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Great Nicobar Project क्या, जिसे राहुल गांधी बता रहे 'विनाश', पूर्व एयर चीफ ने बताया - भारत के लिए इसका Statragic और Economic महत्व

Rahul Gandhi के ‘विनाश’ आरोप बनाम R.K.S. Bhadauria के रणनीतिक-आर्थिक तर्क से ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर बहस तेज. अहम सवाल - यह प्रोजेक्ट विनाश या गेम चेंजर.

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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर देश में तीखी बहस छिड़ गई है. राहुल गांधी ने इसे “विकास की आड़ में विनाश” बताते हुए पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों पर बड़ा खतरा मान रहे हैं. उनका दावा है कि इस परियोजना से विशाल वर्षावनों और स्थानीय समुदायों पर गंभीर असर पड़ेगा. वहीं दूसरी ओर पूर्व वायुसेना प्रमुख R.K.S. Bhadauria ने इसे भारत के लिए अहम रणनीतिक और आर्थिक कदम करार दिया है. उनके अनुसार, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की पकड़ मजबूत करने, समुद्री व्यापार बढ़ाने और सुरक्षा दृष्टि से यह प्रोजेक्ट 'गेम-चेंजर' साबित हो सकता है. ऐसे में सवाल उठता है- क्या यह परियोजना पर्यावरणीय संकट है या भारत के भविष्य की रणनीतिक नींव?

क्यों आमने-सामने हैं Rahul और R.K.S. Bhadauria?

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर सियासत अब सीधे “पर्यावरण बनाम रणनीतिक हित” की लड़ाई में बदल गई है. एक तरफ राहुल गांधी इसे प्राकृतिक और आदिवासी विरासत पर हमला बताते हैं. राहुल इसे विकास के विनाश को प्रोजेक्ट मानते हैं तो दूसरी तरफ पूर्व एयर चीफ आर.के.एस. भदौरिया इसे भारत की सैन्य और सामरिक मजबूती के लिए जरूरी कदम मानते हैं. यही टकराव इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ले आया है.

राहुल गांधी ने क्यों उठाए सवाल?

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अंडमान निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर 29 अप्रैल पर अपने पोस्ट में कहा था, “आज मैंने ग्रेट निकोबार की यात्रा की. ये मेरी जिंदगी के सबसे असाधारण जंगल हैं. ऐसे पेड़ जो हमारी यादों से भी पुराने हैं, जो कई पीढ़ियों से अस्तित्व में हैं. इस द्वीप के लोग भी उतने ही खूबसूरत हैं. यानी आदिवासी समुदाय और यहां बसे लोग. लेकिन उनसे उनका हक छीना जा रहा है.

सरकार इसे ‘प्रोजेक्ट’ कहती है, लेकिन मैंने जो देखा वह विकास नहीं, बल्कि लाखों पेड़ों पर चलती कुल्हाड़ी का निशान है. करीब 150 वर्ग किलोमीटर का वर्षावन खत्म होने के लिए छोड़ दिया गया है. जिन समुदायों को सुना जाना चाहिए था, उनके घर उनसे छीने जा रहे हैं.

'यह विकास नहीं, विकास की भाषा में छिपा विनाश है.' मैं साफ कहता हूं, ग्रेट निकोबार में जो हो रहा है, वह हमारे समय में प्राकृतिक और आदिवासी विरासत के खिलाफ सबसे बड़े अपराधों में से एक है. इसे रोका जाना चाहिए और रोका जा सकता है, अगर देश के लोग सच देखें.”

भदौरिया का जवाब- क्यों प्रोजेक्ट ‘मिलिट्री मौजूदगी’ के लिए जरूरी?

आर.के.एस. भदौरिया ने राहुल गांधी के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि इस प्रोजेक्ट को सही रणनीतिक पहलुओं के लिहाज से समझना जरूरी है. उनके मुताबिक, यह सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि भारत की समुद्री और हवाई रणनीतिक पकड़ मजबूत करने का अहम कदम है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं का समाधान कानूनी प्रक्रियाओं और मंजूरियों के जरिए किया जाएगा. भदौरिया का यह बयान BJP की तरफ से कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस बयान के जवाब में आया है, जिसमें उन्होंने इस प्रोजेक्ट और इसके पर्यावरण पर पड़ने वाले बुरे असर की आलोचना की थी.

