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इंदौर से सबक लो! गांधीनगर में टाइफाइड के शिकार हो गए 100 से ज्यादा बच्चे, पानी, प्लानिंग और प्रशासन कहां हुए फेल?

गुजरात की राजधानी गांधीनगर में दूषित पेयजल के कारण टाइफाइड के 100 से अधिक संदिग्ध मामले सामने आए हैं, जिनमें बड़ी संख्या बच्चों की है. सीवर पानी सप्लाई लाइन में मिलने से हालात बिगड़े. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने युद्ध स्तर पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं. यह संकट शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर, निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

इंदौर से सबक लो! गांधीनगर में टाइफाइड के शिकार हो गए 100 से ज्यादा बच्चे, पानी, प्लानिंग और प्रशासन कहां हुए फेल?
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( Image Source:  sora ai )
नवनीत कुमार
Edited By: नवनीत कुमार

Published on: 5 Jan 2026 10:27 AM

गुजरात की राजधानी गांधीनगर में टाइफाइड के मामलों में अचानक उछाल सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि शहरी प्रशासन और बुनियादी ढांचे की बड़ी परीक्षा बन गया है. दूषित पानी से फैली बीमारी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि “स्मार्ट” और “मॉडल” शहरों के दावों के पीछे ज़मीनी हकीकत कितनी मज़बूत है. 100 से ज्यादा बच्चों का अस्पताल में भर्ती होना इस संकट की गंभीरता को रेखांकित करता है.

आदिवाड़ा गांव और सेक्टर 24, 26, 27 और 29 में सीवर का गंदा पानी पीने की लाइन में मिलना प्रशासनिक चूक का सबसे खतरनाक उदाहरण है. स्थानीय लोगों के मुताबिक हालात ऐसे हैं कि शायद ही कोई घर बचा हो, जहां कोई बीमार न पड़ा हो. यह सिर्फ तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि निगरानी और समय पर रखरखाव की विफलता की कहानी है.

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113 संदिग्ध केस और बढ़ता दबाव

सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक टाइफाइड के 113 संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं. इनमें से कुछ मरीजों को छुट्टी मिल चुकी है, लेकिन दर्जनों का इलाज अभी भी चल रहा है. हालात नियंत्रण में बताए जा रहे हैं, मगर सवाल यह है कि अगर राजधानी में यह स्थिति है, तो बाकी शहरों और कस्बों में हालात कैसे होंगे?

अमित शाह का दखल

संकट बढ़ते ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का सीधे हस्तक्षेप इस मामले को सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी अहम बना देता है. अधिकारियों को “युद्ध स्तर” पर काम करने के निर्देश यह दिखाते हैं कि सरकार किसी भी तरह की ढिलाई का जोखिम नहीं लेना चाहती खासकर तब, जब मामला राजधानी और बच्चों से जुड़ा हो.

ग्राउंड एक्शन VS इमेज मैनेजमेंट

डिप्टी मुख्यमंत्री हर्ष संघवी का सिविल अस्पताल दौरा, 24 घंटे की OPD, मरीजों के परिजनों के लिए भोजन और हेल्थ टीमों की तैनाती, ये सारे कदम ज़रूरी हैं. लेकिन आलोचक इसे “डैमेज कंट्रोल मोड” भी बता रहे हैं. सवाल यह है कि अगर पाइपलाइन की समय रहते जांच होती, तो क्या हालात यहां तक पहुंचते?

20,800 घरों का सर्वे: देर से जागा सिस्टम?

75 हेल्थ टीमों द्वारा 20,800 से ज्यादा घरों का निरीक्षण और 90,000 से अधिक लोगों को कवर करना बड़े पैमाने की कार्रवाई है. क्लोरीन टैबलेट, ORS और जागरूकता पर्चे बांटना जरूरी है, लेकिन यह भी दिखाता है कि सिस्टम अब प्रतिक्रिया की अवस्था में है, न कि रोकथाम की.

पानी, राजनीति और भरोसा

पीने का पानी नागरिकों और सरकार के बीच भरोसे की बुनियाद होता है. जब वही पानी बीमारी का कारण बन जाए, तो सवाल सिर्फ स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता का भी बनता है. गांधीनगर जैसे प्रशासनिक केंद्र में यह संकट विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका देता है और सत्ता पक्ष के लिए जवाबदेही की कसौटी बन जाता है.

सबक और आगे की राह

गांधीनगर टाइफाइड संकट बताता है कि बुनियादी सेवाओं में लापरवाही कितनी महंगी पड़ सकती है. पाइपलाइन की मरम्मत, सुपर क्लोरिनेशन और सर्वे जरूरी हैं, लेकिन असली चुनौती है. ऐसी व्यवस्था बनाना जहां संकट पैदा ही न हो. वरना हर बार “युद्ध स्तर” की कार्रवाई एक स्थायी समाधान नहीं, बल्कि असफलता की स्वीकारोक्ति बनती जाएगी.

अमित शाहIndia News
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