से कोमा में हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को परिवार की याचिका पर जीवन रक्षक प्रणालियां हटाने की अनुमति दी. हरीश 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए, जिससे उनके दिमाग में गंभीर चोट आ गई और वे कोमा में चले गए. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथ की पीठ ने मानवीय आधार पर उन्हें पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) की अनुमति दी. पैसिव यूथेनेशिया में मरीज का लाइफ सपोर्ट सिस्टम यानी कृत्रिम जीवन रक्षण उपकरण हटा लिए जाते हैं, ताकि मरीज की मौत हो जाए. आइए, देश में इच्छामृत्यु की बहस को तेज करती 4 सच्ची कहानियों के बारे में जानते हैं...

1- कर्नाटक में 30 साल से लड़ाई लड़ रहीं पूर्व टीचर

कर्नाटक के दावणगेरे की 86 वर्षीय पूर्व टीचर एच.वी. करिबासम्मा पिछले तीन दशक से इच्छामृत्यु के लिए लड़ रही हैं. 1996 में उन्हें स्लिप डिस्क की असहनीय पीड़ा हुई. इसके बाद उन्होंने 1998 में Karnataka High Court में याचिका दाखिल की और इस मुद्दे को कानूनी रूप दिया. आज करिबासम्मा कैंसर से जूझ रही हैं और एक ओल्ड एज होम में रहती हैं. उनका कहना है कि सरकारी अस्पतालों में पैसिव यूथेनेशिया के लिए स्पष्ट व्यवस्था और पारदर्शी प्रक्रिया होनी चाहिए ताकि गरीब मरीजों को भी सम्मानजनक विकल्प मिल सके.

2- मध्य प्रदेश में 5 साल से कोमा में हैं हरीश गोले

मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के होम्योपैथिक डॉक्टर हरीश गोले पिछले 5 वर्षों से कोमा में हैं. 2 मार्च 2021 को क्लिनिक जाते समय सड़क दुर्घटना में उनके सिर और रीढ़ में गंभीर चोट आई. लंबा इलाज और सर्जरी के बावजूद उन्हें होश नहीं आया. अब उनके बुजुर्ग माता-पिता ही उनकी देखभाल कर रहे हैं. ट्यूब के जरिए खाना और दवाएं दी जाती हैं. रोज उन्हें करवट दिलाना, मालिश करना और साफ-सफाई करना माता-पिता की जिम्मेदारी है. इलाज और घर के खर्चों की वजह से परिवार पर करीब 20 लाख रुपये का कर्ज हो चुका है.

3- महाराष्ट्र में 4 साल से बिस्तर पर है श्रेया

महाराष्ट्र के गडचिरोली की 28 वर्षीय श्रेया सोटंके डॉक्टर बनने का सपना देखती थीं. उन्होंने मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया और पढ़ाई में भी टॉप किया था, लेकिन फरवरी 2022 में एक सड़क हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी. हादसे में उनके मस्तिष्क को गंभीर चोट लगी और तब से वह बिस्तर पर हैं. डॉक्टरों ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित किया था, लेकिन परिवार को अब भी उम्मीद है कि वह ठीक हो सकती हैं. इसी वजह से परिवार ने कभी इच्छामृत्यु की मांग नहीं की.

4- केरल में अनोखी बीमारी से जूझ रहे बच्चे

केरल के कोट्टायम जिले में रहने वाले एक दंपती के दो बच्चे अनोखी बीमारी से पीड़ित हैं. बच्चों को लगातार दवाओं और निगरानी की जरूरत होती है. इनमें से एक बच्चे को गंभीर ऑटिज्म भी है. बच्चों की देखभाल के कारण माता-पिता को नौकरी छोड़नी पड़ी, जिससे आय कम हो गई और इलाज का खर्च बढ़ता गया. परिवार को अपनी संपत्ति बेचनी पड़ी, घर गिरवी रखना पड़ा और कर्ज लेना पड़ा. 2024 में इस दंपती ने Supreme Court of India में पूरे परिवार के लिए मर्सी किलिंग की अनुमति मांगने की बात कही थी. इसके बाद प्रशासन ने कुछ आर्थिक मदद भी दी.

इच्छामृत्यु पर बहस क्यों बढ़ रही है?

इन घटनाओं से साफ है कि गंभीर बीमारियों और लंबे इलाज के मामलों में परिवारों को मानसिक और आर्थिक दोनों तरह का भारी दबाव झेलना पड़ता है. भारत में इच्छामृत्यु पर कानून बेहद सख्त है और इसे लागू करने की प्रक्रिया भी जटिल है. इसलिए कई परिवार अदालतों का दरवाजा खटखटाने को मजबूर हो जाते हैं.

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