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13 साल से अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े थे हरीश राणा, अब SC ने दी इच्छामृत्यु की इजाजत! भारत में क्या है कानून- केस की ABCD

गाजियाबाद के हरीश राणा पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े थे और उनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बची थी. इस बीच उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में उन्हें इच्छामृत्यु देने की अनुमति मांगी थी. अब सुप्रीम कोर्ट ने एम्स की मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी है.

13 साल से अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े थे हरीश राणा, अब SC ने दी इच्छामृत्यु की इजाजत! भारत में क्या है कानून- केस की ABCD
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( Image Source:  X- @awais__usmani )
समी सिद्दीकी
Edited By: समी सिद्दीकी8 Mins Read

Updated on: 11 March 2026 1:05 PM IST

Harish Rana Case Detail: गाजियाबाद के हरीश राणा की कहानी एक ऐसे परिवार की पीड़ा को सामने लाती है, जो पिछले 13 साल से उम्मीद और बेबसी के बीच जी रहा था. इंजीनियर बनने का सपना लेकर घर से निकले हरीश की जिंदगी एक हादसे के बाद बिस्तर तक सीमित हो गई. अब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है.

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के वी विश्वनाथन की बेंच ने यह फैसला सुनाया. इससे पहले अदालत ने दिल्ली के एम्स से हरीश की मेडिकल रिपोर्ट मंगवाई थी. एम्स ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा था कि हरीश के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है. इस रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने उन्हें पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी गई है.

हरीश राणा के माता पिता ने क्या कहा?

हरीश राणा के माता-पिता ने ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु की मांग की थी. उनका कहना था कि उनका बेटा पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़ा है और उसके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बची है.

पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हरीश के परिवार से बातचीत भी की थी. उस समय जस्टिस जेबी पारदीवाला ने कहा था कि यह बेहद दुखद रिपोर्ट है और ऐसे मामलों में फैसला लेना बहुत कठिन होता है. उन्होंने कहा था कि हम इस लड़के को इस तरह अपार दुख में नहीं रख सकते और अब हम उस स्थिति में हैं जहां अंतिम फैसला करना जरूरी हो गया है.

क्या है हरीश राणा का पूरा मामला?

हरीश राणा की जिंदगी 2013 में हुए एक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई थी. उस समय वह इंजीनियर बनने का सपना लेकर चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे थे. पढ़ाई के दौरान वह मोहाली में एक पीजी में रहते थे. पीजी में उनका कमरा चौथी मंजिल पर था.

एक दिन कॉलेज से लौटने के बाद हरीश अपने पीजी की बालकनी में खड़े थे और अचानक वह चौथी मंजिल से नीचे गिर गए. उन्हें तुरंत चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल ले जाया गया. उनके सिर में गंभीर चोट आई थी. सांसें चल रही थीं, लेकिन वह होश में नहीं आए.

क्या परिवार ने दर्ज कराया था केस?

चूंकि मामला एक हादसे का था, इसलिए मोहाली पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की थी. उस समय हरीश के परिवार ने आरोप लगाया था कि कुछ लड़कों ने उन्हें जानबूझकर बालकनी से नीचे गिराया था.

परिवार ने कहां-कहां कराया इलाज?

पीजीआई चंडीगढ़ में इलाज के बावजूद उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. इसके बाद परिवार उन्हें दिल्ली के एम्स ले आया. यहां भी लंबे समय तक उनका इलाज चला, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ. इसके बाद उन्हें राम मनोहर लोहिया अस्पताल, लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल और फिर फोर्टिस अस्पताल में भर्ती कराया गया. लेकिन हर जगह डॉक्टरों ने जवाब दे दिया.

क्या करते हैं हरीश के पिता?

इलाज के इस लंबे दौर ने परिवार की आर्थिक स्थिति भी कमजोर कर दी. हरीश के पिता अशोक राणा एक कैटरिंग सर्विस कंपनी में नौकरी करते थे. उनकी आय सीमित थी, लेकिन उन्होंने बेटे के इलाज के लिए अपना सबकुछ लगा दिया. यहां तक कि दिल्ली का अपना घर भी बेच दिया.

