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Nandigram By-election: नामांकन के बाद कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान अरेस्ट, क्या चुनाव लड़ने पर लटक सकती है तलवार, कानून में क्या?

नंदीग्राम उपचुनाव में मिलन प्रधान की गिरफ्तारी के बाद जानिए नामांकन, गिरफ्तारी, वारंट, दोषसिद्धि और चुनाव लड़ने की पात्रता को लेकर कानून क्या कहता है.

Milan Pradhan arrest Nandigram election Congress candidate
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स्टेट मिरर डेस्क
स्टेट मिरर डेस्क7 Mins Read

Updated on: 19 Sept 2026 12:10 PM IST

पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान की 18 सितंबर को गिरफ्तारी ने चुनावी प्रक्रिया और आपराधिक कानून के बीच एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है. क्या नामांकन दाखिल करने के बाद उम्मीदवार को गिरफ्तार किया जा सकता है और अगर वह जेल चला जाए तो क्या उसकी उम्मीदवारी खत्म हो सकती है? मिलन प्रधान की गिरफ्तारी पुराने नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण आंदोलन से जुड़े हत्या के मामले में हुई है. पुलिस की ओर से गिरफ्तारी के लिए पुराने लंबित वारंट का हवाला दिया गया है. इस घटनाक्रम ने नामांकन, गिरफ्तारी और चुनाव लड़ने की पात्रता के बीच कानूनी संबंध को चर्चा में ला दिया है.

नंद्रीग्राम से कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को 18 सितंबर 2026 को 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से जुड़े पुराने मामलों में गिरफ्तार किया गया. पुलिस के अनुसार, उनके खिलाफ लंबित वारंट था. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक चार हत्या मामलों में IPC की धारा 302 लगी थी; अन्य धाराओं में 147, 148, 149, 326, 364, 201, 307 और 506 शामिल हैं.

क्या नामांकन करते ही प्रत्याशी को गिरफ्तारी से छूट मिल जाती है?

ऐसा नहीं है. किसी विधानसभा या लोकसभा चुनाव में नामांकन दाखिल कर देने से उम्मीदवार को क्रिमिनल लॉ से कोई blanket immunity नहीं मिलती. यानी नामांकन दाखिल करने के बाद भी पुलिस उम्मीदवार को गिरफ्तार कर सकती है. अगर गिरफ्तारी के लिए कानून में निर्धारित आधार मौजूद हों. उम्मीदवार बन जाना किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में गिरफ्तारी से स्वतः संरक्षण नहीं देता.

क्या सिर्फ FIR दर्ज होने पर उम्मीदवार को गिरफ्तार किया जा सकता है?

सिर्फ FIR दर्ज होना और गिरफ्तारी होना एक ही बात नहीं है. गंभीर अपराध के मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 35 पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी की शक्ति देती है, लेकिन इसके लिए कानून में निर्धारित शर्तें पूरी होना जरूरी है. गिरफ्तारी की जरूरत और उसके कारणों से जुड़े safeguards भी लागू होते हैं. इसलिए किसी उम्मीदवार के खिलाफ FIR दर्ज है, इसका मतलब यह नहीं कि पुलिस हर स्थिति में उसे तुरंत गिरफ्तार कर सकती है.

क्या अदालत का गिरफ्तारी वारंट नामांकन के बाद भी लागू रहता है?

अगर किसी अदालत ने पहले से गिरफ्तारी वारंट जारी किया है तो बाद में चुनाव के लिए नामांकन दाखिल कर देने से वह वारंट अपने आप खत्म नहीं हो जाता. पुलिस वैध वारंट के आधार पर गिरफ्तारी कर सकती है. उम्मीदवार को गिरफ्तारी से राहत चाहिए तो इसके लिए संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के तहत अदालत का रुख करना पड़ सकता है.

नंदीग्राम मामले में यही पहलू महत्वपूर्ण है. मिलन प्रधान की गिरफ्तारी को लेकर सामने आई जानकारी में पुराने मामले में लंबित गिरफ्तारी वारंट का जिक्र किया गया है. इसलिए केवल नामांकन दाखिल करने के आधार पर गिरफ्तारी को रोके जाने की कोई सामान्य कानूनी व्यवस्था नहीं है.

क्या चुनाव के दौरान नया अपराध करने पर भी उम्मीदवार गिरफ्तार हो सकता है?

