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Middle East War: क्या नेताओं को मारकर जंग जीती जा सकती है? कहीं ये US की स्ट्रेटजिक भूल तो नहीं! क्या कहते हैं Expert

मिडिल ईस्ट वॉर के बीच बड़ा सवाल - क्या नेताओं को मारकर जंग जीती जा सकती है? जानिए एक्सपर्ट्स का विश्लेषण और इतिहास क्या कहता है.

Middle East War Analysis Leadership Decapitation Strategy
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मिडिल ईस्ट वॉर (Middle East War) में जारी संघर्ष ने एक बार फिर यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुश्मन देश के शीर्ष नेताओं को खत्म कर युद्ध जीता जा सकता है. हाल के घटनाक्रम, खासकर ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते टारगेटेड हमलों ने “लीडरशिप डिकैपिटेशन” की रणनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. ऐसे में 'लीडरशिप डिकैपिटेशन' यानी नेतृत्व को खत्म करना, क्या वाकई युद्ध का निर्णायक तरीका है या सिर्फ अस्थायी रणनीति. इस मसले पर विदेश मामलों के एक्सपर्ट मानते हैं कि यह रणनीति युद्ध का परिणाम बदल सकती है, लेकिन उसे खत्म करना लगभग नामुमकिन होता है.

Iran का सिस्टम नेताओं की हत्या से कमजोर पड़ सकता है?

विदेश मामलों के जानकार Dr Brahmadeep Alune के मुताबिक, ईरान का राजनीतिक ढांचा इतना मजबूत है कि सिर्फ नेताओं को मारकर उसे कमजोर नहीं किया जा सकता. सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई के नेतृत्व में वहां तीन स्तंभ (धार्मिक सर्वोच्चता, राज्यतंत्र और सैन्य संरचना) मजबूती से जुड़े हुए हैं. यही वजह है कि शीर्ष नेताओं या सैन्य अधिकारियों के मारे जाने के बावजूद ईरान की रणनीतिक क्षमता न केवल बनी हुई है, बल्कि कई बार उसकी आक्रामकता और बढ़ जाती है.

ईरान में नेतृत्व चयन की प्रक्रिया इतनी अहम क्यों है?

ईरान में सुप्रीम लीडर का चुनाव एक जटिल और बहुस्तरीय प्रक्रिया के जरिए होता है. इस प्रक्रिया के लिए वहां पर धार्मिक सर्वोच्च परिषद है. इस परिषद के वहां के राष्ट्रपति, जज और एक धार्मिक नेता शामिल है. ये तीनों जिसे इजाजत देते हैं, वहीं सुप्रीम लीडर का चुनाव करने के लिए चुनाव लड़ पाते हैं. यही वजह है कि निर्वाचित 88 धर्मगुरुओं की संस्था अहम भूमिका निभाती है. ये वही लोग होते हैं, जिन्हें धार्मिक परिषद की ओर से चुनाव लड़ने की मंजूरी मिलती है. इस पूरी प्रक्रिया से यह सुनिश्चित होता है कि सत्ता का शीर्ष नेतृत्व एक विचारधारात्मक ढांचे से जुड़ा रहे. यही कारण है कि वहां नेतृत्व में बदलाव होने पर भी व्यवस्था नहीं टूटती, बल्कि उसी विचारधारा के भीतर नया नेता उभर आता है.

क्या ‘टारगेटेड किलिंग’ से जंग और भड़कती है?

डॉ. ब्रह्मदीन अलूने का मानना है कि टारगेटेड किलिंग का असर दोतरफा होता है. एक तरफ यह दुश्मन के कमांड सिस्टम को अस्थायी झटका देती है, लेकिन दूसरी ओर यह संघर्ष को और भड़का भी सकती है. कई बार मारे गए नेता “शहीद” बन जाते हैं, जिससे समर्थकों में बदले की भावना और तेज हो जाती है. यही वजह है कि कई मिलिटेंट संगठनों में एक नेता के खत्म होते ही दूसरा उसकी जगह ले लेता है और संघर्ष जारी रहता है.

इतिहास क्या बताता है - क्या नेता की मौत से जंग खत्म होती है?

इतिहास इस सवाल का साफ जवाब देता है कि नेता की मौत से जंग खत्म नहीं होती. World War 2 के दौरान Adolf Hitler की मौत के बाद जर्मनी ने आत्मसमर्पण किया, लेकिन युद्ध पहले ही निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका था. इसी तरह Iraq War में Saddam Hussein को हटाने के बाद भी देश में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रही. इससे साफ है कि किसी एक व्यक्ति को हटाना पूरे सिस्टम को खत्म करने जैसा नहीं होता.

एक्सपर्ट युद्ध को कैसे देखते हैं?

एक्सपट्र अलूने का कहना है कि आज का युद्ध सिर्फ सैन्य ताकत से नहीं जीते जाते. इसके लिए कूटनीति, राजनीतिक समाधान और जनसमर्थन जरूरी होता है. अगर किसी देश या संगठन की जड़ें समाज में गहरी हैं, तो उसके नेताओं को मारने से उसकी विचारधारा खत्म नहीं होती.

क्या ‘लीडरशिप डिकैपिटेशन’ कारगर रणनीति है?

मिडिल ईस्ट के मौजूदा हालात यह दिखाते हैं कि नेताओं को मारकर जंग “जीती” नहीं जा सकती, बल्कि सिर्फ उसकी दिशा बदली जा सकती है. असली जीत तब होती है जब संघर्ष के मूल कारणों (राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक) को खत्म किया जाए. वरना इतिहास बार-बार यही साबित करता है कि एक नेता जाता है, लेकिन जंग जारी रहती है.

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