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क्या INDIA गठबंधन भीतरघात का शिकार हुआ? 2024 लोकसभा चुनाव से पहले कैसे और किसने पलट दी पटकथा?

2024 लोकसभा चुनाव से पहले INDIA गठबंधन में अंदरूनी मतभेद, नेतृत्व विवाद और सीट बंटवारे की खींचतान ने क्या विपक्षी एकता की पटकथा बदल दी, जानिए पूरी राजनीतिक कहानी विस्तार से.

क्या INDIA गठबंधन भीतरघात का शिकार हुआ? 2024 लोकसभा चुनाव से पहले कैसे और किसने पलट दी पटकथा?
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2024 लोकसभा चुनाव से पहले बना INDIA गठबंधन भारतीय राजनीति में विपक्षी एकता का सबसे बड़ा प्रयोग माना गया था. शुरुआत में इसे बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश किया गया, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव करीब आया, वैसे-वैसे इसके भीतर मतभेद, नेतृत्व की अस्पष्टता और सीट बंटवारे को लेकर तनाव सामने आने लगा. उस समय कांग्रेस के प्रवक्ता रहे संजय झा के बयान के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या गठबंधन भीतरघात का शिकार हुआ था या यह सिर्फ राजनीतिक असहमति का नतीजा था.

संजय झा के मुताबिक ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस के बीच रणनीतिक दूरी और अलग-अलग प्राथमिकताओं ने इस गठबंधन की एकता पर सवाल खड़े किए. क्या यह विपक्षी एकता की नई शुरुआत थी या भारतीय राजनीति का एक और अधूरा प्रयोग? यही सवाल आज भी बना हुआ है.

INDIA गठबंधन का सच क्या?

2024 लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों ने भाजपा के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने के लिए INDIA गठबंधन का गठन किया था. इसका उद्देश्य था विपक्षी वोटों का बिखराव रोककर एक मजबूत चुनावी चुनौती पेश करना. लेकिन तथ्य यह है कि यह गठबंधन किसी एक साझा विचारधारा या मजबूत संगठनात्मक ढांचे पर आधारित नहीं था, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक हितों और राज्यों की परिस्थितियों से उपजा एक चुनावी समझौता था.

शुरुआत में बेंगलुरु और मुंबई बैठकों में बड़ी एकता का संदेश जरूर दिया गया, लेकिन अंदरूनी स्तर पर नेतृत्व, सीट बंटवारे और रणनीति को लेकर असहमति पहले दिन से मौजूद थी. यही कारण है कि गठबंधन की नींव मजबूत दिखने के बावजूद अंदर से पूरी तरह एकजुट नहीं हो सका.

नेतृत्व को लेकर क्यों नहीं बनी बात?

INDIA गठबंधन के भीतर सबसे बड़ा सवाल नेतृत्व को लेकर था. क्या कांग्रेस इस गठबंधन का स्वाभाविक नेतृत्व करेगी या सभी दल मिलकर साझा नेतृत्व मॉडल अपनाएंगे? इसी बहस के बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं सामने आईं, हालांकि किसी भी स्तर पर औपचारिक सहमति दर्ज नहीं हुई.

इसी तरह कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को संभावित चेहरे के रूप में आगे करने की चर्चा ने भी सहयोगी दलों के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं पैदा कीं. वास्तविक समस्या यह थी कि गठबंधन ने कभी स्पष्ट रूप से यह तय नहीं किया कि चुनाव बाद नेतृत्व कैसे तय होगा, जिससे अविश्वास की स्थिति बनी रही.

ममता बनर्जी और क्षेत्रीय संतुलन की राजनीति

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शुरू से ही INDIA गठबंधन की बैठकों में सक्रिय रहीं, लेकिन उन्होंने अपने राज्य में टीएमसी की स्वतंत्र राजनीतिक स्थिति को प्राथमिकता दी. बंगाल में कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे पर स्पष्ट सहमति नहीं बन सकी और दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में रहे. यह दिखाता है कि राष्ट्रीय स्तर पर एकता का संदेश और राज्य स्तर पर राजनीतिक वास्तविकता अलग-अलग दिशा में चल रही थी. क्या यह रणनीतिक मजबूरी थी या गठबंधन के भीतर समानांतर शक्ति संतुलन बनाने की कोशिश, यह सवाल आज भी राजनीतिक बहस का हिस्सा है.

AAP की स्वतंत्र रणनीति

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने भी गठबंधन के भीतर कई मुद्दों पर स्वतंत्र रुख अपनाया. पंजाब में AAP ने स्पष्ट रूप से अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय लिया, जबकि अन्य राज्यों में भी कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बन पाई. यह तथ्य दिखाता है कि INDIA गठबंधन के सभी प्रमुख घटक दल अपने-अपने क्षेत्रीय राजनीतिक आधार को किसी साझा ढांचे में पूरी तरह समर्पित करने के लिए तैयार नहीं थे.

सीट बंटवारे को लेकर टकराव

INDIA गठबंधन के भीतर सबसे गंभीर विवाद सीट शेयरिंग को लेकर सामने आया. उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच लंबे समय तक बातचीत चलती रही, लेकिन अंतिम सहमति कई जगहों पर या तो बहुत देर से बनी या पूरी तरह नहीं बन सकी. यही वह बिंदु था जहां गठबंधन की सैद्धांतिक एकता व्यवहारिक राजनीति से टकरा गई. क्या गठबंधन केवल भाजपा विरोध तक सीमित था, और जैसे ही चुनावी गणित शुरू हुआ, सभी दल अपने-अपने हितों की ओर लौट गए?

भीतरघात था या सियासी मतभेद?

संजय झा जैसे नेताओं के बयानों के बाद यह चर्चा तेज हुई कि क्या INDIA गठबंधन भीतरघात का शिकार हुआ. लेकिन तथ्यात्मक दृष्टि से देखें तो किसी भी दल द्वारा औपचारिक रूप से गठबंधन तोड़ने की घोषणा नहीं की गई और न ही कोई सार्वजनिक विभाजन हुआ. जो दिखाई दिया वह अधिकतर रणनीतिक असहमति, सीट बंटवारे का विवाद और नेतृत्व पर अस्पष्टता थी. इसलिए इसे भीतरघात कहना राजनीतिक व्याख्या हो सकती है, लेकिन संगठनात्मक टूटन के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते.

अधूरी एकता का राजनीतिक प्रयोग

2024 लोकसभा चुनाव के परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि INDIA गठबंधन एक पूरी तरह एकीकृत राजनीतिक ताकत नहीं बन सका. यह गठबंधन साझा विरोध की भावना पर खड़ा था, लेकिन साझा नेतृत्व, साझा रणनीति और साझा चुनावी रोडमैप की कमी ने इसे कमजोर किया. वास्तविकता यह है कि यह गठबंधन न तो पूरी तरह टूटा और न ही पूरी तरह सफल एकजुट शक्ति बन पाया. यह भारतीय राजनीति में एक ऐसे प्रयोग के रूप में सामने आया जिसमें एकता का प्रयास था, लेकिन राजनीतिक जटिलताओं ने उसे सीमित कर दिया.

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