एक किताब, कई सवाल! एमएम नरवणे की 'Four Stars of Destiny' छपी नहीं तो राहुल गांधी के पास कैसे पहुंची?
भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर बवाल कम होने का नाम नहीं ले रहा है.
MM Naravane book
भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ का राहुल गांधी ने जबसे संसद में जिक्र किया है, तबसे हर कोई इसके बारे में जानना चाहता है कि आखिर ऐसा क्या है इस किताब में जो संसद में भारी बवाल मचा और आज तक ये किताब क्यों प्रकाशित नहीं हुई? किताब को लेकर रहस्य और गहराता जा रहा है. साल 2024 में जिस किताब का प्रकाशन तय था, जिसकी प्री-ऑर्डर बुकिंग शुरू हो चुकी थी और जिसे बाद में रक्षा मंत्रालय (MoD) की मंजूरी न मिलने के कारण रोक दिया गया, वह अब 2026 में भी आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है.
लेकिन पिछले सप्ताह इस कहानी ने नया मोड़ तब ले लिया जब यह किताब न किसी काले बाजार में, न किसी लीक के जरिये, बल्कि संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के हाथों में हार्डकवर प्रति के रूप में दिखाई दी. अब सवाल ये है कि जब ये किताब छपी ही नहीं तो राहुल गांधी के पास कैसे पहुंची?
संसद तक कैसे पहुंची किताब?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस पुस्तक के बारे में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि “इसका कोई अस्तित्व ही नहीं है” वह बिना रक्षा मंत्रालय की अनुमति के छपकर राहुल गांधी तक कैसे पहुंच गई?
यह सवाल सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि आम पाठकों, प्रकाशन जगत और रक्षा मामलों से जुड़े विशेषज्ञों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए कई लोगों से बात की गई. लेकिन कोई आधिकारिक जवाब नहीं मिला है.
जनरल नरवणे की किताब में क्या?
‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ जनरल नरवणे की भारतीय सेना में लगभग चार दशक लंबी सेवा का विवरण देती है. यह किताब एक सेकंड लेफ्टिनेंट से लेकर थलसेना प्रमुख बनने तक के उनके सफर को दर्ज करती है. इसमें 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से भारत-चीन के सबसे बड़े सैन्य टकराव का नेतृत्व करने के उनके अनुभव भी शामिल बताए जाते हैं. इस संस्मरण के प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया हैं.
द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने 2020 से 2024 के बीच 35 पुस्तकों को मंजूरी दी, लेकिन जनरल नरवणे की आत्मकथा ही एकमात्र ऐसी पांडुलिपि है जिसे अब तक अनुमति नहीं मिली.
क्या बोला पेंगुइन रैंडम हाउस?
पेंगुइन रैंडम हाउस ने इस पुस्तक का वर्णन करते हुए कहा है कि “जनरल नरवणे लीडरशिप और मैनेजमेंट पर अपने विचार साझा करते हैं और हमें इस बात को बताते हैं कि सशस्त्र बलों को राष्ट्रीय शक्ति का एक अधिक शक्तिशाली साधन बनाने के लिए और क्या करने की आवश्यकता है, जो 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हो.” वहीं विपक्ष का कहना है कि यह किताब संवेदनशील इसलिए है क्योंकि इसमें एलएसी पर भारत-चीन संघर्ष और अग्निपथ भर्ती योजना जैसे विवादास्पद विषय शामिल हैं.
छपने से पहले कहां जाती है किताब?
नियमों के अनुसार, किसी भी रक्षा मामलों से जुड़ी किताब छपने से पहले स्क्रिप्ट के रूप में रक्षा मंत्रालय को मंजूरी के लिए भेजा जाता है. पत्रिका द कारवां को पुस्तक की हार्ड कॉपी नहीं, बल्कि स्क्रिप्ट मिली थी, जिसके आधार पर लेख प्रकाशित हुआ. इसी लेख के कुछ उदाहरण राहुल गांधी ने संसद में दिए थे.
क्या बोले लेखक सुशांत सिंह?
एक इंटरव्यू में इस लेख के लेखक सुशांत सिंह ने कहा कि उन्होंने लेख प्रकाशित होने से पहले ही रक्षा मंत्रालय, जनरल नरवणे और प्रकाशक को ईमेल भेजे थे, लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया. उन्होंने कहा “यह लेख लगभग एक सप्ताह से प्रकाशित है और किसी ने भी इसका खंडन नहीं किया है, न तो जनरल नरवणे ने, न ही रक्षा मंत्रालय ने और न ही प्रकाशकों ने यह मानने से इनकार किया है कि यह स्क्रिप्ट मौजूद नहीं है.”
क्या वापस बुला ली गई थी किताब?
हालांकि सुशांत सिंह भी किताब की हार्ड कॉपी देखकर हैरान रह गए. इंडिया टुडे डिजिटल के मुताबिक ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ की प्रकाशित प्रतियां दिल्ली के बुकस्टोर्स तक पहुंच चुकी थीं, लेकिन बाद में उन्हें वापस मंगा लिया गया. नई दिल्ली के एक बुकस्टोर के कर्मचारी ने बताया “हमने किताब के लिए सैकड़ों प्री-ऑर्डर लिए थे. हमारे वफादार ग्राहक ऐसा करते हैं, लेकिन एक विवाद हुआ और हमें किताबें प्रकाशक को वापस करनी पड़ीं.”
उन्होंने यह भी कहा कि किताब अप्रैल 2024 में तय लॉन्च से काफी पहले ही छप चुकी थी. अब सवाल ये है कि क्या जनरल नरवणे की किताब को छापने से पहले रक्षा मंत्रालय की अनुमति ली गई थी? और अगर नहीं तो इतनी संवेदनशील किताब छपकर संसद तक कैसे पहुंची?





