एकजुट होने से पहले फिर बिखरा विपक्ष! TMC, शिवसेना UBT और AAP के संकट के बीच राहुल गांधी का प्लान-B क्या है
बंगाल चुनाव के बाद विपक्षी एकता फिर सवालों में है. TMC, शिवसेना UBT और AAP के संकट के बीच राहुल गांधी के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है.
बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद INDIA गठबंधन के घटक दलों की बैठक की चर्चा शुरू हो गई है. मकसद भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति तैयार करना है, लेकिन बैठक से पहले ही विपक्षी खेमे में कई तरह की दरारें दिखाई देने लगी हैं. पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर 675 करोड़ रुपये के पार्टी फंड और बैंक खातों को लेकर विवाद सुर्खियों में है. महाराष्ट्र में शिवसेना यूबीटी अभी भी 2022 की टूट के असर से उबर नहीं पाई है, जबकि आम आदमी पार्टी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार और संगठनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या विपक्ष पहले अपने घर को संभालेगा या भाजपा के खिलाफ साझा लड़ाई लड़ेगा?
TMC: बंगाल में सबसे बड़ा सहयोगी, खुद संकट में
INDIA गठबंधन में ममता बनर्जी की टीएमसी सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय दलों में गिनी जाती है. लेकिन हाल के दिनों में पार्टी के भीतर वित्तीय नियंत्रण को लेकर विवाद खुलकर सामने आया. पार्टी के बैंक खातों, फंड संचालन और करीब 675 करोड़ रुपये की राशि को लेकर सवाल उठे. मामला पुलिस जांच और अदालत तक पहुंच गया.
टीएमसी के कुछ नेताओं ने पार्टी फंड के संचालन को लेकर आपत्ति जताई और बैंक खातों पर रोक लगाने की मांग तक की. बीजेपी इसे टीएमसी के भीतर नेतृत्व और नियंत्रण की लड़ाई बता रही है, जबकि पार्टी नेतृत्व इसे प्रशासनिक विवाद कह रहा है. लेकिन विपक्षी एकता की बैठक से ठीक पहले यह विवाद ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत पर सवाल खड़े कर रहा है.
शिवसेना UBT: टूट का असर अब भी कायम
महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी INDIA गठबंधन की अहम सहयोगी है. लेकिन जुलाई 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए बड़े विभाजन ने पार्टी की राजनीतिक और संगठनात्मक ताकत को झटका दिया. इसके बाद चुनाव आयोग ने शिवसेना का नाम और चुनाव चिन्ह भी शिंदे गुट को दे दिया.
उद्धव ठाकरे को नई पार्टी पहचान और नए चुनाव चिन्ह के साथ राजनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ रही है. लोकसभा चुनाव में महाविकास अघाड़ी को कुछ सफलता जरूर मिली, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर शिवसेना यूबीटी पहले जैसी स्थिति में नहीं है. विपक्षी एकता के लिए यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि महाराष्ट्र भाजपा के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में गिना जाता है.
AAP: राष्ट्रीय विस्तार से संगठन बचाने की चुनौती तक
आम आदमी पार्टी ने एक समय खुद को राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश किया था. लेकिन हाल के वर्षों में पार्टी को कई मोर्चों पर झटके लगे. दिल्ली में सत्ता से बाहर होना, कई वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़ना और संगठनात्मक पुनर्गठन की जरूरत ने पार्टी को नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है.
INDIA गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद AAP और कांग्रेस के रिश्ते कई राज्यों में सहज नहीं हैं. दिल्ली और पंजाब में दोनों दल एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं. ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर एकता और राज्यों में प्रतिस्पर्धा का विरोधाभास लगातार बना हुआ है.
सपा और अन्य दलों का अपना-अपना एजेंडा
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया था, लेकिन विधानसभा चुनाव 2027 को देखते हुए उसका मुख्य फोकस प्रदेश की राजनीति है. इसी तरह आरजेडी का ध्यान बिहार पर और झारखंड मुक्ति मोर्चा का ध्यान झारखंड पर केंद्रित है. INDIA गठबंधन के अधिकांश दल राष्ट्रीय से ज्यादा क्षेत्रीय राजनीति से संचालित होते हैं. यही कारण है कि किसी एक साझा एजेंडे पर लंबे समय तक सभी को साथ रखना मुश्किल साबित होता है.
राहुल गांधी के सामने असली चुनौती क्या?
लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी विपक्ष के सबसे प्रमुख राष्ट्रीय चेहरे के रूप में उभरे हैं. लेकिन उनके सामने समस्या यह है कि गठबंधन की ताकत क्षेत्रीय दलों पर टिकी हुई है और उन्हीं दलों में सबसे ज्यादा अस्थिरता दिखाई दे रही है. यदि टीएमसी, शिवसेना यूबीटी, AAP और अन्य सहयोगी दल अपने-अपने संकटों में उलझे रहते हैं तो विपक्षी एकता का संदेश कमजोर पड़ सकता है. राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती भाजपा से लड़ने से पहले सहयोगी दलों के बीच भरोसा बनाए रखना है.
क्या है राहुल गांधी का प्लान-B?
राहुल गांधी का प्लान-B कांग्रेस को संगठनात्मक रूप से मजबूत करना हो सकता है. यदि गठबंधन कमजोर पड़ता है तो कांग्रेस सामाजिक न्याय, संविधान, बेरोजगारी और आर्थिक मुद्दों के आधार पर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश करेगी. यानी एक तरफ राहुल गांधी INDIA गठबंधन को बचाने की कोशिश करेंगे, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस को इस स्थिति के लिए भी तैयार रखेंगे कि भविष्य में उसे कई राज्यों में अपने दम पर लड़ना पड़े.
बंगाल चुनाव के बाद विपक्षी एकता की नई कवायद शुरू होने जा रही है, लेकिन टीएमसी में फंड विवाद, शिवसेना यूबीटी की पुरानी टूट, AAP की चुनौतियां और क्षेत्रीय दलों की अलग-अलग प्राथमिकताएं यह संकेत दे रही हैं कि विपक्ष की राह आसान नहीं है. बीजेपी के खिलाफ लड़ाई से पहले विपक्ष को अपने भीतर की दरारों को भरना होगा. वरना INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि उसका अपना बिखराव साबित हो सकता है.




