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जंतर-मंतर प्रोटेस्ट से BJP ही नहीं विपक्ष को भी सीखने की जरूरत, हर दल ​के लिए 5 बड़े सबक क्या?

जंतर-मंतर छात्र आंदोलन ने साफ कर दिया कि Gen Z अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं है. BJP और विपक्ष, दोनों से जवाबदेही, पारदर्शिता और ठोस विकल्प की मांग बढ़ रही है.

जंतर-मंतर प्रोटेस्ट से BJP ही नहीं विपक्ष को भी सीखने की जरूरत,  हर दल ​के लिए  5 बड़े सबक क्या?
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कभी आंदोलनों को राजनीतिक दल अपने-अपने राजनीतिक चश्मे से देखते थे. कोई उसे सरकार के खिलाफ जनाक्रोश बताता था, तो कोई विपक्ष की साजिश. लेकिन जंतर-मंतर पर दिखा छात्र आक्रोश एक अलग कहानी कहता है. यह विरोध सिर्फ एक मुद्दे का नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की बेचैनी का संकेत है, जो सोशल मीडिया पर ट्रेंड भी बनाती है, अदालत की सुनवाई भी देखती है, सरकारी दस्तावेज भी पढ़ती है और नेताओं के पुराने बयान भी याद रखती है.

पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG 2024 पेपर लीक विवाद, UGC-NET 2024 परीक्षा रद्द होने, विभिन्न राज्यों में भर्ती परीक्षाओं पर उठे सवाल और रोजगार से जुड़े आंदोलनों ने यह साबित किया है कि छात्र अब केवल कैंपस तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर रहे हैं. इस बार सवाल केवल सरकार से नहीं पूछा गया, बल्कि विपक्ष से भी पूछा गया कि अगर आप विकल्प बनना चाहते हैं तो आपका रोडमैप क्या है? यानी संदेश साफ है- Gen Z अब किसी भी दल को केवल नारे, प्रेस कॉन्फ्रेंस या इमोशनल स्पीच के आधार पर पास नहीं करने वाली.

1. सिर्फ विरोध करने से काम चल जाएगा?

दिल्ली के जंतर-मंतर के विरोध ने यह स्पष्ट कर दिया कि आज का छात्र केवल भीड़ का हिस्सा बनने नहीं आता, बल्कि जवाब मांगने आता है. वह यह भी देखता है कि आंदोलन के बाद क्या बदला. NEET-UG 2024 पेपर लीक विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, UGC-NET 2024 परीक्षा रद्द करनी पड़ी और कई राज्यों में भर्ती परीक्षाओं को लेकर सरकारों को जांच बैठानी पड़ी या प्रक्रियाओं में बदलाव करना पड़ा.

कॉकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट ने दिखाया कि छात्र केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई चाहते हैं. इसलिए सरकार के लिए संदेश है कि संवेदनशील मुद्दों पर समय पर संवाद, पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई अनिवार्य है. वहीं विपक्ष के लिए भी उतना ही बड़ा सवाल है कि क्या उसके पास केवल आरोप हैं या समाधान भी? जनाक्रोश की राजनीति अब उतनी प्रभावी नहीं, जितनी समाधान की राजनीति. आंदोलन तभी असरदार माना जाएगा, जब उसके बाद नीतिगत बदलाव की दिशा भी दिखाई दे.

2. क्या युवाओं का भरोसा अब स्थायी नहीं रहा?

देश की नई पीढ़ी किसी एक दल की स्थायी समर्थक बनने के बजाय मुद्दों के आधार पर अपना रुख तय कर रही है. प्रतियोगी परीक्षाओं, सरकारी नौकरियों, शिक्षा व्यवस्था और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह लगातार आंदोलन हुए हैं, उससे साफ है कि युवाओं की प्राथमिकताएं बदल रही हैं. रोजगार, शिक्षा, परीक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही उसके लिए चुनावी घोषणापत्र से कहीं बड़े विषय हैं.

यही वजह है कि सत्ता पक्ष के लिए युवाओं की नाराजगी को 'क्षणिक' मानना जोखिम भरा हो सकता है. दूसरी ओर विपक्ष के लिए भी यह भ्रम खतरनाक है कि सरकार के खिलाफ असंतोष अपने आप उसके समर्थन में बदल जाएगा. युवाओं का भरोसा अब अर्जित करना पड़ता है, विरासत में नहीं मिलता.

3. क्या सोशल मीडिया का नैरेटिव ही अंतिम सच है?

