जहां सबसे ज्यादा खतरा, वहीं सरकार का सबसे बड़ा फोकस: भारत के 50 संवेदनशील जिलों का पूरा ब्लूप्रिंट
भारत के 50 संवेदनशील जिलों पर सरकार की विशेष नजर क्यों है? जानिए चयन के पैमाने, प्रभावित राज्यों की सूची, सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और विकास का पूरा ब्लूप्रिंट.
तपती गर्मी, अचानक आई बाढ़, आसमान से गिरती बिजली, सूखा, विकास से दूर, नक्सली हिंसा और सीमाओं पर घुसपैठ का खतरा- देश के कुछ जिलों में आजादी 79 साल बाद भी यही रोजमर्रा की हकीकत है. यहां लोगों की चिंता सिर्फ खेती, रोजगार या कारोबार तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हर दिन अपनी सुरक्षा और भविष्य को लेकर भी होती है. यही वजह है कि केंद्र सरकार ऐसे इलाकों पर सामान्य जिलों की तुलना में कहीं ज्यादा नजर रखने की योजना पर काम कर रही है. इसी सोच के तहत सरकार ने देश के ऐसे 50 संवेदनशील जिलों के लिए एक व्यापक ब्लूप्रिंट बनाया है, ताकि खतरे कम हों और विकास की रफ्तार को गति मिले.
ऐसे शुरू हुई सरकार की नई कवायद
इस रणनीति को हाल ही में और मजबूती तब मिली, जब केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति (High Level Committee-HLC) ने राष्ट्रीय आपदा शमन कोष (National Disaster Mitigation Fund-NDMF) के तहत दो महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दी. पहला प्रस्ताव 10 राज्यों के उन 50 जिलों के लिए है, जहां आकाशीय बिजली गिरने की घटनाएं सबसे अधिक होती हैं. इन जिलों में बिजली गिरने से होने वाली मौतों और नुकसान को कम करने के लिए विशेष सुरक्षा परियोजना लागू की जाएगी.
दूसरा प्रस्ताव 12 राज्यों के 49 सबसे अधिक सूखा प्रभावित जिलों को विशेष सहायता (Catalytic Assistance) उपलब्ध कराने से जुड़ा है, ताकि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच इन क्षेत्रों को अधिक सक्षम बनाया जा सके. यह फैसला बताता है कि केंद्र सरकार अब केवल आपदा आने के बाद राहत देने की बजाय, जोखिम कम करने (Mitigation) की दीर्घकालिक रणनीति पर जोर दे रही है.
'सेंसिटिव जिले' का क्या मतलब है?
केंद्र सरकार के लिए संवेदनशील जिला केवल वह नहीं है जहां अपराध अधिक हों. ऐसे जिले वे हैं, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा, आंतरिक शांति, प्राकृतिक आपदाओं का खतरा, सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन और सामरिक चुनौतियां एक साथ मौजूद हों. इसलिए अलग-अलग मंत्रालय अपने उद्देश्य के अनुसार ऐसे जिलों की पहचान करते हैं. गृह मंत्रालय वामपंथी उग्रवाद, सीमा सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा को आधार बनाता है, जबकि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय सूखा, बाढ़ और मौसम संबंधी संकट वाले जिलों के लिए जिला कृषि आकस्मिक योजना तैयार करता है.
नीति आयोग आकांक्षी जिला कार्यक्रम के तहत सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े जिलों की पहचान करता है, जबकि पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय जलवायु जोखिम आकलन के जरिए अत्यधिक जलवायु संवेदनशील जिलों का अध्ययन करता है.
किस रिपोर्ट में है इन जिलों का जिक्र?
'भारत के 50 संवेदनशील जिलों' शीर्षक से केंद्र सरकार की कोई एकीकृत आधिकारिक सूची जारी नहीं की गई है. अलग-अलग उद्देश्यों के लिए विभिन्न मंत्रालयों ने अपनी-अपनी श्रेणियां बनाई हैं. इनमें गृह मंत्रालय की Left Wing Extremism (LWE) District Classification, Border Area Development Programme (BADP), पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की Climate Vulnerability Assessment for Adaptation Planning in India, कृषि मंत्रालय एवं ICAR की District Agriculture Contingency Plans (DACP) तथा नीति आयोग का Aspirational District Programme प्रमुख हैं.
