'बाग़बान' से भी भारी निकली Daadi Ki Shaadi! इंटरवल तक हंसी, बाद में इमोशनल ओवरडोज
नीतू कपूर और कपिल शर्मा स्टारर 'दादी की शादी' रिश्तों, इमोशन और सेकेंड इनिंग्स लव स्टोरी पर बनी फैमिली ड्रामा फिल्म है. फर्स्ट हाफ एंटरटेनिंग है, लेकिन लंबा सेकेंड हाफ और ओवरडोज इमोशन फिल्म की रफ्तार बिगाड़ देते हैं.
Daadi Ki Shaadi Review: अगर 'बाग़बान' देखते वक्त आपको भी पेरेंट्स से ताने मिले हैं… तो एक बोनस सजेशन अपने माता-पिता के साथ ये फिल्म देखने मत जाइए. क्योंकि फैमिली ड्रामा पर बनी ये फिल्म आपकी अच्छी-खासी बैंड बजा सकती है और ऐसा क्यों कहा जा रहा है… ये आपको फिल्म खत्म होने तक खुद समझ आ जाएगा. आशीष आर. मोहन के निर्देशन में बनी नीतू कपूर, कपिल शर्मा, रिद्धिमा कपूर स्टारर 'दादी की शादी' सिनेमा घरों में धूम मचाने के लिए तैयार है और स्टेट मिरर ने आपके लिए ये फिल्म पहले ही देख ली है ताकि आप जान सके की आपको थिएटर्स में जाकर अपने 3 घंटे इस मूवी पर लगाने चाहिए या नहीं. 'दादी की शादी' एक फैमिली ड्रामा फिल्म है, जो इमोशन, रिश्तों और सेकेंड इनिंग्स वाली लव स्टोरी को दिखाने की कोशिश करती है. फिल्म की सोच अच्छी है, लेकिन उसका प्रेजेंटेशन हर जगह उतना असरदार नहीं बन पाता.
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी विमला आहूजा (दादी) नीतू कपूर के इर्द-गिर्द घूमती है, जो जिंदगी के उस पड़ाव पर शादी करने का फैसला लेती हैं जब उनके खुद के बच्चे अपनी मां को अलमारी में एक पुरानी याद समझकर छोड़ देते हैं. अब शादी करने का फैसला क्यों लिया जाता है, बस यहीं से पूरे परिवार में इमोशनल ड्रामा, रिश्तों की उलझनें और फैमिली के अंदर की असली सोच बाहर आने लगती है, तो वहीं टोनी कालरा (कपिल शर्मा) हर मूवी की तरह इस मूवी में भी शादी को लेकर स्ट्रगल करते नज़र आते हैं... बस फर्क इतना है की आज तक कपिल ने जो मूवीज की हैं उसमे उनकी 3-4 शादियां होती है लेकिन इस मूवी में एक शादी के लिए भी कई पापड़ बेल्ने पड़ते हैं... अब दादी की शादी से टोनी की शादी का क्या है कनेक्शन ये तो आपको फिल्म देखने पर ही समझ आएगा.
कितनी देखने लायक
फिल्म की बात करें तो फर्स्ट हाफ आपको कहानी के साथ बांधकर रखता है. कई जगह कॉमेडी इतनी अच्छी है की आप पेट पकड़ कर हसेंगे और साथ ही इमोशन का बैलेंस अच्छा लगता है. लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म धीरे-धीरे थकाने लगती है. (बच्चे से लेकर बुजुर्ग आपको इस फिल्म में कॉमेडी करते और पंच लाइन्स मारते नज़र आएंगे) लेकिन जैसे ही आप सेकेंड हाफ में पहुंचते हैं… करीब 15 मिनट बाद ही ये फीलिंग आने लगती है- 'हे भगवान… बस अब हो गया… ये मूवी और नहीं देखी जाएगी.' असल समस्या यही है कि फिल्म अपनी बात को जरूरत से ज्यादा खींचती है और इमोशनल ड्रामा ओवरलोड हो जाता है.
स्टार कास्ट और परफॉर्मेंस
नीतू सिंह (विमला आहूजा): नीतू सिंह पूरी फिल्म की जान हैं. उन्होंने अपने किरदार को बेहद नैचुरल तरीके से निभाया है और कई इमोशनल सीन्स में वही फिल्म को संभालती नजर आती हैं.
कपिल शर्मा (टोनी कालरा): कपिल शर्मा की कॉमिक टाइमिंग अच्छी है, लेकिन इस बार उनका किरदार उतना बड़ा इम्पैक्ट नहीं छोड़ता. कुछ पंच अच्छे हैं, लेकिन कई जगह वही टीवी शो वाली फील आती है.
सादिया खतीब (कन्नू आहूजा): सादिया ने अपने रोल में सादगी और इमोशन दोनों अच्छे से दिखाए हैं. उनका किरदार कहानी को इमोशनल सपोर्ट देता है.
रिद्धिमा कपूर (सुनैना भरद्वाज): रिद्धिमा कपूर साहनी का डेब्यू ठीक-ठाक कहा जा सकता है. स्क्रीन प्रेजेंस अच्छी है, लेकिन एक्टिंग में अभी और ग्रोथ की जरूरत महसूस होती है.
आर. सरथकुमार (थेरन देवराजन): आर. सरथकुमार का किरदार मैच्योर और प्रभावी लगता है. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस काफी स्ट्रॉन्ग है.
योगराज सिंह (बाबूजी): योगराज सिंह ने अपने रोल में गंभीरता और भावनाएं दोनों अच्छे से दिखाई हैं
इसके अलावा तेजू कोल्हापुरे, दीपक दत्ता जीतेन्द्र हूडा और अदिति मित्तल भी फिल्म में नजर आते हैं
म्यूजिक कैसा है?
फिल्म का म्यूजिक शायद फिल्म खत्म होने से पहले ही आपके दिमाग से निकल जाएगा. ना कोई ऐसा गाना है जो थिएटर से बाहर आते वक्त आप गुनगुनाएं… और ना ही बैकग्राउंड स्कोर ऐसा बन पाया है जो इमोशनल सीन्स को यादगार बना सके. सच कहें तो फिल्म का एल्बम उतना ही फीका है जितना किसी शादी में बिना डीजे का डांस फ्लोर.
फिल्म क्या खास है और क्या कम
फैमिली ऑडियंस के लिए क्लीन कंटेंट. कुछ इमोशनल सीन्स काफी रिलेटेबल लगते हैं, फर्स्ट हाफ एंटरटेनिंग है.नीतू सिंह की परफॉर्मेंस दमदार है. सेकेंड हाफ जरूरत से ज्यादा लंबा लगता है. इमोशनल ड्रामा ओवरडोज जैसा लगता है, कई सीन्स रिपीटिव लगते हैं खासतौर से क्लाइमैक्स ज्यादा असर नहीं छोड़ता.
'दादी की शादी' एक अच्छी सोच वाली फिल्म है, जो रिश्तों और उम्र के बाद भी प्यार के अधिकार की बात करती है. अब प्यार कैसा और कौनसा है ये ट्विस्ट है...लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, फीका म्यूजिक और खिंचा हुआ सेकेंड हाफ फिल्म को पूरी तरह यादगार बनने से रोक देता है. अगर आपको स्लो फैमिली ड्रामा पसंद हैं तो शायद फिल्म ठीक लगे… वरना थिएटर से निकलते वक्त आपके दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम सकती है 'थोड़ी छोटी होती… तो ज्यादा अच्छी लगती'.
स्टेट मिरर : 2 Stars




