शेख हसीना के बाद बांग्लादेश में भारत की कितनी बची सियासी पूंजी? रहमान Era में Modi के पास विकल्प क्या
शेख हसीना के बाद बांग्लादेश में भारत की सियासी पकड़ कितनी बची? मोदी सरकार के पास क्या विकल्प हैं और ढाका की बदलती राजनीति का असर कितना गहरा है?
शेख हसीना के लंबे कार्यकाल में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते अब तक के सबसे स्थिर और रणनीतिक सहयोग वाले दौर में रहे, लेकिन उनके बाद बदलते राजनीतिक समीकरणों ने इस संतुलन पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं. बांग्लादेश की राजनीति में Bangladesh Nationalist Party और इसके प्रभावशाली नेता Tarique Rahman का रुख भारत के साथ पहले के मुकाबले कम सहज माना जाता है. जबकि चीन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि ढाका की विदेश नीति किस दिशा में जाएगी. क्या भारत के साथ भरोसे का स्तर बरकरार रहेगा या संबंध अधिक व्यावहारिक और लेन-देन आधारित हो जाएंगे?
भारत के लिए यह भी अहम है कि वह इस बदलते समीकरण में अपनी रणनीतिक स्थिति कैसे बनाए रखे. जानें, कब, कैसा रहा भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध.
शेख हसीना भारत के लिए सबसे बेहतर कैसे?
शेख हसीना के शासन में भारत–बांग्लादेश संबंध रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक पहुंचे. 2010 के बाद बांग्लादेश ने भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय कई उग्रवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की, जिनमें ULFA जैसे ग्रुप्स के नेटवर्क कमजोर हुए. 2015 में भारत–बांग्लादेश Land Boundary Agreement लागू हुआ, जिससे 50 प्लस वर्षों पुराना सीमा विवाद सुलझा.
इसी दौर में भारत ने बांग्लादेश को 8 बिलियन डॉलर से अधिक की Line of Credit दी और ट्रांसशिपमेंट सुविधा शुरू हुई. हालांकि, चीन का निवेश भी इस दौरान बढ़ा. 2023 तक बांग्लादेश के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में चीन सबसे बड़ा विदेशी ऋणदाता बन चुका था, लेकिन रणनीतिक रूप से ढाका भारत के करीब ही रहा.
Gen Z के बाद बांग्लादेश का “बैलेंस मॉडल”
बांग्लादेश की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से “India–China balancing” पर आधारित रही है, लेकिन स्थिरता शेख हसीना के समय ज्यादा थी. यदि सत्ता परिवर्तन होता है, तो ढाका की नीति अधिक लेन-देन आधारित (transactional) हो जाती है. उदाहरण के लिए 2001–2006 के BNP शासनकाल में भारत–बांग्लादेश संबंधों में तनाव देखा गया था और कई सुरक्षा मुद्दों पर सहयोग सीमित रहा. उस दौर में चीन के साथ रक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर समझौते तेजी से बढ़े थे.
BNP और तारिक रहमान का राजनीतिक प्रभाव कितना?
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का झुकाव ऐतिहासिक रूप से भारत के मुकाबले चीन और अन्य इस्लामिक देशों की ओर अधिक माना जाता है. इसके प्रमुख नेता तारीक रहमान 2008 से UK में निर्वासन में थे, लेकिन पार्टी पर उनका प्रभाव बना रहा. BNP के 2001–2006 शासन में भारत के साथ कई सुरक्षा वार्ताएं ठप थीं. जबकि चीन के साथ आर्थिक और रक्षा सहयोग बढ़ा था. यह एक ऐतिहासिक पैटर्न है, जो भविष्य की नीति संकेत देता है.
चीन का बढ़ता असर: इंफ्रास्ट्रक्चर डिपेंडेंसी
2020 के दशक में चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर बन चुका है, और लगभग 25 से 30% बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में उसकी भागीदारी है. पायरा पोर्ट और पद्मा ब्रिज रेल लिंक जैसे प्रोजेक्ट्स में चीनी कंपनियों की भूमिका रही है. हालांकि, पद्मा ब्रिज का मुख्य निर्माण बांग्लादेश ने खुद किया. बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत ढाका को अरबों डॉलर का निवेश मिला है. इससे चीन का “सॉफ्ट इन्फ्लुएंस” लगातार बढ़ रहा है, लेकिन भारत अब भी सबसे बड़ा पड़ोसी व्यापारिक साझेदार है (लगभग $14–16 बिलियन वार्षिक द्विपक्षीय व्यापार).
भारत के पास विकल्प: कनेक्टिविटी और सुरक्षा
भारत ने 2015 के बाद बांग्लादेश के साथ ट्रांजिट और कनेक्टिविटी बढ़ाई जैसे कोलकाता–अगरतला रेल और जलमार्ग समझौते. फिलहाल, भारत की रणनीति अब तीन स्तंभों पर टिकी हुई है. इनमें कनेक्टिविटी, सुरक्षा और आर्थिक निर्भरता शामिल हैं. भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बांग्लादेश की लगभग 90% सीमाएं भारत से जुड़ी हैं, जिससे भौगोलिक निर्भरता स्थायी है.
अब संबंध बिगड़ेंगे या संतुलित रहेंगे?
अभी तक का इतिहास बताता है कि भारत–बांग्लादेश संबंध “zero-sum” नहीं हैं. 2023 में दोनों देशों के बीच व्यापार रिकॉर्ड $15 बिलियन के आसपास रहा. चीन का प्रभाव बढ़ने के बावजूद बांग्लादेश की 80% से अधिक आयात-निर्यात लॉजिस्टिक्स भारत से जुड़ी भूमि और समुद्री मार्गों पर निर्भर है. इसलिए संबंध पूरी तरह खराब होने की संभावना कम है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व बदलने पर रिश्ते “high-trust strategic” से “pragmatic transactional” स्तर पर जा सकते हैं.




