क्या 'विक्टिम कार्ड' के जरिए कम बैक करेंगी ममता, बंगाल में मोदी-शाह के लिए कितनी टेंशन?
क्या टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी का ‘विक्टिम कार्ड’ बंगाल में फिर असर दिखाएगा? BJP के उभार के बीच मोदी-शाह के लिए TMC की रणनीति कितनी बड़ी चुनौती बनेगी.
बंगाल चुनाव 2026 में करारी हार के बाद टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी का 'विक्टिम कार्ड' सिर्फ राजनीतिक सहानुभूति पाने की रणनीति नहीं, बल्कि बंगाल की सत्ता और केंद्र के बीच लंबे टकराव की वास्तविक परिस्थितियों से भी कनेक्टेड है. केंद्र और राज्य सरकार के बीच फंड, केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई, राज्यपाल की सक्रियता और चुनावी हिंसा जैसे मुद्दों ने लगातार टकराव का माहौल बनाया. ऐसे में ममता ने खुद को सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि बंगाल की स्वायत्तता और पहचान की लड़ाई लड़ने वाली नेता के रूप में पेश किया. यही कारण है कि जब भी उन पर या TMC पर दबाव बढ़ा, उन्होंने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों और संघीय ढांचे पर हमले से जोड़ दिया. राजनीतिक तौर पर यह नैरेटिव इसलिए असरदार रहा क्योंकि बंगाल में क्षेत्रीय अस्मिता और बाहरी हस्तक्षेप का मुद्दा हमेशा भावनात्मक असर पैदा करता रहा है. समझें, सत्ता से बाहर होने की घटना को वो कैसे अपनी जीत का नैरेटिव सेट करना चाहती हैं.
दरअसल, ममता बनर्जी की राजनीति में 'विक्टिम कार्ड' उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह खुद या अपनी पार्टी को केंद्र सरकार, एजेंसियों, विपक्ष या बाहरी ताकतों के निशाने पर दिखाकर राजनीतिक सहानुभूति जुटाने की कोशिश कर रही हैं. जानें, इसके लिए उन्होंने क्या-क्या किया?
विधानसभा भंग और मंत्रिमंडल की बर्खास्तगी: बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार को उन्होंने नैतिक आधार पर खुद की जीत बताया. इसके लिए एसआईआर और केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती को आधार बनाकर हार को नैतिक जीत बताया. साथ ही कहा कि जब वो चुनाव हारी ही नहीं तो इस्तीफा क्यों? इसके बदले उन्होंने विधानसभा भंग होने और राज्यपाल द्वारा 8 मई को मंडिमंडल की बर्खास्तगी को चुना.
बंगाल बनाम बाहरी नैरेटिव: BJP और केंद्र सरकार को बाहरी ताकत बताकर ममता बनर्ती ने खुद को बंगाल की अस्मिता की रक्षक के रूप में पेश की है. यह काम वह पहले भी कई बार कर चुकी हैं.
केंद्रीय एजेंसियों का मुद्दा: ED, CBI, Income Tax की कार्रवाई को वह राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताती हैं और कहती हैं कि दिल्ली की सत्ता उनकी सरकार को अस्थिर करना चाहती है.
चोट और हमले का राजनीतिक इस्तेमाल: साल 2021 चुनाव में नंदीग्राम में लगी चोट को उन्होंने बीजेपी की साजिश और हमले से जोड़कर जनता के बीच सहानुभूति बनाई थी. उस समय प्रचंड बहुमत के रूप में उन्हें, इसका लाभ मिला था.
महिला नेता होने का एंगल: कई बार वह यह संदेश देती हैं कि एक महिला मुख्यमंत्री होने के कारण उन्हें ज्यादा निशाना बनाया जाता है. यही वजह है कि वो भाजपा विरोधी हैं.
फेडरलिज्म बनाम केंद्र: राज्य के अधिकारों, फंड रोकने और राज्यपाल की भूमिका को लेकर वह खुद को “दिल्ली के दबाव” के खिलाफ लड़ने वाली नेता बताती हैं.
अल्पसंख्यक और गरीब वर्ग का डर: NRC, CAA जैसे मुद्दों पर ममता ने यह नैरेटिव बनाया कि केंद्र सरकार बंगाल के कमजोर वर्गों और अल्पसंख्यकों को निशाना बना रही है, और उसे हमेशा ढाल बनाती आई हैं.
पोस्ट-पोल हिंसा या कानून व्यवस्था पर आरोप: जब भी बंगाल हिंसा को लेकर आलोचना होती है, TMC अक्सर दावा करती है कि विपक्ष राज्य को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह रणनीति इसलिए असरदार रही क्योंकि ममता खुद को “सिस्टम से लड़ने वाली जमीनी नेता” की छवि में लगातार बनाए रखती हैं.
हार के बाद ममता का 'विक्टिम कार्ड' सही कैसे?
टीएमसी नेता ममता बनर्जी ने चुनावी हार के बाद भी खुद को पूरी तरह डिफेंसिव मेड नहीं आने दिया. उन्होंने हार को सिर्फ जनादेश नहीं, बल्कि केंद्र की ताकत, एजेंसियों के दबाव और बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप से जोड़कर पेश किया. ममता ने यह नैरेटिव बनाया कि BJP ने प्रशासनिक मशीनरी, केंद्रीय एजेंसियों और संसाधनों का इस्तेमाल कर बंगाल की राजनीति को प्रभावित किया. साथ ही उन्होंने बंगाल की अस्मिता और लोकतंत्र पर खतरे की बात उठाकर समर्थकों को भावनात्मक रूप से जोड़े रखा. इस तरह हार के बावजूद उन्होंने खुद को संघर्ष करने वाली नेता और TMC को “पीड़ित पक्ष” के रूप में स्थापित करने की कोशिश की.




