Begin typing your search...

UGC Protest: किस रिपोर्ट के आधार पर लाए गए यूजीसी के नए नियम, जिनपर मचा है हंगामा?

UGC Protest News: यूजीसी ने Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026 लागू किए, जिनके पीछे भेदभाव शिकायतों में वृद्धि और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों जैसे कारण बताये गए हैं. इन नियमों पर देशभर में विरोध और विवाद जारी है.

UGC Protest: किस रिपोर्ट के आधार पर लाए गए यूजीसी के नए नियम, जिनपर मचा है हंगामा?
X
( Image Source:  ani )

UGC Protest Kya Hai : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 लागू किए, जिसका लक्ष्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव (caste discrimination) और अन्य प्रकार के भेदभाव को रोकना है. UGC के मुताबिक, पिछले वर्षों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में भारी वृद्धि हुई है, इसलिए नए नियम तैयार किए गए. इसके पीछे देश में कुछ बड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को भी ध्यान में रखा गया है, लेकिन लागू होते ही इन नियमों ने सामान्य/सवर्ण वर्ग के छात्रों, शिक्षकों और समाज के अन्य वर्गों में भारी विरोध और विवाद खड़ा कर दिया है.

किस रिपोर्ट के आधार पर बने नियम?

  • UGC ने कहा है कि 2020 से 2025 के बीच उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतें लगभग 100% से अधिक बढ़ी हैं. यही डेटा और रिपोर्ट UGC की ओर से नियम बनाने का प्रमुख आधार बताया गया.
  • कुछ हाई-प्रोफाइल मामलों जैसे रोहित वेमुला (2016) और डॉ. पायल तड़वी (2019) के बारे में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को भी नियमों की पृष्ठभूमि में माना जा रहा है. इन मामलों में जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव की चिंताओं को कोर्ट ने गंभीरता से उठाया था.
  • Promotion of Equity Regulations 2026 ने 2012 के पुराने Anti-Discrimination Framework को बदल दिया है, ताकि भेदभाव को रोकने के जरिए अधिक प्रभावी विनियम लागू किए जा सकें.

पेंडिंग मामलों में उछाल

जहां 2019–20 के 18 केस पेंडिंग पड़े हैं. वहीं 2023–24 में पेंडिंग केस बढ़कर 108 तक पहुंच गई. हालांकि, UGC का दावा है कि 90% से ज्यादा शिकायतों का निपटारा किया गया. फिर भी लंबित मामलों की संख्या चिंता का कारण बनी.

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां

  • सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतों से संबंधित कई मामले सामने आने के बाद रोहित वेमुला केस (2016), डॉ. पायल तड़वी केस (2019)
  • इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने कैंपस में जातिगत उत्पीड़न और संस्थागत लापरवाही पर कड़ी टिप्पणियां की थी.
  • UGC का कहना है कि इन्हीं टिप्पणियों ने नए नियमों की जरूरत को और मजबूत किया.

क्यों बनाए गए नियम

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें जातिगत भेदभाव के आंकड़े दिए गए थे. रिपोर्ट के मुताबिक हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें 2017-18 में 173 थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं यानी 5 साल में इसमें 118.4% की बढ़ोतरी हुई. ये आंकड़े UGC के अपने डेटा से हैं, जो पार्लियामेंट कमिटी और सुप्रीम कोर्ट को दिए गए. शिकायतों में 90% से ज्यादा का निपटारा हुआ, लेकिन पेंडिंग केस भी बढ़े.2019-20 में 18 से 2023-24 में 108 केस सामने आए.

यूजीसी ने सरकारी रिपोर्ट का हवाला देते हुए अदालत को बताया था कि पिछले 5 वर्षों (2020–2025) में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में लगभग 100% से 118% तक वृद्धि हुई है. इसी बढ़ती समस्या को देखते हुए हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में Equity Committee, Equity Squad, 24×7 हेल्पलाइन और समानता केंद्र जैसी व्यवस्थाएं लागू करने का निर्णय लिया गया.

रिपोर्ट में क्या है?

  • रिपोर्ट में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में भारी वृद्धि दर्ज हुई.
  • रिपोर्ट के आधार पर यूजीसी ने नए Equity Regulations 2026 बनाए हैं.
  • इसका उद्देश्य भेदभाव को रोकना और सुरक्षा/समान अवसर सुनिश्चित करना बताया गया.

हंगामा क्यों?

  • सामान्य (सवर्ण) वर्ग के छात्रों, शिक्षकों और समाज के लोगों का कहना है कि नियम सामान्य वर्ग को पीड़ित नहीं मानते, जिससे वे ‘डिफॉल्ट अपराधी’ की तरह पेश हो सकते हैं. इसके विरोध में सोशल मीडिया पर #UGCRollback जैसे हैशटैग ट्रेंड हैं.
  • प्रारंभिक ड्राफ्ट में झूठी/दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर सजा का प्रावधान था, लेकिन अंतिम नियम में यह हटाया गया. विरोध करने वाले कहते हैं कि इससे नियम का दुरुपयोग हो सकता है.
  • हर कॉलेज/यूनिवर्सिटी में Equity Committee, Equity Squad, Equal Opportunity Centre और 24×7 हेल्पलाइन बनाना अनिवार्य है.
  • नए नियमों का विरोध इसलिए हो रहा है कि सवर्ण छात्रों के खिलाफ Campus Surveillance जैसा अधिकार दिया गया है.
  • नियम के Section 3(C) को सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया है क्योंकि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है.
  • कई राजनीतिक और सामाजिक समूहों ने इसे भेदभाव और विभाजनकारी नीति बताया है. कुछ ने इसे ‘काला कानून’ तक कहा और इस पर इस्तीफे और विरोध प्रदर्शन हुए हैं.
UGCIndia NewsIndia
अगला लेख