राजनीति में भक्ति या नायक-पूजा तानाशाही की ओर ले जाती है! क्या संविधान सभा में आंबेडकर की चेतावनी को भूल गए आज के नेता और अधिकारी?
नासिक में गणतंत्र दिवस पर हुआ विवाद केवल आंबेडकर के नाम के उल्लेख का नहीं, बल्कि उस खतरनाक प्रवृत्ति का संकेत है जहां सरकारी अधिकारी ऑन-ड्यूटी वैचारिक पहरेदार बन रहे हैं और राजनीतिक दल इसे प्रोत्साहित कर रहे हैं. यूपी में अलंकार अग्निहोत्री और प्रशांत कुमार सिंह का इस्तीफा इसी की अगली कड़ी है.
आंबेडकर के नाम पर अराजकता? गणतंत्र दिवस पर नासिक में ऑन-ड्यूटी अफसर का मंत्री से टकराव
Nashik Republic Day Controversy: महाराष्ट्र के नासिक में गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान राज्य मंत्री गिरीश महाजन ने राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद आधिकारिक भाषण दिया. इस भाषण में डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम नहीं लिया गया. इसी बात को आधार बनाकर वन विभाग की कर्मचारी माधवी जाधव ने मंच के सामने ही भाषण को बीच में रोक दिया और मंत्री से जवाब मांग लिया. पुलिस ने हस्तक्षेप किया, कर्मचारी को कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया और मंत्री ने बाद में स्पष्टीकरण देते हुए माफी भी मांगी. एक स्वस्थ लोकतंत्र में मामला यहीं खत्म हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
घटना को तुरंत 'आंबेडकर का अपमान' बताकर राजनीतिक विवाद में बदल दिया गया. FIR की मांग हुई, मंत्री को हटाने की बातें शुरू हुईं और सोशल मीडिया पर यह नैरेटिव गढ़ा गया कि आंबेडकर को 'जानबूझकर मिटाया गया'. यह शायद भारत के इतिहास में पहली बार है जब किसी नेता पर किसी बात को न कहने के लिए अपमान का आरोप लगाया गया. यह बदलाव बेहद खतरनाक है. यह उस खतरनाक वैचारिक बदलाव की ओर इशारा करती है, जहां सरकारी कर्मचारी खुद को संविधान के निष्पक्ष सेवक की बजाय वैचारिक पहरेदार समझने लगे हैं.
अब तो हर नेता आरोपी बनाया जा सकता है
किसी भी कानून, संविधान या परंपरा में यह अनिवार्य नहीं है कि हर गणतंत्र दिवस भाषण में डॉ. आंबेडकर का नाम लिया ही जाए. भाषण कोई एफिडेविट नहीं होता. उसमें विषय, संदर्भ और प्राथमिकता होती है. संविधान निर्माण सामूहिक प्रयास था, न कि एक व्यक्ति का एकल कार्य. अगर 'नाम न लेना या उल्लेख न करना' ही अपराध बन जाएगा, तो हर भाषण बाधित किया जा सकता है, हर नेता आरोपी बनाया जा सकता है और हर चुप्पी को साजिश बताया जा सकता है. यह लोकतंत्र नहीं, स्थायी अराजकता का रास्ता है.
ऑन-ड्यूटी अधिकारी का ‘एक्टिविज़्म’
इस मामले की सबसे गंभीर बात यह है कि माधवी जाधव कोई आम नागरिक नहीं थीं. वह एक सरकारी कर्मचारी थीं, ड्यूटी पर, एक संवैधानिक कार्यक्रम में... सरकारी सेवा नियम स्पष्ट हैं कि अधिकारी को राजनीतिक रूप से तटस्थ रहना होता है. मंच से टकराव या सार्वजनिक विरोध अनुशासनहीनता है. यह लोकतांत्रिक विरोध नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुशासन का उल्लंघन था. इसके बावजूद, जब मंत्री ने माफी मांगी, तब भी कर्मचारी ने FIR की मांग जारी रखी. इससे संदेह और गहराता है कि यह मामला संवैधानिक मूल्यों से अधिक राजनीतिक मुद्रा भुनाने का प्रयास था.