जब इलाज से कोई फायदा नहीं हुआ तो परिवार हरीश को घर ले आया. उनकी देखभाल के लिए एक नर्स रखी गई, लेकिन उसका खर्च भी बहुत ज्यादा था. अशोक राणा की मासिक आय करीब 28 हजार रुपये थी, जिसमें से 27 हजार रुपये नर्स को देने पड़ते थे.

कुछ समय बाद अशोक राणा नौकरी से रिटायर हो गए. छोटे बेटे की भी तब तक नौकरी नहीं लगी थी. मजबूरी में नर्स को हटाना पड़ा और हरीश की देखभाल खुद माता-पिता करने लगे.

घर का खर्च चलाने के लिए अशोक राणा ने सैंडविच और स्प्राउट बेचने का काम शुरू किया. घर के पास एक मैदान में हर शनिवार और रविवार को बच्चे खेलने आते थे. शुरुआत में वह घर में सैंडविच और स्प्राउट बनाकर मैदान में ले जाते और बच्चों को बेचते थे. इससे घर का कुछ खर्च निकल जाता था. उन्हें पेंशन के रूप में केवल तीन हजार रुपये मिलते थे.

समय बीतता गया, लेकिन हरीश की हालत में कोई बदलाव नहीं आया. वह लगातार बिस्तर पर पड़े रहे. उनके शरीर में घाव भी हो गए थे. बिस्तर के पास एक यूरिन बैग और एक फूड पाइप लगा रहता था. उसी पाइप के जरिए उनकी मां उन्हें खाना देती थीं.

साल दर साल गुजरते रहे, लेकिन हरीश ने इस दौरान एक करवट तक नहीं बदली. उनका शरीर कमजोर होकर लगभग कंकाल जैसा हो गया था, लेकिन उनकी सांसें चलती रहीं.

मां ने कैसे लिया सख्त फैसला?

करीब दस साल बीतने के बाद एक दिन हरीश की मां ने एक बेहद कठिन फैसला लिया. उन्होंने अपने बेटे के लिए मौत की दुआ मांगनी शुरू कर दी. जो मां पहले हर दिन अपने बेटे की जिंदगी के लिए प्रार्थना करती थी, वही अब उसके लिए मुक्ति की कामना करने लगी.

जब दवा और दुआ दोनों बेअसर हो गईं, तो परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया. हरीश के परिवार ने अदालत से कहा कि अगर डॉक्टरों की राय में उसके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है, तो उसे इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए. इसी मांग के साथ परिवार ने अदालत में याचिका दायर की और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुना दिया.

क्या होती है इच्छामृत्यु?

जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक गंभीर पीड़ा या कष्ट से गुजर रहा होता है, तो ऐसे में उसका परिवार इच्छामृत्यु की मांग कर सकता है. किसी व्यक्ति को उसके दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए जानबूझकर उसके जीवन को समाप्त करने की प्रक्रिया को इच्छामृत्यु कहा जाता है.

इसमें अक्सर मरीज का इलाज बंद कर दिया जाता है, जिसके बाद उसकी मौत हो जाती है. कई जगह जहर का इंजेक्शन देकर भी ऐसा किया जाता हैय. भारत में इच्छामृत्यु को पूरी तरह कानूनी मान्यता नहीं दी गई है. इसे लेकर सख्त गाइडलाइन बनाई गई हैं और इसकी अनुमति मिलना आसान नहीं होता.

भारत में क्या है कानून?

इच्छामृत्यु का मामला पहली बार सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुंचा है. इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट ने इन पर फैसले दिए हैं. अरुणा शानबाग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर इच्छामृत्यु देने से इनकार कर दिया था, लेकिन उस मामले में यह साफ किया गया था कि रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मामलों में इच्छामृत्यु दी जा सकती है.

इसके लिए गाइडलाइन भी बनाई गई थीं. इनमें कहा गया था कि आर्टिकल 226 के तहत हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की जा सकती है. अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक कोमा जैसी स्थिति में हो और लाइफ सपोर्ट के सहारे जिंदा हो, तो ऐसे मामलों में तीन डॉक्टरों की कमेटी एक रिपोर्ट तैयार कर सकती है. इसके बाद हाईकोर्ट यह फैसला ले सकता है कि किसी व्यक्ति को पैसिव यूथेनेशिया दिया जाए या नहीं, अगर एचसी इसमें फैसला नहीं सुनाता है तो पिटीशनर सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है.

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