क्यों Amitabh Bachchan ने अपने राजनैतिक करियर को कहा था 'नरक'? बड़े-बड़े नेता पचा नहीं पाए थे यूपी में बिग बी की जीत
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने 1984 में राजनीति में एंट्री कर रिकॉर्ड जीत हासिल की थी, लेकिन कुछ ही सालों में उनका राजनीतिक करियर विवादों और अंदरूनी विरोध का शिकार बन गया.
तमिल सिनेमा के सुपरस्टार विजय ने राजनीति के मैदान में एक तूफानी एंट्री की है. उनकी नई पार्टी तमिलाग वेट्री कड़गम (टीवीके) तमिलनाडु की 234 सदस्यीय विधानसभा में 108 सीटों पर जीती है. वो जल्द मुख्यमंत्री पद की भी शपथ ले लेंगे. विजय की लोकप्रियता और जनसमर्थन उन्हें इस मुकाम तक लाकर खड़ा कर चुका है. यह पहला मौका नहीं है जब कोई फिल्मी सितारा राजनीति में कदम रखकर सत्ता के शिखर तक पहुंचने का सपना देख रहा हो.
1970 के दशक में एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) ने भी यही किया था. उन्होंने 1972 में एआईएडीएमके (अन्ना द्रमुक मुनेत्र कड़गम) की स्थापना की और तीन बार तमिलनाडु के सीएम बने. लेकिन हर फिल्मी सितारे की कहानी इतनी सफल नहीं रही. कुछ को तो पेशेवर राजनेताओं ने अपनी सत्ता और करियर को खतरे में डालते हुए राजनीति से बाहर कर दिया. इस कैटेगिरी में सबसे चर्चित नाम है बॉलीवड के महानायक अमिताभ बच्चन का.
'कुली' कांड ने हिला दिया था पूरे देश को
1983 में अमिताभ बचन जीवन और मौत से लड़ रहे थे, क्योंकि कुली के सेट पर एक एक्शन सीन करते हुए उनके पेट में गंभीर चोट लगी. उनक घायल होने की खबर पूरे ने देश में किसी आग की तरह फैली. उनके फैंस और समर्थक उनका हाल जानने के लिए बंगले और अस्पताल के बाद खड़े रहते. उनके फैंस मंदिरों, चर्चों और गुरुद्वारों में उनके स्वस्थ होने की कामना कर रहे थे. यहां तक की उनके जन्म स्थान इलाहबाद में यज्ञ-हवन तक हुए. जब वे अस्पताल से बाहर आए, तो मुंबई की सड़कें उनके दीवानों से पट गईं. यह घटना साबित कर गई कि उस समय भारत में अमिताभ से ज्यादा लोकप्रिय कोई शख्स नहीं था. इसी दौरान 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने. राजीव और अमिताभ बचपन के दोस्त थे. राजीव ने मदद मांगी और अमिताभ ने बिना किसी हिचक के गांधी परिवार का साथ दिया. वे इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ने उतरे और पूर्व सीएम एच.एन. बहुगुणा को भारी अंतर से हराकर संसद पहुंच गए. एक न्यूकमर के लिए यह शुरुआत बेहद शानदार थी.
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पार्टी के भीतर रची जाने लगी थी साजिश
लेकिन जल्द ही अमिताभ को राजनीति की कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ा. उनके लिए चुनाव लड़ना और जीतना इतना मुश्किल नहीं रहा होगा क्योंकि एक तो वह लोकप्रिय फ़िल्मी स्टार थे दूसरा वह अपने जन्म स्थान इलाहबाद से लड़े थे. लेकिन चुनौती तो उनका बाहें फैलाए उनका इतंजार कर रही थी. कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता उन्हें अनुभवहीन और बाहरी व्यक्ति मानते थे. खासकर तत्कालीन दिवगंत वित्त मंत्री वी.पी. सिंह जो बाद में प्रधानमंत्री बने, उनकी इलाहाबाद में बढ़ती लोकप्रियता से काफी परेशान थे. वीर संघवी के संस्मरण 'अ रूड लाइफ' के अनुसार, पार्टी के अंदरूनी फैक्ट्स ने बच्चन की पकड़ को कमजोर करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए. अगर वे दो हफ्ते तक निर्वाचन क्षेत्र का दौरा नहीं करते, तो पूरे इलाहाबाद में उनके चेहरे वाले 'लापता' पोस्टर लग जाते. बच्चन इतने डेडिकेटेड थे कि उन्होंने मुंबई की फिल्मी जिम्मेदारियों को कम करके नई दिल्ली में आधिकारिक आवास पर रहना शुरू कर दिया. फिर अमिताभ को लगता रहा कि वह राजनीति और फिल्म इंडस्ट्री को संभाल लेंगे. राजीव गांधी से उनकी नजदीकी पार्टी के कई पुराने नेताओं को खटकती थी. उन्हें डर था कि अमिताभ की लोकप्रियता और करिश्मा उन्हें पार्टी का भविष्य का चेहरा बना सकता है. नतीजतन, इलाहाबाद में बच्चन की हर पहल को जानबूझकर रोका जाने लगा.
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कैसे हुआ राजनीतिक करियर का अंत
बात है 1987 की जब अमिताभ की राजनैतिक करियर में बड़ा तूफान आया और उनपर आरोप लगाया गया. 1987 में अमिताभ की पॉलिटिकल करियर को बर्बाद करने के लिए बोफोर्स घोटाले का आरोप लगाया गया. अमिताभ के भाई अजीतभ पर स्विस बैंक अकाउंट से जुड़े आरोप लगे. अमिताभ की छवि दिन पर दिन खराब होती जा रही थी. ऐसे में विरोधियों के दबाव में आकर अमिताभ ने इस्तीफा दे दिया. यह केस उनपर 25 साल चला और साल 2012 में उन्हें दोषी न पाते हुए बरी कर दिया गया. उस इंडिया टुडे के साथ बातचीत में अमिताभ बच्चन ने कहा था कि काश माता-पिता के जीवित रहते हुए मेरे निर्दोष होने का पता चल पता.
राजनीति में आना 'नरक' हो गया था
1998 में अमिताभ, सिमी गरेवाल के मशहूर शो Rendevouz में आए. जहां उन्होंने स्वीकार किया कि कई राजनेताओं ने उन्हें जान का खतरा होने की चेतावनी दी थी. उस दौर ने उनके जीवन को नरक बना दिया था, जबकि वह कभी राजनीति में आना भी नहीं चाहते थे. उनका कहना था कि वह सिर्फ राजीव गांधी की अपील पर समाज में कुछ करने के इरादे से आए थे. राजनीति से खुद को दूर कर चुके अमिताभ ने जब सोचा कि पार्लियामेंट में सरकार के पास सिमित संसाधन हैं, इसलिए उन्होंने अपना चैरिटी संगठन शुरू किया, लेकिन राजनीति ने यहां भी हस्तक्षेप किया और उनकी नीयत पर सवाल उठाए गए. आखिरकार निराश होकर उन्होंने उसे बंद कर दिया.




