ममता बनर्जी की TMC ही नहीं, कांग्रेस में भी हो चुकी है टूट, इंदिरा गांधी के खिलाफ खड़े हो गए थे ओल्ड गार्ड, किसके हिस्से आया था कौन सा नाम और चुनाव चिन्ह
TMC में बंटवारे से 1969 की कांग्रेस की कहानी फिर ताज़ा हो गई है. इंदिरा गांधी बनाम पुराने नेता, पार्टी का नाम, चुनाव चिह्न और चुनाव आयोग ने इस विवाद को कैसे सुलझाया.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में 2026 की टूट ने भारतीय राजनीति के उस पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण 1969 में कांग्रेस के विभाजन के दौरान सामने आया था. जब एक ही पार्टी के दो गुट खुद को असली पार्टी बता रहे हों तो पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह किसके हिस्से जाता है?
1969 में यह लड़ाई कांग्रेस के भीतर इंदिरा गांधी और पार्टी के पुराने संगठनात्मक नेतृत्व यानी ‘ओल्ड गार्ड’ के बीच थी. एक तरफ इंदिरा गांधी के समर्थक नेता थे, तो दूसरी तरफ एस. निजलिंगप्पा के नेतृत्व वाला संगठन गुट. दोनों पक्ष खुद को असली कांग्रेस बता रहे थे. मामला चुनाव आयोग तक पहुंचा और फिर सुप्रीम कोर्ट में भी गया.
2026 में करीब 57 साल बाद ऐसा ही सवाल तृणमूल कांग्रेस के सामने है. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और उनके विरोधी गुट के बीच पार्टी के नाम, संगठन और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद के बाद चुनाव आयोग ने अंतरिम तौर पर ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘जोड़ा घास-फूल’ चुनाव चिन्ह दोनों गुटों के लिए फ्रीज कर दिए हैं.
चुनाव आयोग के सामने अब यह सवाल है कि चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत पार्टी की पहचान किस गुट के साथ जोड़ी जाए.
1969 में कांग्रेस में आखिर हुआ क्या था?
1969 में राष्ट्रपति चुनाव कांग्रेस के अंदर चल रहे सत्ता संघर्ष का बड़ा मोड़ बन गया. पार्टी के संगठनात्मक नेतृत्व और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच मतभेद तेजी से बढ़ रहे थे. कांग्रेस के पुराने नेताओं के समूह, जिसे आम तौर पर ‘सिंडिकेट’ या ‘ओल्ड गार्ड’ कहा जाता है, का संगठन पर मजबूत प्रभाव था.
राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस संगठन ने नीलम संजीव रेड्डी को उम्मीदवार बनाया. इंदिरा गांधी ने पार्टी लाइन से अलग जाकर निर्दलीय उम्मीदवार वी.वी. गिरि का समर्थन किया और कांग्रेस सांसदों-विधायकों से ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर वोट करने की अपील की. वी.वी. गिरि चुनाव जीत गए. इसके बाद कांग्रेस के भीतर टकराव और बढ़ा और पार्टी दो गुटों में बंट गई.
एस. निजलिंगप्पा के नेतृत्व वाला गुट कांग्रेस (O) यानी Organisation के नाम से जाना गया. इंदिरा गांधी समर्थक धड़े को अलग-अलग समय पर कांग्रेस (R) और कांग्रेस (J) के नाम से भी संबोधित किया गया. दोनों गुटों का दावा था कि असली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस वही हैं.
इस विवाद के साथ पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह का सवाल भी जुड़ गया. उस समय कांग्रेस का आरक्षित चुनाव चिन्ह ‘दो बैलों की जोड़ी’ था. इसलिए सवाल यह था कि इस चिन्ह का इस्तेमाल कौन करेगा?
चुनाव आयोग ने कांग्रेस के विवाद में क्या देखा?
चुनाव आयोग के सामने मामला चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत आया. आयोग को यह तय करना था कि कांग्रेस के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों में से कौन उस मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके लिए चुनाव चिन्ह आरक्षित था.
आयोग ने पार्टी के उद्देश्यों और कार्यक्रमों को देखा. दोनों गुट कांग्रेस की मूल विचारधारा और उद्देश्यों से जुड़े होने का दावा कर रहे थे, इसलिए इस आधार पर किसी एक गुट को अलग करना मुश्किल था.
इसके बाद पार्टी के संविधान और संगठनात्मक ढांचे को देखा गया. दोनों पक्षों के बीच संगठन को लेकर इतना विवाद था कि यह आधार भी निर्णायक साबित नहीं हुआ.
इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण आधार बना संख्या बल.
इंदिरा गांधी समर्थित गुट के साथ संसद और राज्य विधानसभाओं में कांग्रेस के बड़ी संख्या में निर्वाचित सदस्य थे. संगठनात्मक स्तर पर भी उनके समर्थन का आकलन किया गया. उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर आयोग ने पाया कि जगजीवन राम के नेतृत्व वाले इंदिरा समर्थक गुट के पास कांग्रेस के सांसदों और विधायकों के साथ-साथ संगठनात्मक प्रतिनिधियों का भी पर्याप्त बहुमत था.
11 जनवरी 1971 को चुनाव आयोग ने जगजीवन राम के नेतृत्व वाले गुट को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में मान्यता दी और ‘दो बैलों की जोड़ी’ चुनाव चिन्ह उसके लिए आरक्षित किया.
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. सादिक अली बनाम चुनाव आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 1971 में चुनाव आयोग के अधिकार और पार्टी विवाद में बहुमत के परीक्षण को मान्यता दी. अदालत ने माना कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संख्या का अपना महत्व है.
यानी कांग्रेस के उस ऐतिहासिक विवाद में सिर्फ यह नहीं देखा गया कि कौन पुराना नेता है या किसका दावा राजनीतिक रूप से बड़ा है. संगठन और विधायी संख्या बल भी महत्वपूर्ण बने.
‘दो बैलों की जोड़ी’ से ‘गाय-बछड़ा’ और फिर ‘हाथ’ तक कांग्रेस कैसे पहुंची?
कांग्रेस के चुनाव चिन्ह की कहानी 1969 के विभाजन के साथ खत्म नहीं हुई. ‘दो बैलों की जोड़ी’ कुछ समय तक इंदिरा गांधी समर्थित धड़े की पहचान रही, लेकिन बाद में चुनाव चिन्ह को लेकर फिर बदलाव हुआ.
1971 में दोनों कांग्रेस गुटों को अलग-अलग चुनाव चिन्ह दिए गए. इंदिरा समर्थित गुट को ‘गाय और बछड़ा’ चुनाव चिन्ह मिला, जबकि दूसरे गुट को ‘चरखा चलाती महिला’ का चिन्ह मिला.
1978 में कांग्रेस में एक और बड़ा विभाजन हुआ. इंदिरा गांधी का गुट फिर अलग कांग्रेस के रूप में सामने आया. इस बार ‘गाय और बछड़ा’ भी उसके पास नहीं रहा. चुनाव आयोग ने इंदिरा गांधी के गुट को नया चुनाव चिन्ह दिया- ‘हाथ’.
यही हाथ बाद में कांग्रेस की सबसे स्थायी चुनावी पहचान बन गया. इस तरह कांग्रेस की चुनावी पहचान ने ‘दो बैलों की जोड़ी’ से ‘गाय और बछड़ा’ और फिर ‘हाथ’ तक का सफर तय किया.
इससे यह भी साफ होता है कि किसी पार्टी का चुनाव चिन्ह हमेशा उसके किसी एक नेता के साथ स्थायी रूप से नहीं जुड़ा रहता. पार्टी टूटने पर चुनाव आयोग नए सिरे से यह तय कर सकता है कि कौन सा गुट पुराने नाम या चिन्ह का इस्तेमाल करेगा और किसे नई पहचान मिलेगी.
अब 2026 में TMC के साथ क्या हुआ?
2026 में तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी पार्टी के संगठन और नेतृत्व को लेकर विवाद सामने आया. एक तरफ ममता बनर्जी का गुट है और दूसरी तरफ रितब्रता बनर्जी तथा अरूप रॉय से जुड़ा गुट.
विवाद का एक अहम हिस्सा राष्ट्रीय कार्यसमिति की वैधता से जुड़ा है. विरोधी गुट का दावा है कि पिछली राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल फरवरी 2025 में समाप्त हो गया था और इसी आधार पर 22 जून 2026 को विशेष बैठक में संगठनात्मक बदलाव किए गए. ममता गुट इस दावे को स्वीकार नहीं करता और उसका कहना है कि पार्टी के संविधान के अनुसार कार्यसमिति का कार्यकाल पांच साल का था तथा अगला संगठनात्मक चुनाव 2027 में होना था.