हाल ही में NDMF के तहत 50 बिजली प्रभावित और 49 सूखा प्रभावित जिलों के लिए स्वीकृत परियोजनाएं इसी व्यापक नीति का नया आयाम हैं.
किन पैमानों पर तय होता है, कौन-सा जिला Sensitive?
सरकार किसी जिले का मूल्यांकन केवल अपराध के आंकड़ों के आधार पर नहीं करती. इसके लिए कई संकेतकों का संयुक्त आकलन किया जाता है. इनमें अंतरराष्ट्रीय सीमा से निकटता, घुसपैठ की आशंका, वामपंथी उग्रवाद, आतंकवादी या कट्टरपंथी गतिविधियां, बाढ़, सूखा, चक्रवात, आकाशीय बिजली जैसे जलवायु जोखिम, ड्रग्स और हथियारों की तस्करी, सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और बैंकिंग जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी तथा सामरिक महत्व शामिल हैं.
इन राज्यों के 50 जिलों पर केंद्र का फोकस ज्यादा?
सरकारी रिपोर्टों और जोखिम आकलनों के आधार पर बिहार के अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, सुपौल, मधुबनी, सीतामढ़ी, जमुई, लखीसराय और बांका; उत्तर प्रदेश के बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और महाराजगंज; छत्तीसगढ़ के सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा, कांकेर और बस्तर; झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम, लातेहार, गढ़वा, चतरा और गुमला; ओडिशा के कालाहांडी, बोलांगीर, कोरापुट और मयूरभंज; पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना, मालदा और जलपाईगुड़ी; असम के धुबरी, बारपेटा, दरांग और लखीमपुर; तथा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली, चंद्रपुर, यवतमाल और नंदुरबार जैसे जिले लगातार उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में शामिल रहे हैं. इसके अलावा पूर्वोत्तर के सीमावर्ती और मध्य भारत के कुछ अन्य नक्सल प्रभावित जिले शामिल हैं.
क्या है सरकार का ब्लूप्रिंट?
सरकार ने इन जिलों के लिए सुरक्षा, विकास, जलवायु अनुकूलन का संयुक्त मॉडल तैयार किया है. सुरक्षा के मोर्चे पर वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाकों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती, ड्रोन आधारित निगरानी, आधुनिक खुफिया तंत्र और राज्य पुलिस के साथ समन्वित अभियान चलाए जा रहे हैं. जलवायु जोखिम वाले जिलों में ICAR की जिला कृषि आकस्मिक योजनाओं के तहत कम अवधि वाली फसलें, जल संरक्षण और मौसम आधारित कृषि सलाह लागू की जा रही है.
वहीं, आकांक्षी जिला कार्यक्रम और सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम (BADP) के माध्यम से सड़क, बिजली, मोबाइल नेटवर्क, स्वास्थ्य, शिक्षा, बैंकिंग और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करने पर जोर है. मनरेगा और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के जरिए जल संचयन, तालाब, चेक डैम और सिंचाई ढांचे को भी मजबूत किया जा रहा है. ताकि सूखे और जलवायु संकट के प्रभाव को कम किया जा सके.
सरकार की नजर में संवेदनशील जिले केवल सुरक्षा की चुनौती नहीं, बल्कि विकास और जलवायु लचीलेपन की सबसे बड़ी परीक्षा भी हैं. इसलिए अब नीति का फोकस केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि आपदा जोखिम को कम करने, आधारभूत ढांचे को मजबूत करने और स्थानीय समुदायों को आत्मनिर्भर बनाने पर भी है. राष्ट्रीय आपदा शमन कोष के तहत 50 बिजली प्रभावित और 49 सूखा प्रभावित जिलों के लिए स्वीकृत परियोजनाएं इसी सोच का हिस्सा हैं.