नामांकन दाखिल करने के बाद उम्मीदवार अगर कोई नया गंभीर अपराध करता है तो उसके खिलाफ सामान्य आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है. इसी तरह यदि पहले से किसी मामले में वैध गिरफ्तारी वारंट है तो चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने मात्र से उस वारंट पर रोक नहीं लगती.

क्या चुनावी हिंसा रोकने के नाम पर कैंडिडेट को गिरफ्तार किया जा सकता है?

कुछ परिस्थितियों में पुलिस preventive action भी ले सकती है. BNSS की धारा 170 संज्ञेय अपराध को होने से रोकने के लिए कुछ परिस्थितियों में बिना वारंट गिरफ्तारी की अनुमति देती है. लेकिन इसके लिए पुलिस को यह आधार होना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति संज्ञेय अपराध करने की योजना बना रहा है और अपराध को किसी अन्य तरीके से रोकना संभव नहीं है. ऐसी preventive गिरफ्तारी सामान्यतः 24 घंटे से अधिक नहीं हो सकती, जब तक किसी अन्य कानूनी प्रावधान के तहत आगे की हिरासत अधिकृत न हो.

क्या गिरफ्तारी होते ही मिलन प्रधान का नामांकन रद्द हो जाएगा?

ऐसा भी नहीं है. यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी अंतर है. गिरफ्तारी और चुनावी अयोग्यता दो अलग-अलग बातें हैं. किसी उम्मीदवार की गिरफ्तारी अपने आप उसकी उम्मीदवारी खत्म नहीं करती. चुनाव लड़ने की अयोग्यता Representation of the People Act, 1951 यानी जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों से तय होती है.

इसलिए FIR, गिरफ्तारी, जेल, मुकदमा और दोषसिद्धि को एक ही कानूनी स्थिति मानना सही नहीं होगा. किसी उम्मीदवार के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होना अपने आप उसे चुनाव लड़ने से अयोग्य नहीं बनाता.

क्या जेल में रहते हुए उम्मीदवार चुनाव लड़ सकता है?

उम्मीदवारी और मतदान के अधिकार को अलग-अलग समझना जरूरी है. किसी उम्मीदवार का जेल में होना अपने आप उसकी उम्मीदवारी खत्म नहीं करता. लेकिन जेल में बंद व्यक्ति के मतदान के अधिकार पर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 62(5) का अलग प्रभाव पड़ता है. इस प्रावधान के तहत जेल में बंद व्यक्ति या पुलिस की वैध हिरासत में मौजूद व्यक्ति सामान्यतः मतदान नहीं कर सकता, निर्धारित अपवादों को छोड़कर. यानी ऐसी स्थिति संभव है जिसमें कोई व्यक्ति उम्मीदवार बना रहे, लेकिन खुद मतदान न कर सके.

क्या चुनाव आयोग गिरफ्तारी के बाद उम्मीदवार को चुनाव से हटा सकता है?

सिर्फ गिरफ्तारी के आधार पर उम्मीदवार स्वतः चुनाव से बाहर नहीं हो जाता. चुनाव आयोग चुनावी प्रक्रिया संचालित करता है. जबकि गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत आपराधिक न्याय प्रक्रिया का हिस्सा हैं. उम्मीदवार के आपराधिक मामलों और antecedents की जानकारी चुनावी प्रक्रिया में घोषित की जाती है, लेकिन आपराधिक मामला लंबित होना और चुनाव लड़ने से कानूनी अयोग्यता अलग-अलग चीजें हैं.

तो नंदीग्राम में फिलहाल असली कानूनी सवाल क्या है?

  • मिलन प्रधान की गिरफ्तारी के मामले को तीन अलग-अलग स्तरों पर समझा जा सकता है.
  • पहला सवाल है कि गिरफ्तारी किस कानूनी आधार पर हुई और क्या वैध गिरफ्तारी वारंट मौजूद था.
  • दूसरा सवाल है कि नामांकन की चुनावी स्थिति क्या है और क्या वह वैध रूप से स्वीकार किया गया है.
  • तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या उनके खिलाफ ऐसी कोई कानूनी अयोग्यता मौजूद है जो उन्हें चुनाव लड़ने से रोकती है.
  • फिलहाल कानूनी स्थिति यह है कि नामांकन दाखिल करना गिरफ्तारी से सुरक्षा नहीं देता, लेकिन गिरफ्तारी अपने आप चुनाव लड़ने की अयोग्यता भी नहीं बनाती.
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