चीन का इससे क्या है लिंक?

एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) R.K.S. भदौरिया, जो अब BJP के सदस्य हैं, ने चीन के एनर्जी शिपमेंट के रास्ते के पास एक बंदरगाह होने के रणनीतिक महत्व की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने समुद्री ताकत के ऐसे इस्तेमाल के असर को दिखाया है. होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से उपजे संकट के नजरिए ये इसे देखने की जरूरत है. तभी इस प्रोजेक्ट के पीछे भारत के हित क्या छिपे हैं, उसे समझा जा सकता है.

मलक्का स्ट्रेट पर इतना फोकस क्यों?

Strait of Malacca दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से चीन के लगभग 75% ऊर्जा आयात गुजरते हैं. प्रस्तावित ग्रेट निकोबार पोर्ट इस जलडमरूमध्य से करीब 150 किलोमीटर दूरी पर होगा. ऐसे में, इस क्षेत्र में भारत की मौजूदगी बढ़ने का मतलब है - समुद्री व्यापार मार्गों पर बेहतर निगरानी, रणनीतिक बढ़त और इंडो-पैसिफिक में मजबूत स्थिति.

अंडमान प्रोजेक्ट भारत के लिए अहम क्यों?

करीब ₹81,000 करोड़ के इस प्रोजेक्ट में ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट, पावर प्लांट और टाउनशिप शामिल हैं. सरकार का मानना है कि इससे भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार में बड़ी भूमिका मिलेगी, लॉजिस्टिक्स लागत घटेगी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक ताकत बढ़ेगी. साथ ही, यह प्रोजेक्ट भारत की सुरक्षा, कनेक्टिविटी और आर्थिक विस्तार को एक साथ मजबूती देने वाला बताया जा रहा है.

यह सिर्फ प्रोजेक्ट है या भारत के भविष्य का मॉडल?

ग्रेट निकोबार अब सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर योजना नहीं, बल्कि उस बड़े सवाल का प्रतीक बन गया है. क्या भारत विकास के लिए पर्यावरणीय जोखिम उठाएगा, या संतुलन का नया मॉडल तैयार करेगा? यानी, यह टकराव केवल राहुल बनाम भदौरिया नहीं, बल्कि “इकोलॉजी vs जियोपॉलिटिक्स” की वह बहस है, जो आने वाले समय में भारत की नीति दिशा तय कर सकती है.

Amit Malviya ने राहुल को क्या दिया जवाब?

“राहुल गांधी उन लोगों की भाषा बोल रहे हैं जो भारत के रणनीतिक हितों के खिलाफ हैं. ऐसे वक्त में जब National Green Tribunal ने ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ को मंजूरी दे दी है—जो मलक्का जलडमरूमध्य के पास एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट, टाउनशिप और एनर्जी हब बनाने का रास्ता खोलता है, उनका यह रुख देश की दीर्घकालिक आर्थिक और सुरक्षा प्राथमिकताओं के बिल्कुल उलट है.”

एयर वाइस मार्शन ने क्या कहा?

'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' पर आरकेएस भदौरिया और राहुल गांधी के बीच जारी बहस के बीच एयर वाइस मार्शल पी.के. श्रीवास्तव (सेवानिवृत्त) ने भी बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा, "मेरा मानना ​​है कि भारत सरकार का कोई भी प्रोजेक्ट पूरी तरह से विचार-विमर्श के बाद ही शुरू किया जाता है। एक बार जब ग्रेट निकोबार विकसित हो जाएगा, तो हमारी व्यावसायिक गतिविधियां, सैन्य प्रभुत्व और निगरानी क्षमताएं बढ़ जाएंगी। इस प्रोजेक्ट के जरिए हम मलक्का जलडमरूमध्य पर भी नजर रख पाएंगे."

विवाद की जड़ क्या है?

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर बहस दो हिस्सों में बंटी है. एक पक्ष इसे पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों पर बड़ा खतरा बता रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक गेम-चेंजर मानता है. यानी सवाल सिर्फ एक प्रोजेक्ट का नहीं, यह उस मॉडल का है जिसमें तय करना है कि विकास की कीमत क्या होगी और उसका लाभ किसे मिलेगा.

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