दरअसल, एक समय था जब राजनीतिक दल टीवी डिबेट जीतकर संतुष्ट हो जाते थे. अब एक वायरल वीडियो, एक तथ्यात्मक पोस्ट या छात्रों की लाइव स्ट्रीम पूरे राजनीतिक विमर्श का केंद्र बदल सकती है. NEET-UG और UGC-NET जैसे मामलों में सोशल मीडिया ने दस्तावेज, अभ्यर्थियों के अनुभव और सवालों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया. सत्ता पक्ष के लिए यह सीख है कि सूचना छिपाने या देर से प्रतिक्रिया देने की कीमत पहले से कहीं अधिक है.

विपक्ष के लिए भी सबक है कि केवल हैशटैग चलाने से राजनीतिक विश्वसनीयता नहीं बनती. सोशल मीडिया पर डिजिटल कैंपेन तभी प्रभावी होगा, जब उसके पीछे जमीनी संगठन, निरंतर संवाद और तथ्य मौजूद हों. सोशल मीडिया अब प्रचार का मंच नहीं, सार्वजनिक जवाबदेही का आईना बन चुका है.

4. क्या विपक्ष केवल आलोचक बना रहेगा?

लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष केवल सरकार की कमियां गिनाने से नहीं बनता, बल्कि वैकल्पिक नीति और भरोसेमंद नेतृत्व पेश करने से बनता है. कांग्रेस का कहना है कि उसने इस मुद्दे को सड़क, संसद और न्यायालय तक लगातार उठाया है और आगे भी सरकार को जनविरोधी नीतियों पर घेरती रहेगी. हाल के वर्षों में पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया और शिक्षा व्यवस्था पर विपक्ष ने संसद से लेकर अदालत तक कई बार सवाल उठाए हैं, लेकिन अब केवल सवाल पूछने से काम नहीं चलेगा.

उसके सामने अगली चुनौती और बड़ी है- बीजेपी की आलोचना के साथ-साथ शिक्षा, भर्ती, परीक्षा प्रणाली और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर ठोस नीति विकल्प भी सामने रखने होंगे. यदि विपक्ष जनता से यह अपेक्षा करता है कि वह उसे सत्ता का विकल्प माने, तो उसे विरोध की राजनीति से आगे बढ़कर समाधान की राजनीति का भरोसा भी देना होगा.

5. सत्ता और विपक्ष में से किसे 'ब्लैंक चेक'?

जंतर-मंतर का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश शायद यही है कि अब छात्र किसी भी दल को 'ब्लैंक चेक' देने के मूड में नहीं हैं. सत्ता पक्ष से वे जवाबदेही, पारदर्शिता और त्वरित निर्णय चाहते हैं, जबकि विपक्ष से निरंतर संघर्ष, विश्वसनीय नेतृत्व और स्पष्ट विकल्प. NEET-UG, UGC-NET और अन्य भर्ती परीक्षा विवादों के दौरान छात्रों ने केवल सरकार से ही नहीं, बल्कि विपक्ष से भी यह सवाल पूछा कि उसका वैकल्पिक मॉडल क्या है.

वर्षों तक राजनीतिक दल एक-दूसरे पर नैरेटिव बनाने का आरोप लगाते रहे, लेकिन अब नैरेटिव जनता बना रही है. जो दल युवाओं की भाषा, उनकी प्राथमिकताओं और उनके सवालों को समझेगा, वही आगे बढ़ेगा. बाकी दलों के लिए सोशल मीडिया पर ट्रेंड करना आसान हो सकता है, लेकिन छात्रों के बीच भरोसा जीतना अब सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा बन चुका है.

अब नहीं छोड़ेंगे BJP को, विकल्प भी देंगे

दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष का मानना है कि हमारी पार्टी के लिए जंतर-मंतर का आंदोलन केवल विरोध का मंच नहीं, बल्कि सरकार को लगातार जवाबदेह बनाने का अवसर है. पार्टी का दावा है कि उसने इस मुद्दे को शुरू से सड़क, संसद और न्यायालय तक उठाया है और आगे भी इसे कमजोर नहीं पड़ने देगी. कांग्रेस के सामने अब चुनौती सिर्फ बीजेपी की आलोचना करने की नहीं, बल्कि जनता के सामने ठोस और विश्वसनीय विकल्प पेश करने की भी है.

इतना ही नहीं, बीजेपी के कुशासन से प्रभावित वर्गों के बीच लगातार मौजूदगी, तथ्य आधारित राजनीति और जनसमर्थन को संगठित जनदबाव में बदलना ही उसकी अगली रणनीति होगी. इससे वह सरकार के नैरेटिव को चुनौती देने की कोशिश करेगी.

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