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जम्मू-कश्मीर में कैसे और क्यों बढ़ रहा CRPF का रोल, कितनी खतरनाक COBRA यूनिट जिसकी भी हो रही तैनाती?

जम्मू-कश्मीर में CRPF की भूमिका बढ़ेगी. कठुआ-उधमपुर के 21 कैंप संभाले जाएंगे और जंगलों में आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन के लिए CoBRA की तैनाती होगी.

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जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक बड़ा बदलाव सामने आया है. जम्मू डिवीजन के कठुआ और उधमपुर में सेना के 21 कैंप अब CRPF के हवाले किए जाने की तैयारी है. खास बात यह है कि इस बदलाव के साथ CRPF की जंगल और गुरिल्ला युद्ध में माहिर मानी जाने वाली CoBRA यूनिट की भी तैनाती होगी. ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सेना की जगह CRPF क्यों आ रही है, बल्कि यह भी है कि जम्मू के बदलते सुरक्षा समीकरण में CoBRA की भूमिका कितनी अहम होने वाली है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह अचानक लिया गया फैसला नहीं, बल्कि कई महीनों से तैयार की जा रही लंबी अवधि की रणनीति का हिस्सा है.

जम्मू-कश्मीर में CRPF का रोल क्यों बढ़ाया जा रहा है?

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और उग्रवाद से निपटने की जिम्मेदारी लंबे समय से सेना, खासकर राष्ट्रीय राइफल्स (RR), और CRPF जैसे बलों के बीच बंटी रही है. अब सुरक्षा तंत्र इस जिम्मेदारी का कुछ हिस्सा CRPF को सौंपने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. इसके पीछे एक बड़ी वजह सेना को नियमित काउंटर-इंसर्जेंसी ड्यूटी के कुछ बोझ से मुक्त करना और उसकी तैनाती को दूसरी रणनीतिक जरूरतों के हिसाब से संतुलित करना माना जा रहा है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सुरक्षा प्रतिष्ठान में लंबे समय से यह विचार था कि CRPF को सेना के कंधों से काउंटर-इंसर्जेंसी का कुछ बोझ उठाना चाहिए. इसके लिए कई महीनों से जिम्मेदारियों के हस्तांतरण की तैयारी चल रही थी.

इस बदलाव को सिर्फ जवानों की अदला-बदली के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. यह जम्मू क्षेत्र में सुरक्षा बलों की तैनाती को नए सिरे से व्यवस्थित करने की कोशिश है. सेना के कुछ संसाधनों को दूसरी रणनीतिक चुनौतियों के लिए इस्तेमाल करने और आंतरिक सुरक्षा अभियानों में CRPF की भूमिका बढ़ाने से सुरक्षा व्यवस्था को अधिक विशेषज्ञता-आधारित बनाने की कोशिश की जा रही है.

21 आर्मी कैंप CRPF को ही क्यों दिए जा रहे हैं?

CRPF जम्मू डिवीजन के कठुआ और उधमपुर जिलों में सेना के 21 कैंप संभालने की तैयारी कर रही है. इनमें 15 कैंप कठुआ और छह उधमपुर में हैं. इन जगहों को सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है. रिपोर्टों के मुताबिक, इन इलाकों में घुसपैठ करने वाले आतंकियों के लिए जंगल और पहाड़ी भूभाग छिपने तथा सुरक्षा बलों पर हमले की रणनीति बनाने में मददगार हो सकते हैं. इसलिए यहां केवल स्थायी कैंप बनाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि इलाके की लगातार निगरानी और जंगल आधारित ऑपरेशन की क्षमता भी जरूरी है.

CRPF को इन निर्धारित इलाकों में सेना के CI यानी काउंटर-इंसर्जेंसी और CT यानी काउंटर-टेररिज्म कार्यों में जवानों की जगह लेने की प्रक्रिया शुरू करने को कहा गया है. 21 स्थानों पर कितने जवानों की जरूरत होगी, इसका आकलन किया जा रहा है और औपचारिकताएं पूरी होने के बाद CRPF इन जगहों पर जिम्मेदारी संभाल सकती है.

Credit: ANI

जम्मू में CoBRA की तैनाती इतनी अहम क्यों है?

इस पूरे बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू CRPF की CoBRA यूनिट की तैनाती है. CoBRA यानी Commando Battalion for Resolute Action CRPF की विशेष कमांडो यूनिट है, जिसे खास तौर पर जंगल और गुरिल्ला युद्ध जैसी परिस्थितियों में ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है. यही वजह है कि इसे अक्सर 'जंगल वॉरियर्स' के नाम से भी जाना जाता है. पहले इसका मुख्य इस्तेमाल मध्य भारत के वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाकों में किया जाता रहा है, जहां घने जंगलों में छिपे उग्रवादियों का पता लगाने और उनके खिलाफ अभियान चलाने की जरूरत होती है.

जम्मू-कश्मीर में CoBRA का इस्तेमाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां चुनौती सिर्फ जंगल युद्ध तक सीमित नहीं है. कठुआ और उधमपुर का भूगोल पहाड़ी, जंगलों और दुर्गम इलाकों वाला है, जहां आतंकियों के लिए छिपना और छोटे समूहों में आवाजाही करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है. ऐसे इलाकों में CoBRA की जंगल-आधारित ऑपरेशनल ट्रेनिंग CRPF की क्षमता बढ़ा सकती है.