राजनीतिक समर्थन और संस्थागत क्षरण
और भी चिंताजनक यह रहा कि इस कृत्य को राजनीतिक समर्थन मिला. कांग्रेस सांसद वर्षा गायकवाड़ ने इसे 'हर स्वाभिमानी मराठी की आवाज' बताया. कांग्रेस नेता शमा मोहम्मद ने कर्मचारी को 'बहादुर' बताते हुए मंत्री को हटाने की मांग की. सोशल मीडिया पर कांग्रेस समर्थक हैंडल्स ने अधिकारी को नायक बना दिया. जब राजनीतिक दल ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों की अनुशासनहीनता का महिमामंडन करते हैं, तो संदेश साफ होता है कि वैचारिक टकराव को इनाम मिलेगा, तटस्थता को सजा... यहीं से संस्थाएं कमजोर होती हैं.
आंबेडकर: सम्मान से आगे, अब ‘अनिवार्यता’?
इस पूरे विवाद का एक और गंभीर पहलू है- डॉ. आंबेडकर को एक ऐसे पवित्र प्रतीक में बदल देना, जिनका नाम लेना अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य कर दिया गया है. यह विडंबना है, क्योंकि खुद आंबेडकर ने संविधान सभा में चेतावनी दी थी, “राजनीति में भक्ति या नायक-पूजा अंततः तानाशाही की ओर ले जाती है.” आज उन्हीं के नाम पर आलोचना असंभव हो रही है. संदर्भहीन अनिवार्यता थोपी जा रही है और न कहने को भी ‘ईशनिंदा’ बना दिया गया है.
यह श्रद्धा नहीं, राजनीतिक उपयोग है. साथ ही, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सीधा असर है. भारतीय संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है- मंत्रियों को भी. डॉ. आंबेडकर का उल्लेख न करना न अपराध है,न अनुशासनहीनता और न संविधान का उल्लंघन. अगर भाषणों पर वैचारिक स्क्रिप्ट थोप दी गई, तो लोकतंत्र नहीं बचेगा- केवल डर और बाधा रह जाएगी.
बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा
ऐसा ही मामला उत्तर प्रदेश से भी सामने आया, जहां बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने यूजीसी के नए नियमों और शंकराचार्य अग्निहोत्री के साथ हुए दुर्व्यवहार के विरोध में इस्तीफा दे दिया. उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए सरकार पर जमकर हमला बोला. उन्होंने अपने इस्तीफे को सरकारी नीतियों के खिलाफ राजनीतिक विरोध के रूप में पेश किया.
वहीं, अयोध्या के जीएसटी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने भी सरकार के समर्थन और शंकराचार्य के विरोध में इस्तीफा दे दिया. प्रशांत कुमार सिंह ने कहा, "सरकार के समर्थन में और शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का विरोध करने के लिए मैंने इस्तीफा दिया है। पिछले 2 दिनों से मैं हमारे CM और PM पर उनके बेबुनियाद आरोपों से बहुत दुखी था... जिस सरकार से मुझे सैलरी मिलती है, उसके प्रति मेरी कुछ नैतिक जिम्मेदारियां हैं... जब मैंने देखा कि मेरे CM और PM का अपमान किया जा रहा है, तो मैंने अपना इस्तीफा गवर्नर को भेज दिया."
कंगना रनौत पर सीएसएफ अधिकारी ने एयरपोर्ट पर किया हमला
इससे पहले, बॉलीवुड एक्ट्रेस और बीजेपी सांसद कंगना रनौत पर 2024 में सीआईएसएफ अधिकारी कुलविंदर कौर ने एयरपोर्ट पर थप्पड़ मार दिया. कौर ने बताया कि वह कंगना की किसानों पर की गई टिप्पणी से नाराज थीं. कौर को बाद में सस्पेंड कर दिया गया और उनका ट्रांसफर कर दिया गया, लेकिन इस घटना की निंदा नहीं हुई. संगीतकार विशाल ददलानी ने कौर को नौकरी देने की पेशकश भी की.
इन सब घटनाओं से यह संदेश जाता है कि अगर सरकारी अधिकारी अगर राजनीतिक लाभ के लिए वैचारिक हिंसा करते हैं तो वह स्वीकार है. अधिकारी को साहसी के रूप में दिखाया और बताया जा रहा है. मंत्री, कंगना और बीजेपी सरकार को इसलिए निशाना बनाया गया, क्योंकि वे सत्ता पक्ष से हैं. अगर हर अधिकारी ड्यूटी के दौरान इस्तीफा देने और मारपीट पर उतारू हो जाए तो शासन व्यवस्था ठप हो जाएगी.





