दिवाली का संबंध पटाखों से कैसे, राम के नाम पर मस्ती क्यों... आचार्य प्रशांत ने बताया दीपावली का असली अर्थ, कैसे मनाएं त्योहार
आचार्य प्रशांत ने दिवाली पर पटाखों, मिठाइयों और खरीदारी पर सवाल उठाए. जानिए उन्होंने भगवान राम के त्याग, मर्यादा और दिवाली के असली अर्थ पर क्या कहा.
देशभर में दिवाली की रौनक छाई हुई है. कहीं घरों में दीप जलाने की तैयारी है तो कहीं बाजारों में मिठाइयों, सोने-चांदी, गिफ्ट और पटाखों की खरीदारी चल रही है. शाम होते ही आसमान आतिशबाजी की रोशनी से जगमगाने लगता है और हर तरफ उत्सव का माहौल दिखाई देता है. लेकिन क्या दिवाली का मतलब सिर्फ पटाखे फोड़ना, खरीदारी करना और खुशियां मनाना है? क्या हमने कभी सोचा है कि जिस श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी में दीप जलाए जाते हैं, उनके जीवन और आदर्शों से हम इस त्योहार पर क्या सीखते हैं?
इसी सवाल को लेकर आध्यात्मिक वक्ता आचार्य प्रशांत ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट इंस्टाग्राम पर कुछ वीडियो साझा किए हैं. इनमें उन्होंने दिवाली के वास्तविक अर्थ, भगवान राम के आदर्शों और त्योहार मनाने के तरीके पर अपनी बात रखी है. आचार्य प्रशांत का कहना है कि दिवाली भगवान राम का पर्व है, इसलिए इस दिन उनके जीवन से मर्यादा, सत्य और त्याग की सीख लेनी चाहिए. उन्होंने सवाल उठाया कि जिस राम ने सत्य और मर्यादा के लिए राजपाट छोड़ दिया, उनके पर्व को हम भोगवाद और दिखावे से कैसे जोड़ सकते हैं?
राम का पर्व है तो उनसे मर्यादा सीखो- आचार्य प्रशांत
आचार्य प्रशांत ने अपने वीडियो में कहा कि 'श्री राम का पर्व है तो उनसे कुछ सीखोगे नहीं. तुम्हारे जीवन में लेशमात्र भी नहीं या फिर उन्हीं के पर्व के दिन तुम गलत मस्तियां करोगे. राम का पर्व है, तो उनसे मर्यादा सीखो! श्री राम का पर्व है, तो उनसे कुछ सीखो. वो मर्यादा पुरुषोत्तम थे और तुम्हारे जीवन में मर्यादा लेशमात्र भी नहीं."
उन्होंने आगे कहा कि "जिन्होंने सत्य और मर्यादा के लिए अपना सिंहासन छोड़ दिया और 14 बरस बाद सोने की लंका भी छोड़ दी, तुम उनका संबंध जुए, खरीदारी और भोगवाद से कैसे जोड़ रहे हो? सब त्योहार बस मस्ती काटने, नाचने और नचाने का बहाना हैं क्या?"
लंका विजय के बाद भी राम ने सोने को नहीं छुआ
आचार्य प्रशांत ने अपने दूसरे वीडियो में भगवान राम के त्याग का उदाहरण देते हुए कहा कि लंका विजय के बाद उनके सामने अपार धन-संपत्ति थी, लेकिन उन्होंने उस पर अपना अधिकार नहीं जमाया. उन्होंने कहा, "जिनके सामने हजारों टन सोना था, उन्होंने उसे भी नहीं छुआ! लंका विजय के बाद राम के पास हजारों टन सोना था. परंपरा के अनुसार विजेता का उस धन पर अधिकार था. वे चाहें तो सबकुछ अयोध्या ले जा सकते थे या लंका में ही राज्य कर सकते थे. लेकिन उन्होंने सोने को नहीं छुआ. जिनके सामने इतना धन था, उन्होंने त्याग को चुना. ऐसे ही तो याद किए जाते हैं श्री राम."
राम त्याग के प्रतीक हैं, भोगवाद के नहीं
आचार्य प्रशांत ने दिवाली पर होने वाली सोने-चांदी और महंगी चीजों की खरीदारी पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा, "राम त्याग के प्रतीक हैं, भोगवाद के नहीं! दिवाली पर सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात और गाड़ियों की धूम है. लेकिन राम तो सबकुछ छोड़कर चले गए थे. त्योहार अध्यात्म के रिमाइंडर होते हैं, ताकि हम उस गहरी आध्यात्मिक बात को याद कर सकें जिसे हम भूल रहे हैं."
उन्होंने आगे कहा कि "दिवाली पर स्वागत करना है उस राम का, जो त्याग के प्रतिनिधि हैं. उनके स्वागत में दिए जलेंगे-त्याग के स्वागत में. जो कुछ अनावश्यक है, उसका त्याग करिए. यही दिवाली का असली अर्थ है. इस भावना के साथ दिवाली मनाइए, तो आपकी दिवाली राममय होगी."
क्या दिवाली शारीरिक सुख और भोग-विलास का त्योहार है?
आचार्य प्रशांत ने दिवाली पर होने वाली मिठाइयों और भोग-विलास की परंपरा पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर दिवाली भगवान राम की घर वापसी का त्योहार है, तो क्या यह शारीरिक सुख का त्योहार भी हो सकता है? उन्होंने कहा कि जिन श्रीराम ने कभी शारीरिक सुख को प्राथमिकता नहीं दी, उनके स्वागत में हम दिवाली पर बर्फी और काजू बांट रहे हैं. मिठाइयां बांटने से दिवाली का असली अर्थ नहीं आता. राम का जीवन त्याग, तपस्या और आत्मसंयम का प्रतीक है. अगर हम वास्तव में राम को समझते हैं, तो हमें भी भोग-विलास छोड़कर उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए.
दिवाली का पटाखों से क्या संबंध? आचार्य प्रशांत ने उठाया सवाल
आचार्य प्रशांत ने अपने एक अन्य वीडियो में दिवाली और पटाखों के संबंध पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा, "बारूद तो नई-नई चीज है, ये पटाखे कहां से आ गए? सोचा है कभी, दिवाली का संबंध पटाखों से कैसे हो गया?" उन्होंने आगे कहा कि पटाखे हाल के समय में दिवाली के साथ जोड़े जाने लगे हैं, लेकिन आज स्थिति ऐसी हो गई है कि लोगों के लिए दिवाली का मतलब ही पटाखे, झालर और मिठाइयां रह गया है. जब धर्म की गहराई और परंपराओं का असली अर्थ समझ में नहीं आता, तो सतही चीजें ही त्योहार की पहचान बन जाती हैं.
आचार्य प्रशांत ने दिवाली मनाने का एक अलग तरीका बताते हुए कहा कि इस दिन काम से छुट्टी है, तो परिवार के लोगों के साथ बैठिए. ऐसे लोगों के साथ समय बिताइए, जिनके साथ अच्छी और समझदारी भरी चर्चा हो सके. ऐसी बातें कीजिए, जो वास्तव में सत्संग कहलाती हैं.