कितनी बड़ी होगी CoBRA की तैनाती?

CRPF की योजना जम्मू डिवीजन में बड़ी संख्या में CoBRA कंपनियों को उपलब्ध रखने की है. एक CRPF आदेश में जम्मू डिवीजन में किसी भी समय लगभग दो दर्जन CoBRA कंपनियों की मौजूदगी का संभव है. नई तैनाती में 18 CoBRA कंपनियों को शामिल करना पिछले साल अगस्त में तैयार की गई लंबी अवधि की रणनीतिक योजना का हिस्सा बताया गया है.

वहीं, न्यूज18 की रिपोर्ट के आधार पर सामने आई योजना में नौ CoBRA टीमों को ऑपरेशनल तैनाती में रखने और नौ अन्य टीमों को प्रशिक्षण देने की बात कही गई है. जरूरत के मुताबिक इन टीमों की तैनाती को बदला जा सकता है. यानी रणनीति सिर्फ एक जगह बड़ी संख्या में कमांडो तैनात करने की नहीं है, बल्कि जरूरत के अनुसार प्रशिक्षित टीमों को अलग-अलग इलाकों में तेजी से इस्तेमाल करने की है.

क्या CoBRA सेना की जगह पूरी तरह लेगी?

नहीं. उपलब्ध जानकारी से यह संकेत नहीं मिलता कि सेना या राष्ट्रीय राइफल्स को जम्मू-कश्मीर से पूरी तरह हटाया जा रहा है. बल्कि जिम्मेदारियों का चरणबद्ध पुनर्वितरण किया जा रहा है. राष्ट्रीय राइफल्स की कुछ इलाकों में तैनाती कम करने की योजना पर चर्चा जरूर हुई है, लेकिन इसका मतलब RR की जम्मू-कश्मीर से पूरी तरह वापसी नहीं है. रिपोर्टों में कहा गया है कि बड़ी संख्या में राष्ट्रीय राइफल्स के जवान आगे भी जम्मू-कश्मीर में मौजूद रहेंगे.

इसलिए इसे सेना बनाम CRPF के रूप में देखने के बजाय सुरक्षा जिम्मेदारियों के पुनर्गठन के तौर पर समझना ज्यादा सही होगा. सेना की भूमिका पूरी तरह खत्म होने के बजाय कुछ इलाकों में CRPF को अधिक जिम्मेदारी देकर सुरक्षा तंत्र को नए तरीके से व्यवस्थित किया जा रहा है.

जम्मू के लिए यह बदलाव कितना बड़ा है?

जम्मू क्षेत्र में हाल के वर्षों में आतंकवादी गतिविधियों ने सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौती खड़ी की है. खास तौर पर कठुआ, उधमपुर और आसपास के पहाड़ी-जंगल वाले इलाके सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हो गए हैं. ऐसे क्षेत्रों में आतंकियों की तलाश के लिए स्थानीय भूगोल की समझ, लंबे समय तक जंगल में ऑपरेशन करने की क्षमता और छोटी टीमों में काम करने का अनुभव बेहद महत्वपूर्ण होता है. यही वह क्षेत्र है जहां CoBRA की विशेषज्ञता उपयोगी हो सकती है.

CRPF के लिए जम्मू-कश्मीर का अनुभव नया नहीं है. गृह मंत्रालय ने 2023 में CoBRA की छह कंपनियों को जम्मू-कश्मीर में इलाके और परिस्थितियों से परिचित कराने के लिए भेजा था. हालांकि बाद में उन्हें वापस बुलाकर वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में तैनात कर दिया गया. इसके बाद मणिपुर में भी गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार के अनुरोध पर CoBRA की दो बटालियन तैनात कीं. इससे संकेत मिलता है कि CRPF अब CoBRA की क्षमताओं का इस्तेमाल केवल मध्य भारत के जंगलों तक सीमित रखने के बजाय अलग-अलग तरह के चुनौतीपूर्ण इलाकों में करने की दिशा में आगे बढ़ रही है.

क्या बदल जाएगा जम्मू-कश्मीर का सुरक्षा मॉडल?

21 कैंपों का CRPF को हस्तांतरण और CoBRA की तैनाती जम्मू-कश्मीर के सुरक्षा ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है. आने वाले समय में कुछ इलाकों में CRPF का ऑपरेशनल फुटप्रिंट बढ़ सकता है, जबकि सेना और राष्ट्रीय राइफल्स अपनी तैनाती को रणनीतिक जरूरतों के हिसाब से समायोजित कर सकते हैं.

असल चुनौती अब इस बदलाव को जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू करने की होगी. CRPF को सिर्फ कैंप संभालने की जिम्मेदारी नहीं मिलेगी, बल्कि ऐसे इलाकों में आतंकवाद-विरोधी अभियानों की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी, जहां जंगल, पहाड़ और सीमा से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. CoBRA की मौजूदगी इस क्षमता को और मजबूत कर सकती है. लेकिन सबसे अहम बात यह होगी कि सेना, CRPF, राष्ट्रीय राइफल्स और जम्मू-कश्मीर पुलिस के बीच खुफिया जानकारी और ऑपरेशनल तालमेल कितना मजबूत रहता है. यही तालमेल जम्मू के नए सुरक्षा मॉडल की असली परीक्षा होगा.

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