यही विवाद चुनाव आयोग के सामने भी पहुंचा. दोनों पक्षों ने पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अपना दावा किया. उपचुनाव सामने होने के कारण आयोग के सामने तत्काल यह सवाल भी था कि उम्मीदवारों के नामांकन में किस गुट को TMC का अधिकृत प्रतिनिधि माना जाए.
आयोग ने अंतिम फैसला करने के बजाय अंतरिम व्यवस्था अपनाई. ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘जोड़ा घास-फूल’ चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दिया गया. यानी फिलहाल दोनों गुट मूल नाम और चिन्ह का इस्तेमाल नहीं कर सकते.
इसके बाद दोनों गुटों को नए नाम और चुनाव चिन्ह दिए गए. ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉलर’ चुनाव चिन्ह मिला. दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिन्ह दिया गया.
चुनाव आयोग के इस फैसले का राजनीतिक असर यह है कि जिस ‘जोड़ा घास-फूल’ चिन्ह को ममता बनर्जी ने 1998 में अपनी नई पार्टी की पहचान के रूप में तैयार किया था, वह फिलहाल दोनों गुटों के पास नहीं है.
नंदीग्राम में चुनाव चिन्ह का सवाल अहम कैसे?
नंदीग्राम का इस विवाद में खास महत्व है. ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा और तृणमूल कांग्रेस के विस्तार में नंदीग्राम आंदोलन एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है. 2007 के नंदीग्राम आंदोलन ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव पैदा किया और आगे चलकर 2011 में वाम मोर्चे के 34 साल के शासन के अंत का रास्ता तैयार किया.
अब 2026 में उसी नंदीग्राम सीट के उपचुनाव में TMC का पुराना ‘जोड़ा घास-फूल’ चुनाव चिन्ह EVM पर नहीं है. मूल पार्टी का नाम और चिन्ह फ्रीज होने के कारण ममता गुट को नए नाम और नए प्रतीक के साथ चुनावी प्रक्रिया में जाना पड़ रहा है.
ममता गुट ने बाद में नंदीग्राम में अपने उम्मीदवार को वापस लेकर कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने की घोषणा भी की है. ऐसे में नंदीग्राम अब सिर्फ चुनावी मुकाबले की सीट नहीं रह गई है, बल्कि TMC की राजनीतिक पहचान और उसके चुनावी चिन्ह से जुड़ी कहानी का भी अहम हिस्सा बन गई है.
1969 की कांग्रेस और 2026 की TMC में क्या फर्क है?
1969 की कांग्रेस और 2026 की TMC के बीच सबसे बड़ा समान बिंदु यह है कि दोनों मामलों में एक ही राजनीतिक संगठन के भीतर दो गुट सामने आए और दोनों ने पार्टी की मूल पहचान पर दावा किया. दोनों मामलों में चुनाव आयोग के सामने पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह का सवाल पहुंचा.
1969 में इंदिरा गांधी के समर्थक गुट और कांग्रेस के पुराने संगठनात्मक नेतृत्व के बीच संघर्ष था. चुनाव आयोग ने पार्टी के उद्देश्य, संविधान और संख्या बल को परखा. संगठनात्मक और वैचारिक आधार से स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकलने के बाद विधायी और संगठनात्मक बहुमत महत्वपूर्ण बना. अंततः इंदिरा समर्थित गुट को कांग्रेस और ‘दो बैलों की जोड़ी’ की पहचान मिली.
2026 में TMC के मामले में अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है. आयोग ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और ‘जोड़ा घास-फूल’ को अंतरिम रूप से फ्रीज किया है और दोनों गुटों को अलग नाम और चुनाव चिन्ह दिए हैं.
यानी 1969 में सवाल था- ‘असली कांग्रेस कौन?’ 2026 में सवाल है- ‘असली तृणमूल कौन?’ लेकिन दोनों मामलों का जवाब एक ही तरीके से पहले से तय नहीं माना जा सकता. चुनाव आयोग को हर मामले में संगठनात्मक रिकॉर्ड, पार्टी संविधान, विधायी समर्थन और अन्य संबंधित प्रमाणों को देखना होता है.
अब TMC के मामले में ‘जोड़ा घास-फूल’ फ्रीज है और दोनों गुटों को फिलहाल अलग पहचान मिली है. इसलिए नंदीग्राम का यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट का मुकाबला नहीं, बल्कि उस बड़े सवाल का नया अध्याय है कि पार्टी टूटने के बाद उसकी राजनीतिक पहचान, नाम और चुनाव चिन्ह किसके पास रहेगा.




