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मुसलमानों के लिए काम नहीं करेंगे, बंगाल CM से लेकर विधायकों तक के ऐसे बोल, संविधान क्या कहता है?

बंगाल बीजेपी नेताओं के मुस्लिमों पर दिए बयानों से विवाद बढ़ा. क्या वोट के आधार पर भेदभाव किया जा सकता है? जानें संविधान और कानून क्या कहते हैं.

Suvendu Adhikari statement Ritesh Tiwari Muslims remark
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'मुसलमानों ने वोट नहीं दिया. बीजेपी की ​जीत हिंदू लहर से हुई. इसलिए उन्हीं का काम करेंगे' - शुभेंदु अधिकारी

'मुसलमानों का वोट बीजेपी को नहीं मिला, इसलिए उनके लिए अगले पांच साल कोई काम नहीं करूंगा' - रितेश तिवारी

'मुस्लिमों से वोट मांगने का कोई मतलब नहीं, क्योंकि वे बीजेपी को वोट नहीं देते' - दिलीप घोष

'किसी ने हिंदुओं का अहित किया तो ईंट का जवाब पत्थर से मिलेगा' - मिथुन चक्रवर्ती

पश्चिम बंगाल में बीजेपी नेताओं के मुस्लिम समुदाय को लेकर दिए गए बयानों ने चुनाव बाद प्रदेश में नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari से लेकर मंत्री Dilip घोष, विधायक Ritesh Tiwari और अभिनेता-नेता Mithun Chakraborty तक के बयान अब सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर सवाल खड़े कर रहे हैं. किसी ने कहा कि मुसलमानों ने वोट नहीं दिया, इसलिए उनका काम नहीं करेंगे, तो किसी ने मुस्लिम वोटों को “बेकार” बताया. इन बयानों को विपक्ष सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति बता रहा है, जबकि बीजेपी इसे राजनीतिक संदर्भ में दिया गया बयान कह रही है. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या लोकतंत्र में चुना गया जनप्रतिनिधि धर्म के आधार पर जनता के साथ भेदभाव की बात कर सकता है? और भारतीय संविधान इस पर क्या कहता है?

किसने क्या कहा?

बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी के बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान और चुनाव नतीजों के बाद दिए गए बयान भी सुर्खियों में रहे. उन्होंने कथित तौर पर दावा किया था कि बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं ने उनका समर्थन किया है, जबकि मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पक्ष में हुआ था. बीेजेपी की जीत हिंदू लहर की वजह से हुई है. इसलिए हिंदुओं का काम करेंगे.

सबसे ज्यादा चर्चा काशीपुर-बेलगाछिया बीजेपी विधायक Ritesh Tiwari के बयान की हो रही है, जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें मुसलमानों का वोट नहीं मिला, इसलिए वे “अगले पांच साल उनके लिए कोई काम नहीं करेंगे.” यह बयान उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान दिया था.

बंगाल बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और खड़गपुर सदर से विधायक चुने गए दिलीप घोष ने अप्रैल 2026 में चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि “मुस्लिम वोट मांगने का कोई मतलब नहीं”, क्योंकि वे बीजेपी को वोट नहीं देते.

वहीं, नाओपाड़ा से भाजपा विधायक अर्जुन सिंह ने मुस्लिम विरोधी बयान देते हुए कहा था कि चुनाव बाद बंगाल में सड़क पर नमाज पढ़ने पर प्रतिबंध लगाएंगे. उनके इस बयानों को लेकर भी राज्य में राजनीतिक और सामाजिक बहस छिड़ गई, क्योंकि बंगाल में कई क्षेत्रों में विशेष समुदाय के लोग सड़कों पर नमाज पढ़ते हैं.

फिल्म अभिनेता और बंगाल बीजेपी के नेता मिथुन चक्रवर्ती ने भी टीएमसी नेता हुमायूं कबीर के उस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी थी जिसमें कथित तौर पर हिंदुओं को नदी में फेंकने की धमकी दी गई थी. मिथुन ने पलटवार करते हुए कहा था कि अगर कोई हिंदुओं को नुकसान पहुंचाएगा तो वे चुप नहीं बैठेंगे और ईंट का जवाब पत्थर से देंगे. इस बयान के बाद उनके खिलाफ शिकायत भी दर्ज की गई थी.

संविधान क्या कहता है?

इस तरह के बयान भारत के संविधान की मूल भावना के खिलाफ माने जाते हैं. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार संविधान भारत के सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता प्रदान करता है. धर्म, जाति या जन्म स्थान के आधार पर नागरिकों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता.

संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ राज्य या उसके प्रतिनिधियों द्वारा भेदभाव नहीं किया जा सकता. साथ ही भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में हमेशा से यह कहा जाता रहा है कि चुनाव जीतने वाला जनप्रतिनिधि क्षेत्र में सभी लोगों को नुमाइंदा होता है. चाहे किसी ने उसे वोट दिया हो या न दिया हो. इसलिए उसे पूरे क्षेत्र के विकास पर ध्यान देना चाहिए.

शपथ का उल्लंघन: एक विधायक के रूप में, जन प्रतिनिधि संविधान के प्रति निष्ठा रखने की शपथ लेते हैं. किसी एक धर्म या समुदाय विशेष के नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकारों और सुविधाओं (जैसे स्थानीय कार्य, सर्टिफिकेट जारी करना आदि) से इनकार करना, शपथ और लोकतांत्रिक मूल्यों का सीधा उल्लंघन माना जाता है.

अब बयान पर घमासान क्यों?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनाव नतीजों के बाद एक बार फिर सांप्रदायिक बयानबाजी को लेकर विवाद तेज हो गया है. बीजेपी के कई नेताओं के मुस्लिम समुदाय को लेकर दिए गए बयान अब सिर्फ राजनीतिक बहस का मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं.

बीजेपी का तर्क है कि इन बयानों को संदर्भ से काटकर पेश किया जा रहा है और पार्टी “सबका साथ, सबका विकास” की नीति पर चलती है. लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई जनप्रतिनिधि खुलकर यह कह सकता है कि वह किसी खास धर्म के लोगों का काम नहीं करेगा?

भारतीय संविधान इस मामले में साफ व्यवस्था देता है. संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है. अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है. ऐसे में अगर कोई निर्वाचित प्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से यह कहे कि वह एक समुदाय के लिए काम नहीं करेगा, तो यह संविधान की मूल भावना धर्मनिरपेक्षता और समानताके खिलाफ माना जा सकता है.

कानूनी तौर पर केवल बयान देना तुरंत अपराध की श्रेणी में नहीं आता, लेकिन यदि सरकारी योजनाओं, प्रशासनिक फैसलों या विकास कार्यों में वास्तव में धार्मिक भेदभाव किया जाता है, तो मामला अदालत तक जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट कई बार यह टिप्पणी कर चुका है कि धर्म आधारित राजनीति और नफरत फैलाने वाले बयान लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण अब चुनावी रणनीति का स्थायी हिस्सा बनता जा रहा है. लेकिन लोकतंत्र में सत्ता की असली कसौटी यही मानी जाती है कि सरकार और जनप्रतिनिधि उन लोगों के लिए भी समान रूप से काम करें, जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया.

शुभेंदु अधिकारी
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